होयसल वंश (Hoysala Dynasty) (1000 ई.–1346 ई.) का विस्तृत अध्ययन – स्थापना, प्रमुख शासक (विष्णुवर्धन, बल्लाल द्वितीय), प्रशासनिक व्यवस्था, कला, स्थापत्य, धार्मिक आंदोलन और पतन तक की सम्पूर्ण जानकारी।
होयसल वंश (Hoysala Dynasty) प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी Notes
होयसल वंश (Hoysala Dynasty) दक्षिण भारत के प्राचीन एवं मध्यकालीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण वंश था, जिसने कर्नाटक के मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों पर शासन किया। इनकी राजधानी प्रारम्भ में बेलूर (Belur) थी, बाद में द्वारसमुद्र (Halebidu) हो गई। होयसल शासक वैष्णव, शैव और जैन धर्म के महान संरक्षक थे तथा कला, स्थापत्य और साहित्य के उत्कर्ष में उनका अत्यंत योगदान रहा।
होयसल वंश (Hoysala Dynasty) उत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास :
- होयसलों की उत्पत्ति के विषय में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं।
- एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार “साल वंश” के एक वीर ने एक बाघ का वध किया, जिसे देखकर उसके नाम के साथ “होय-सल” (मारो-सल) जुड़ गया।
- प्रारम्भिक होयसलों ने पश्चिमी गंग वंश के सामंत के रूप में कार्य किया और बाद में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
प्रमुख शासक :
- विष्णुवर्धन (1108–1152 ई.)
- होयसलों का सबसे महान शासक।
- चोलों से तालकाड़ के युद्ध में विजय प्राप्त की।
- वज्रयान बौद्ध धर्म से वैष्णव धर्म की ओर झुके और रामानुजाचार्य के प्रभाव में आए।
- बेलूर का प्रसिद्ध चन्नकेशव मंदिर बनवाया।
- नरसिंह प्रथम (1152–1173 ई.)
- राज्य का विस्तार किया।
- जैन और शैव मंदिरों का निर्माण करवाया।
- वीर बल्लाल द्वितीय (1173–1220 ई.)
- होयसल साम्राज्य का स्वर्णयुग।
- चालुक्य साम्राज्य के विघटन के बाद कर्नाटक में सर्वोच्च सत्ता स्थापित की।
- द्वारसमुद्र (हालेबीड) को राजधानी बनाया।
- जैन धर्म को संरक्षण दिया।
- वीर बल्लाल तृतीय (1292–1343 ई.)
- होयसलों के अंतिम प्रमुख शासक।
- इनका शासनकाल दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों से प्रभावित रहा।
- 1343 ई. में होयसल साम्राज्य समाप्त हुआ और इसका क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य में विलय हो गया।
धर्म एवं संस्कृति :
- होयसलों ने शैव, वैष्णव और जैन धर्मों को समान संरक्षण दिया।
- रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य जैसे संतों का प्रभाव इस काल में रहा।
- साहित्यिक दृष्टि से कन्नड़ और संस्कृत का अत्यधिक विकास हुआ।
- रघवांक (कवि) ने “हरिसिंहपुराण” लिखा।
- संस्कृत में जगद्धरण और कर्णपायन जैसे विद्वान हुए।
प्रशासन और अर्थव्यवस्था :
- शासन पद्धति सामंतवादी थी।
- राज्य को नाडु, वलनाडु और ग्राम इकाइयों में विभाजित किया गया।
- भूमि राजस्व प्रमुख आय का स्रोत था।
- व्यापार और शिल्पकला में उन्नति हुई। सोने और चाँदी के सिक्कों का प्रचलन था।
होयसला काल (Hoysala Dynasty) की कला और स्थापत्य :
- होयसलों का स्थापत्य होयसला शैली के नाम से प्रसिद्ध है।
- प्रमुख विशेषताएँ :
- मंदिर तारे के आकार (stellate plan) पर बने।
- मंदिरों में साबुन पत्थर (Soapstone) का उपयोग।
- जटिल नक्काशी और मूर्तिकला – विशेषकर रामायण, महाभारत और भागवत पुराण की कथाओं को दर्शाया गया।
- मूर्तियों में सूक्ष्मता, ललितता और अलंकरण पर विशेष ध्यान।
- छतों और खंभों पर उत्कृष्ट नक्काशी।
- जैन मंदिरों का भी निर्माण।
- प्रमुख मंदिर :
- चन्नकेशव मंदिर (बेलूर)
- होयसलेश्वर मंदिर (हालेबीड/द्वारसमुद्र)
- केशव मंदिर (सोमनाथपुर)
- लक्ष्मी मंदिर (दोड्डगडवली)
होयसल वंश (Hoysala Dynasty) का पतन :
- आंतरिक सामंती विद्रोह और प्रशासनिक कमजोरी।
- दिल्ली सल्तनत के आक्रमण (मलिक काफूर और अन्य सेनापतियों द्वारा)।
- 14वीं शताब्दी में साम्राज्य विजयनगर साम्राज्य में विलय हो गया।
होयसलों का वंश कर्नाटक के इतिहास में कला, स्थापत्य और धर्म-संरक्षण के कारण अमर है। इनके द्वारा निर्मित मंदिर भारतीय शिल्पकला की उच्चतम उपलब्धि माने जाते हैं। विशेषकर बेलूर, हालेबीड और सोमनाथपुर के मंदिर आज भी कर्नाटक की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विश्वविख्यात हैं।
होयसल वंश (Hoysala Dynasty) शैली की कला एवं स्थापत्य
होयसल वंश (Hoysala Dynasty) (11वीं–14वीं शताब्दी ई.) ने दक्षिण भारत विशेषकर कर्नाटक में कला और स्थापत्य को एक नई ऊँचाई प्रदान की। उनकी राजधानी बेलूर और हालेबीडु कला–वास्तुकला के अनमोल केंद्र माने जाते हैं। होयसला स्थापत्य को “कर्नाटक शैली” भी कहा जाता है, जो द्रविड़ और नागर शैली के तत्वों का सम्मिश्रण थी, किंतु इसमें अपनी अनोखी स्थानीय विशेषताएँ थीं।
1. स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ
- तारकीय योजना (Star-shaped plan) –
- अधिकांश होयसला मंदिर ताराकार (star-shaped) या बहुभुजाकार योजना पर बने होते थे।
- मंदिर की दीवारें बाहर की ओर निकली और भीतर धँसी हुई आकृतियों के कारण अत्यंत सजीव प्रतीत होती थीं।
- उच्च मंच (जगती) –
- मंदिर एक ऊँचे जगती (platform) पर बनाए जाते थे।
- इस मंच पर परिक्रमा (प्रदक्षिणा) की सुविधा होती थी।
- विमान (शिखर) –
- मंदिर के शिखर अपेक्षाकृत नीचले और छोटे होते थे।
- इनमें उत्तरी भारत की नागर शैली का प्रभाव दिखता था, किंतु आधार दक्षिणी द्रविड़ परंपरा का था।
- बहु-मंडप परंपरा –
- कई मंदिरों में एक, तीन या पाँच गर्भगृह (त्रिकूट/पंचकूट योजना) पाए जाते थे।
- मंडपों में जटिल नक्काशीदार स्तंभ (lathe-turned pillars) होते थे, जिनमें पालिश इतनी चिकनी थी कि वे चमकदार दिखाई देते थे।
2. मूर्तिकला की विशेषताएँ
- सूक्ष्म नक्काशी (Miniature carving) –
- मूर्तियों और दीवारों पर इतनी बारीक नक्काशी होती थी कि उसे “पत्थर पर कढ़ाई” कहा जाता है।
- पौराणिक कथाएँ –
- महाभारत, रामायण और भागवत पुराण की घटनाओं को मंदिरों की बाहरी दीवारों पर उकेरा गया।
- शिल्पकला में गहराई और यथार्थ –
- नृत्यरत अप्सराएँ, अलंकारिक गज (हाथी), अश्व (घोड़े), सिंह और यक्षिणियाँ अत्यंत जीवंत दिखाई देती थीं।
- मूर्ति का अनुपात और सौंदर्य –
- मूर्तियों में सूक्ष्म अंग–विन्यास और अलंकरण होते थे।
- शिल्पकार ने वस्त्रों की महीन तहें और आभूषणों की झलक तक उकेर दी।
3. प्रमुख मंदिर और केंद्र
- चन्नकेशव मंदिर, बेलूर (1117 ई., विष्णु मंदिर) –
- विष्णुवर्धन द्वारा बनवाया गया।
- अत्यंत सुंदर स्तंभ और नृत्यरत अप्सराएँ (मदनिका) प्रसिद्ध हैं।
- होयसलेश्वर मंदिर, हालेबीडु (12वीं शताब्दी) –
- भगवान शिव को समर्पित।
- दीवारों पर महाकाव्यों की कथाएँ उकेरी गई हैं।
- केदारेश्वर मंदिर, हालेबीडु –
- इसमें उत्तरी भारतीय प्रभाव अधिक है।
- चेंचकेश्वर मंदिर, सौमनाथपुर (1268 ई.) –
- तारा–आकृति का सर्वोत्तम उदाहरण।
- इसे “होयसला स्थापत्य की चरम सीमा” माना जाता है।
4. विशेष योगदान
- होयसला शैली ने भारतीय मंदिर स्थापत्य को अत्यधिक सजावटी और नक्काशीपूर्ण रूप दिया।
- इसमें “स्थापत्य और मूर्तिकला का अद्भुत समन्वय” दिखता है।
- सूक्ष्मता और कला-कौशल के कारण होयसला कला को विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त हुआ है (बेलूर और हालेबीडु यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में प्रस्तावित)।
होयसला कला और स्थापत्य भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्ट परंपरा का चरमोत्कर्ष है। बेलूर, हालेबीडु और सौमनाथपुर के मंदिर इस बात के साक्षी हैं कि किस प्रकार कला, धर्म और शिल्प कौशल का संगम एक नई शैली का निर्माण कर सकता है। यह शैली न केवल कर्नाटक बल्कि सम्पूर्ण भारतीय मंदिर स्थापत्य की गौरवशाली धरोहर है।
होयसल वंश (Hoysala Dynasty) (1000 ई.–1346 ई.) – FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):
Q1. होयसल वंश (Hoysala Dynasty)की स्थापना किसने की थी?
होयसल वंश की स्थापना नृपकामा (Nripakama) ने की थी।
Q2. होयसल वंश (Hoysala Dynasty) का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था?
विष्णुवर्धन को होयसल वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक माना जाता है।
Q3. होयसल स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषता क्या थी?
जटिल नक्काशीदार पत्थर मंदिर, बहुभुजाकार गर्भगृह और सूक्ष्म मूर्तिकला होयसल स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
Q4. चन्नकेशव मंदिर कहाँ स्थित है और किसने बनवाया था?
चन्नकेशव मंदिर बेलूर में स्थित है और इसे विष्णुवर्धन ने बनवाया था।
Q5. होयसल वंश (Hoysala Dynasty) के पतन का कारण क्या था?
दिल्ली सल्तनत के आक्रमण और आंतरिक संघर्षों के कारण 14वीं शताब्दी में होयसल वंश का पतन हुआ।