मौर्य साम्राज्य की नींव और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(Foundation of the Mauryan Empire and Historical Background)

मौर्य साम्राज्य भारत के प्राचीन इतिहास का पहला सबसे बड़ा और संगठित साम्राज्य था, जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने 322 ई.पू. में की थी। यह साम्राज्य न केवल अपने भौगोलिक विस्तार के लिए प्रसिद्ध था, बल्कि इसके प्रशासनिक ढाँचे, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और सांस्कृतिक योगदानों ने भी भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। इस अध्याय में हम उस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझेंगे जिसने मौर्य साम्राज्य की नींव को संभव बनाया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1. नंद वंश का पतन
- नंद वंश, विशेषकर धननंद, अत्यधिक कर वसूली और अत्याचार के कारण अलोकप्रिय हो गया था।
- उसका प्रशासनिक केंद्रीकरण सुदृढ़ था, लेकिन जनता से उसका रिश्ता टूट चुका था।
- यह असंतोष मौर्य वंश की स्थापना में सहायक बना।
2. यूनानी आक्रमण और राजनीतिक चेतना
- अलेक्ज़ेंडर (सिकंदर) के आक्रमण (326 ई.पू.) ने उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीतिक स्थिरता को झकझोर दिया।
- यवन आक्रमणों से भारतीय राजाओं को विदेशी खतरे का अहसास हुआ, जिससे एक केंद्रीकृत शक्ति की आवश्यकता महसूस की गई।
3. मगध की महत्ता
- मगध, गंगा के मैदानी इलाकों में स्थित, एक प्रमुख और शक्तिशाली राज्य था।
- इसकी राजनीतिक स्थिरता, उर्वर भूमि, खनिज संसाधन, और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण ने इसे साम्राज्य के निर्माण के लिए आदर्श स्थल बना दिया।
चंद्रगुप्त मौर्य और कौटिल्य (चाणक्य)
1. चंद्रगुप्त मौर्य का उदय
- चंद्रगुप्त मौर्य मौर्य कुल से संबंध रखते थे, जो संभवतः एक निम्न कुल का क्षत्रिय वंश था।
- उन्होंने चाणक्य की मदद से नंदों को हटाकर मौर्य वंश की स्थापना की।
- यूनानी लेखकों (जैसे जस्टिन और कर्टियस) के अनुसार, चंद्रगुप्त ने सिकंदर की सेना के पीछे के इलाकों पर अधिकार कर लिया।
2. चाणक्य की भूमिका
- चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य या विष्णुगुप्त भी कहा जाता है, तक्षशिला के ब्राह्मण और महान राजनीतिक रणनीतिकार थे।
- उन्होंने “अर्थशास्त्र” नामक ग्रंथ की रचना की, जो शासन, कूटनीति और आर्थिक नीति का महान ग्रंथ है।
- चाणक्य ने चंद्रगुप्त को एक आदर्श शासक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मौर्य वंश की स्थापना
- चंद्रगुप्त मौर्य ने पहले नंद वंश को पराजित किया, फिर पश्चिमोत्तर में यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को भी हराया।
- 305 ई.पू. में सेल्यूकस से संधि कर उन्होंने सिंधु, अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक का क्षेत्र प्राप्त किया।
- इसके बदले सेल्यूकस को 500 हाथी दिए गए और संबंध मजबूत करने के लिए वैवाहिक संबंध भी हुए।
मौर्य साम्राज्य की प्रारंभिक सीमाएँ
- पूर्व में बंगाल, पश्चिम में अफगानिस्तान तक, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में नर्मदा नदी तक मौर्य साम्राज्य फैला।
- यह उस समय का सबसे विस्तृत और संगठित साम्राज्य था।
मौर्य काल से संबंधित प्रमुख ग्रंथ और स्रोत
| स्रोत | विवरण |
|---|---|
| अर्थशास्त्र | चाणक्य द्वारा रचित प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक सिद्धांतों पर आधारित ग्रंथ। |
| इंडिका | यूनानी यात्री मेगस्थनीज़ द्वारा लिखा गया भारत का विवरण, जो चंद्रगुप्त के दरबार में दूत था। |
| जैन और बौद्ध ग्रंथ | चंद्रगुप्त के जैन धर्म में दीक्षित होने और अशोक के बौद्ध धर्म स्वीकारने की जानकारी देते हैं। |
| शिलालेख और स्तंभ | मौर्य शासकों द्वारा स्थापित, जिनमें विशेषकर अशोक के अभिलेखों का उल्लेख महत्वपूर्ण है। |
मौर्य साम्राज्य की स्थापना केवल एक राजनीतिक क्रांति नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों की नींव भी थी। चंद्रगुप्त और चाणक्य की जोड़ी ने शासन की एक नई अवधारणा दी — जहां केंद्रीयकरण, नीति, कूटनीति और जनता की भलाई को प्राथमिकता दी गई। यह साम्राज्य भारतीय इतिहास में प्रशासनिक दृष्टिकोण से एक मील का पत्थर साबित हुआ।
चंद्रगुप्त मौर्य — जीवन, विजय अभियान और शासन
(Chandragupta Maurya: Life, Military Campaigns and Administration)
प्रारंभिक जीवन
- चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ माना जाता है। कुछ ग्रंथों में उन्हें मौर्य वंश का क्षत्रिय बताया गया है, जबकि जैन ग्रंथों में वे एक निम्न कुल से संबंधित बताए गए हैं।
- उन्होंने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की थी, जहाँ उनकी भेंट चाणक्य (कौटिल्य) से हुई।
- चाणक्य ने उनकी योग्यता को पहचाना और उन्हें प्रशिक्षित किया, जिससे वह एक सफल राजा बन सके।
सत्ता में आगमन
- नंद वंश के अंतिम राजा धननंद के अत्याचारों से जनता असंतुष्ट थी।
- चंद्रगुप्त और चाणक्य ने मिलकर नंदों को पराजित किया और लगभग 322 ई.पू. में मौर्य वंश की स्थापना की।
- इस विजय के साथ ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र को मौर्य शासन का केंद्र बनाया गया।
विजय अभियान
| क्षेत्र | विवरण |
|---|---|
| मगध | सबसे पहले नंदों को हराकर मगध पर अधिकार किया। |
| उत्तर-पश्चिम भारत | सिकंदर के गवर्नरों को हराकर पंजाब, सिंध, अफगानिस्तान तक विस्तार किया। |
| सेल्यूकस से युद्ध (305 ई.पू.) | चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस निकेटर को हराया और उससे आधुनिक पाकिस्तान, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान का क्षेत्र प्राप्त किया। |
| संधि और वैवाहिक संबंध | सेल्यूकस के साथ संधि कर वैवाहिक संबंध बनाए; बदले में 500 हाथी दिए गए। |
शासन व्यवस्था
प्रशासन
- एक केंद्रीकृत राजतंत्र की स्थापना की गई।
- राजा सर्वोच्च अधिकारी था, परंतु उसकी सहायता के लिए मंत्रिपरिषद कार्य करती थी।
- राज्य को प्रांतों में बाँटा गया, जिन पर कुमार (राजकुमार) अथवा महामात्य शासक के रूप में नियुक्त होते थे।
कानून और न्याय
- कठोर दंड व्यवस्था अपनाई गई, परंतु उसमें नीति और व्यवहार का संतुलन था।
- जासूसी तंत्र (गुप्तचर प्रणाली) अत्यंत प्रभावशाली था।
अर्थव्यवस्था
- भूमि कर सबसे महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत था।
- व्यापार, उद्योग, लघु कारीगरी और पशुपालन को भी बढ़ावा दिया गया।
सैन्य व्यवस्था
- एक संगठित और शक्तिशाली सेना रखी गई।
- मेगस्थनीज़ के अनुसार, चंद्रगुप्त के पास लगभग 6 लाख सैनिक थे।
धार्मिक जीवन
- प्रारंभ में ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे, परंतु अपने अंतिम जीवन में जैन धर्म अपना लिया।
- उन्होंने भद्रबाहु नामक जैन आचार्य के साथ दक्षिण भारत की यात्रा की।
- कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में उन्होंने अंतिम दिन उपवास (सल्लेखना) करते हुए बिताए।
यूनानी स्रोतों में चंद्रगुप्त
- मेगस्थनीज़ (सेल्यूकस का राजदूत) ने अपनी पुस्तक “इंडिका” में चंद्रगुप्त के शासन, राजधानी पाटलिपुत्र और भारतीय समाज का विस्तृत वर्णन किया है।
- वह चंद्रगुप्त के शासन से प्रभावित था और भारतीय प्रशासन प्रणाली की प्रशंसा करता था।
चंद्रगुप्त का महत्व
- उन्होंने एक बिखरे भारत को एकजुट कर एक शक्तिशाली साम्राज्य खड़ा किया।
- उनका शासन चाणक्य की दूरदर्शिता और नीति का प्रतिफल था।
- उनकी दूरदर्शी विदेश नीति, प्रशासनिक दक्षता, और सामाजिक समरसता ने मौर्य साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ बनाया।
चंद्रगुप्त मौर्य केवल एक विजेता नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और नीति-कुशल शासक भी थे। उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप को पहली बार एक व्यापक राजनीतिक इकाई में संगठित किया। उनकी शासन प्रणाली ने बाद के राजाओं के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया। चंद्रगुप्त और चाणक्य की जोड़ी ने भारत के इतिहास में एक नई शुरुआत की।
कौटिल्य (चाणक्य) और ‘अर्थशास्त्र’ की भूमिका
(Kautilya (Chanakya) and the Role of the Arthashastra)
कौटिल्य का परिचय
- कौटिल्य, जिन्हें चाणक्य या विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है, एक महान राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, और रणनीतिकार थे।
- वे तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य थे और उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को सत्ता तक पहुँचाने में प्रमुख भूमिका निभाई।
- उन्होंने ही मौर्य साम्राज्य की नीति और प्रशासनिक ढाँचे की नींव रखी।
‘अर्थशास्त्र’ ग्रंथ का महत्व
- ‘अर्थशास्त्र’ कौटिल्य द्वारा रचित एक प्रमुख ग्रंथ है, जो राजनीति, प्रशासन, सैन्य रणनीति, अर्थव्यवस्था, विधि और गुप्तचरी से संबंधित नीतियों का विस्तृत दस्तावेज है।
- यह ग्रंथ मौर्य शासन का वैचारिक और नीतिगत आधार था।
- ‘अर्थशास्त्र’ में 15 अधिकरण (अध्याय), 150 अध्याय और लगभग 180 अर्धश्लोक हैं।
अर्थशास्त्र के मुख्य विषय
| विषय | विवरण |
|---|---|
| राजनीति शास्त्र | राजा के कर्तव्य, मंत्रिपरिषद, युद्ध नीति और कूटनीति। |
| प्रशासन | कर प्रणाली, नगर व्यवस्था, न्यायिक संगठन, जासूसी तंत्र। |
| अर्थव्यवस्था | कृषि, व्यापार, उद्योग, जल-प्रबंधन, श्रमिक नीति। |
| सैन्य नीति | सेनानायक की भूमिका, सेना की संरचना और सुरक्षा उपाय। |
| राजनय | युद्ध और संधि की रणनीति, शत्रु राज्य से व्यवहार। |
| धर्म और नैतिकता | धर्म की व्यावहारिक उपयोगिता, राजा के लिए नैतिक आचरण। |
कौटिल्य की राजनीतिक विचारधारा
- राजा को धर्म और नीति दोनों का पालन करना चाहिए, लेकिन राज्य की रक्षा और समृद्धि सर्वोपरि है।
- कौटिल्य के अनुसार, “राज्य का सर्वोच्च उद्देश्य है — प्रजा की रक्षा और समृद्धि“।
- वे “सप्तांग सिद्धांत” के प्रवर्तक थे, जिसमें राज्य को सात अंगों का संगठन माना गया है:
- स्वामी (राजा)
- अमात्य (मंत्री)
- जनपद (प्रजा)
- दुर्ग (किला)
- कोश (धन)
- दंड (सेना)
- मित्र (सहायक राज्य)
गुप्तचरी व्यवस्था (Espionage System)
- कौटिल्य ने गुप्तचरों की दो श्रेणियाँ बताई:
- संधान – खुली जानकारी एकत्र करने वाले।
- उपेक्षक – छिपकर जानकारी लाने वाले।
- यह तंत्र राजद्रोह, कर चोरी, विदेशी षड्यंत्र आदि पर निगरानी रखता था।
कर और आर्थिक प्रबंधन
- राजा का प्रमुख कार्य राजकोष की सुरक्षा और वृद्धि था।
- कर प्रणाली अत्यंत संगठित थी, जिसमें कृषि, व्यापार, खनिज, वाणिज्यिक कर आदि शामिल थे।
- कालाबाजारी, मिलावट, भ्रष्टाचार आदि पर कठोर दंड निर्धारित थे।
‘अर्थशास्त्र’ की प्रासंगिकता
- यह ग्रंथ केवल प्राचीन भारत के लिए ही नहीं, बल्कि आज के समय में भी प्रशासनिक नीति, रणनीति, और आर्थिक योजना के क्षेत्र में प्रासंगिक है।
- अनेक समकालीन विचारक कौटिल्य को “भारत का मैकियावेली” कहते हैं, परंतु उनकी दृष्टि उससे कहीं व्यापक और नैतिक भी थी।
कौटिल्य मौर्य शासन की रीढ़ थे। उनका ‘अर्थशास्त्र’ केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक राज्य संचालन की संहिता थी। चंद्रगुप्त मौर्य की सफलताओं के पीछे उनकी नीति, रणनीति और कूटनीति की गहरी भूमिका थी। भारतीय इतिहास में कौटिल्य का स्थान सदैव सर्वोच्च रहेगा।
बिंदुसार का शासनकाल
(Bindusara’s Reign)
बिंदुसार मौर्य साम्राज्य के द्वितीय सम्राट थे और चंद्रगुप्त मौर्य तथा चाणक्य के उत्तराधिकारी। इनका शासनकाल लगभग 297 ई.पू. से 273 ई.पू. तक रहा। वे चंद्रगुप्त मौर्य और उनकी पत्नी दुर्धरा के पुत्र थे। यूनानी स्रोतों में इन्हें “अमित्रघात” (शत्रुओं का संहारक) और कुछ जगहों पर “अमित्रचेतस” कहा गया है।
बिंदुसार के शासन की मुख्य विशेषताएँ:
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| उत्तराधिकार | चंद्रगुप्त के जैन धर्म अपनाकर सन्यास लेने के बाद सिंहासन पर बिंदुसार का अभिषेक हुआ। |
| राजधानी | पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) |
| प्रशासनिक नीति | अपने पिता की नीतियों को जारी रखा, केंद्रीय प्रशासन मजबूत रहा। |
| धार्मिक दृष्टिकोण | अजीवक संप्रदाय के प्रति सहानुभूति; धार्मिक सहिष्णुता बरती। |
| विदेशी संपर्क | बिंदुसार के शासनकाल में यूनानी शासकों के साथ अच्छे कूटनीतिक संबंध बने रहे। |
| यूनानी स्रोत | यूनानी राजदूत डेइमेकस (Deimachus) को सेल्यूकस के उत्तराधिकारी अंतियोकस प्रथम ने बिंदुसार के दरबार में भेजा था। |
प्रशासन और साम्राज्य विस्तार:
- बिंदुसार ने अपने शासन में साम्राज्य को दक्षिण भारत तक विस्तारित किया।
- यूनानी इतिहासकारों के अनुसार, उन्होंने दक्षिण के 16 राज्यों को जीत लिया था, परंतु तमिल राज्यों — चोल, पांड्य, चेर — को नहीं जीता।
- साम्राज्य का प्रशासन पूर्ववत चाणक्य नीति के आधार पर संचालित होता रहा।
बिंदुसार और विदेशी संपर्क:
- यूनानी लेखक स्ट्राबो, प्लिनी और प्लुटार्क ने बिंदुसार का उल्लेख किया है।
- उन्होंने यूनानी शासक एंटिओकस प्रथम से शराब, अंजीर और एक यूनानी दार्शनिक भेजने का अनुरोध किया था, परन्तु दार्शनिक भेजने की अनुमति नहीं दी गई।
उत्तराधिकार:
- बिंदुसार की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अशोक ने सत्ता संभाली।
- अशोक का सत्ता ग्रहण काफ़ी संघर्षपूर्ण रहा क्योंकि उन्हें अपने भाइयों को हराकर सम्राट बनना पड़ा।
बिंदुसार का शासनकाल मौर्य साम्राज्य के स्थायित्व, विस्तार और प्रशासनिक दृढ़ता का काल रहा। उन्होंने अपने पिता की शासन परंपरा को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया और आने वाले अशोक युग की नींव को मज़बूत किया। वे भारतीय इतिहास में एक स्थिर लेकिन रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण शासक माने जाते हैं।
सम्राट अशोक – व्यक्तित्व, विजय अभियान और कलिंग युद्ध
(Emperor Ashoka: Personality, Campaigns & the Kalinga War)
सम्राट अशोक मौर्य वंश के तृतीय और सबसे प्रसिद्ध सम्राट थे। उनका शासनकाल (लगभग 273 ई.पू. – 232 ई.पू.) भारतीय इतिहास में एक नैतिक और धार्मिक परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। अशोक का सबसे प्रसिद्ध युद्ध था कलिंग युद्ध, जिसने उनके जीवन और नीतियों की दिशा बदल दी।
अशोक का व्यक्तित्व:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| नाम | अशोकवर्धन मौर्य |
| उपनाम | ‘देवानांप्रिय’, ‘प्रियदर्शी’ (अभिलेखों में) |
| प्रारंभिक स्वभाव | कठोर, महत्वाकांक्षी, सैनिक प्रवृत्ति |
| बाद का रूपांतरण | युद्ध के बाद करुणाशील, धर्मप्रिय, अहिंसावादी |
| धर्म और दर्शन | बौद्ध धर्म को आत्मसात किया और “धम्म” को राज्य नीति बनाया |
अशोक का विजय अभियान:
- अशोक के प्रारंभिक शासनकाल में कई सैनिक अभियानों के संकेत मिलते हैं, विशेषकर कलिंग युद्ध।
- उन्होंने उत्तर-पश्चिमी सीमाओं को सुरक्षित किया, छोटे राज्यों को मौर्य साम्राज्य में शामिल किया।
- अशोक ने अपने शासन को अफगानिस्तान से लेकर कर्नाटक तक फैला दिया था।
कलिंग युद्ध (Kalinga War):
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| समय | 261 ई.पू. |
| स्थान | वर्तमान ओडिशा का क्षेत्र |
| कारण | कलिंग एक स्वतंत्र गणराज्य था, जो मौर्य प्रभुत्व को स्वीकार नहीं कर रहा था। |
| परिणाम | भारी जनहानि (लगभग 1 लाख मृत्यु, 1.5 लाख बंदी) |
| प्रभाव | युद्ध की विभीषिका ने अशोक को आत्मचिंतन के लिए बाध्य किया। उन्होंने युद्ध और हिंसा का मार्ग त्याग दिया। |
कलिंग युद्ध के बाद रूपांतरण:
- युद्ध के बाद अशोक बौद्ध धर्म की ओर मुड़े और उन्होंने धम्म (नैतिकता आधारित जीवन) को अपनाया।
- अशोक ने अहिंसा, करुणा, सत्य, और सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता को अपनी शासन-नीति का मूल बनाया।
अशोक का दृष्टिकोण परिवर्तन (Post-War Transformation):
| पहले | बाद में |
|---|---|
| युद्ध और सैन्य विजय में विश्वास | अहिंसा और नैतिक शासन |
| भौतिक विजय | ‘धम्म विजय’ (नैतिक और धार्मिक विजय) |
| दमनात्मक शासन | करुणामयी प्रशासन |
| सैनिक दूत | ‘धम्ममहामात्र’ (धम्म प्रचारक अधिकारी) की नियुक्ति |
कलिंग युद्ध अशोक के जीवन का टर्निंग पॉइंट था। यह केवल एक युद्ध नहीं बल्कि मानवता की चेतना और आत्मबोध का प्रतीक बन गया। अशोक ने भारत ही नहीं, एशिया भर में बौद्ध धर्म और नैतिकता के मूल्यों का प्रसार किया। वे विश्व इतिहास में पहले ऐसे शासक माने जाते हैं, जिन्होंने युद्ध की सफलता के बजाय नैतिक मूल्यों और शांति को प्राथमिकता दी।
अशोक का ‘धम्म’ और उसके प्रमुख सिद्धांत
(Ashoka’s Dhamma and its Key Principles)
कलिंग युद्ध के पश्चात सम्राट अशोक ने न केवल बौद्ध धर्म को अपनाया, बल्कि एक ऐसी शासन-नीति विकसित की जिसे उन्होंने ‘धम्म’ कहा। अशोक का धम्म कोई संप्रदाय विशेष का धर्म नहीं था, बल्कि यह नैतिक आचरण, सामाजिक समरसता और सार्वभौमिक सहिष्णुता पर आधारित एक व्यवहारिक मार्ग था।
अशोक ने धम्म को केवल धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्रशासन और समाज की आधारशिला बनाया।
धम्म क्या था? (What was Dhamma?)
“धम्म” शब्द का अर्थ है – नीति, धर्म, आचार संहिता और जीवन का नैतिक मार्ग।
- यह न तो पूरी तरह से बौद्ध धर्म था, न ही कोई रूढ़ धार्मिक व्यवस्था।
- यह सामान्य नागरिकों, अधिकारियों, स्त्रियों, बच्चों, ब्राह्मणों, श्रमणों सभी के लिए आदर्श नैतिक व्यवहार का एक ढाँचा था।
धम्म के प्रमुख सिद्धांत (Key Principles of Ashoka’s Dhamma):
| सिद्धांत | विवरण |
|---|---|
| 1. अहिंसा (Non-Violence) | सभी प्राणियों के प्रति करुणा और हिंसा का त्याग – पशुबलि का निषेध। |
| 2. सत्य और संयम | सत्य बोलना, आत्मनियंत्रण और ईमानदारी से जीवन जीना। |
| 3. माता-पिता और गुरु की सेवा | परिवार, बड़ों और शिक्षकों के प्रति कर्तव्य भावना। |
| 4. सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता | धर्मों के बीच आपसी सम्मान और संवाद की नीति। |
| 5. दया और दान | निर्धनों, बुजुर्गों और रोगियों की सेवा और सहायता। |
| 6. स्वावलंबन और आत्मविवेक | खुद को सुधारना, दूसरों पर आरोप न लगाना। |
| 7. स्त्री-सम्मान और सामाजिक न्याय | महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और सामाजिक संतुलन। |
धम्म के प्रचार हेतु उपाय:
- धम्ममहामात्रों की नियुक्ति – विशेष अधिकारी जो धम्म का प्रचार करते थे।
- राजकीय यात्राएँ (धम्म यात्राएँ) – अशोक स्वयं प्रजा से मिलते और धम्म का प्रचार करते।
- अभिलेख (शिलालेख/स्तंभलेख) – धम्म के सिद्धांतों को जनता तक पहुँचाने हेतु।
- विदेशी प्रचार – अशोक ने धम्म के दूत श्रीलंका, मिस्र, सीरिया, ग्रीस आदि भेजे।
धम्म का प्रभाव:
| क्षेत्र | प्रभाव |
|---|---|
| राजनीति | शासन में नैतिकता का समावेश, दमन की जगह संवाद का स्थान। |
| समाज | जाति-पाति और वर्ग भेद में कमी, स्त्रियों और बच्चों की स्थिति में सुधार। |
| धर्म | बौद्ध धर्म का अंतरराष्ट्रीय प्रसार और अन्य धर्मों के साथ सहअस्तित्व। |
धम्म बनाम बौद्ध धर्म:
| बिंदु | धम्म | बौद्ध धर्म |
|---|---|---|
| स्वरूप | नैतिक और व्यावहारिक नीति | धार्मिक और दार्शनिक प्रणाली |
| उद्देश्य | राज्य और समाज में नैतिकता | मोक्ष/निर्वाण की प्राप्ति |
| प्रचार | सभी वर्गों में समान रूप से | विशेष रूप से बौद्ध अनुयायियों में |
सम्राट अशोक का ‘धम्म’ भारत के इतिहास में राजनीति और नैतिकता के विलय का अनुपम उदाहरण है। यह सिद्ध करता है कि शासन केवल शक्ति से नहीं, बल्कि करुणा, सेवा और नैतिक मूल्यों से भी चलाया जा सकता है। अशोक के धम्म ने भारतीय उपमहाद्वीप को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को धर्म, नैतिकता और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाया।
धर्मादेश और बौद्ध धर्म का प्रसार
(Edicts of Ashoka and the Spread of Buddhism)
सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद न केवल आंतरिक रूप से परिवर्तन किया, बल्कि एक नैतिक क्रांति की शुरुआत की। इस क्रांति का औपचारिक माध्यम बने – अशोक के धर्मादेश (Edicts)। ये धर्मादेश अशोक की नीति, धम्म और बौद्ध धर्म के प्रचार के साधन थे।
अशोक ने बौद्ध धर्म को केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं माना, बल्कि इसे एक लोककल्याणकारी नीति के रूप में अपनाया और पूरी दुनिया में फैलाया।
धर्मादेश (Ashoka’s Edicts):
अशोक ने अपने धार्मिक, नैतिक और प्रशासनिक आदेशों को शिलालेखों, स्तंभलेखों और गुहालेखों के माध्यम से जनता तक पहुँचाया। इन लेखों को ‘धम्मलिपियाँ’ भी कहा जाता है।
| प्रकार | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख शिलालेख (Major Rock Edicts) | 14 शिलालेख, नीति, प्रशासन, धम्म का वर्णन। |
| लघु शिलालेख (Minor Rock Edicts) | बौद्ध धर्म के प्रति व्यक्तिगत आस्था और प्रचार। |
| प्रमुख स्तंभलेख (Major Pillar Edicts) | धम्म के मूल सिद्धांत, धार्मिक सहिष्णुता। |
| लघु स्तंभलेख | विशिष्ट धार्मिक संदेश, जैसे – निगाली सागर स्तंभलेख। |
| गुहालेख (Cave Inscriptions) | बौद्ध भिक्षुओं और मठों के लिए निर्देश। |
प्रसिद्ध स्थान: शाहबाजगढ़ी, मानसेहरा, खालसी, रुम्मिंदेई, सांची, सारनाथ, दिल्ली-मेरठ, लौरिया-नंदनगढ़, गुजारात।
धर्मादेशों के प्रमुख विषय:
- धम्म का प्रचार और नैतिक जीवन
- सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता
- पशुबलि का निषेध
- माता-पिता, गुरु, स्त्री व वृद्धों का सम्मान
- धम्ममहामात्रों की नियुक्ति
- युद्ध के प्रति घृणा और अहिंसा का समर्थन
बौद्ध धर्म का प्रसार:
अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म ने अंतरराष्ट्रीय विस्तार प्राप्त किया। उन्होंने इसे जनमानस के अनुकूल बनाकर एक वैश्विक धर्म का स्वरूप दिया।
भारत में प्रसार:
- बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में विहार, स्तूपों और संघों की स्थापना।
- प्रमुख केंद्र: सारनाथ, सांची, नालंदा, वैशाली, कौशांबी।
विदेशों में प्रसार:
| क्षेत्र | माध्यम |
|---|---|
| श्रीलंका | महेंद्र (अशोक के पुत्र) और संघमित्रा (कन्या) द्वारा |
| म्यांमार (बर्मा) | व्यापारियों और भिक्षुओं के माध्यम से |
| यूनानी क्षेत्र | यवन राजाओं के दरबार में बौद्ध प्रचार |
| मध्य एशिया और चीन | रेशम मार्ग के ज़रिये भिक्षुओं का प्रवास |
अशोक और बौद्ध धर्म:
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| धार्मिक नीति | अशोक ने बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया, किंतु अन्य धर्मों का भी सम्मान किया। |
| तीसरी बौद्ध संगीति (250 ई.पू.) | मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में पाटलिपुत्र में हुई, धर्म का शुद्धिकरण और प्रचार की दिशा तय हुई। |
| बौद्ध स्थापत्य | सांची और भरहुत के स्तूपों का निर्माण, विहारों की स्थापना। |
| अंतरराष्ट्रीय संवाद | अशोक ने मिस्र, सीरिया, यूनान, श्रीलंका आदि देशों में बौद्ध दूत भेजे। |
अशोक के धर्मादेश केवल शासकीय घोषणाएँ नहीं थे, बल्कि ये राजनीति और धर्म का संयोजन थे। इन आदेशों ने बौद्ध धर्म को सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व पटल पर स्थापित कर दिया। अशोक का योगदान यह दर्शाता है कि एक शक्तिशाली राजा भी करुणा, अहिंसा और नैतिकता के मार्ग से इतिहास को दिशा दे सकता है।
मौर्य प्रशासनिक ढाँचा और केंद्रीकरण
(Mauryan Administrative Structure and Centralization)
मौर्य साम्राज्य भारत का पहला ऐसा राजनैतिक रूप से केंद्रीकृत साम्राज्य था, जिसने एक विशाल भूभाग पर एकसमान शासन व्यवस्था लागू की। यह व्यवस्था चंद्रगुप्त मौर्य और उनके गुरु कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा ‘अर्थशास्त्र’ में प्रतिपादित राज्य के सिद्धांतों पर आधारित थी। मौर्य प्रशासन अत्यंत संगठित, केंद्रीकृत और अनुशासित था, जो उस समय के अन्य समकालीन शासन-प्रणालियों से कहीं अधिक उन्नत था।
मौर्य शासन की प्रमुख विशेषताएँ:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| केंद्र में सम्राट | सर्वोच्च अधिकार संपन्न, न्याय और प्रशासन का मूल स्रोत। |
| केंद्रीकृत प्रशासन | समस्त शक्तियाँ केंद्र में निहित, प्रांतीय स्तर पर नियंत्रण। |
| राजा की सहायता हेतु मंत्रिपरिषद | मंत्री, युवराज, सेनापति, पुरोहित आदि प्रमुख सदस्य। |
| शक्तिशाली नौकरशाही | पदों का वर्गीकरण, नियुक्ति, निगरानी और दंड की व्यवस्था। |
केंद्रीय प्रशासन (Central Administration):
- सम्राट – शासन का सर्वोच्च प्रमुख, विधि, न्याय, सेना, धर्म सभी पर नियंत्रण।
- मंत्रिपरिषद (Mantriparishad) – निर्णयों में सहायता हेतु, कौटिल्य की भूमिका प्रमुख।
- महामात्रगण (Mahamatras) – विभिन्न विभागों और कार्यों के प्रमुख अधिकारी:
| अधिकारी | कार्य |
|---|---|
| धर्ममहामात्र | धर्म प्रचार और नैतिक आचरण की देखरेख |
| राजुक | राजस्व व भूमि सर्वेक्षण अधिकारी |
| युक्त | प्रशासनिक योजनाओं के कार्यान्वयनकर्ता |
| संधिविग्रहिक | शांति और युद्ध संबंधी कार्य |
| दुर्गपाल | किलों का संचालन |
| नगरक | नगर प्रशासन और नगर व्यवस्था अधिकारी |
प्रांतीय प्रशासन (Provincial Administration):
- मौर्य साम्राज्य को प्रांतों (जनपदों) में बाँटा गया था।
- प्रत्येक प्रांत का प्रमुख – कुमार (राजकुमार) या कोई उच्च अधिकारी नियुक्त होता था।
- प्रमुख प्रांत: तक्षशिला, उज्जयिनी, कांची, सुवर्णगिरि, पाटलिपुत्र (राजधानी)
| प्रशासनिक स्तर | प्रमुख अधिकारी |
|---|---|
| प्रांत (जनपद) | कुमार या प्रादेशिक महामात्र |
| जिला (अहारा) | स्थानीक |
| तालुका/ग्राम | ग्रामिक, गोप, वार्तिका |
नगर प्रशासन (Urban Administration):
विशेष रूप से पाटलिपुत्र में नगर प्रशासन की जटिल और सुव्यवस्थित प्रणाली थी। मगार्थन (Megasthenes) के अनुसार, नगर को 6 समितियों के अंतर्गत विभाजित किया गया था:
| समिति | कार्य |
|---|---|
| उद्योग समिति | शिल्प और उत्पादन कार्य |
| व्यापार समिति | व्यापार नियंत्रण |
| नागरिक समिति | जन्म-मृत्यु पंजीकरण |
| बिक्री समिति | वस्तु मूल्य निर्धारण |
| सेना समिति | सैन्य आपूर्ति व्यवस्था |
| यातायात समिति | सड़क, परिवहन, कर आदि |
कर व्यवस्था और राजस्व:
- भू-राजस्व: साम्राज्य की आय का प्रमुख स्रोत (लगभग 1/6 उत्पादन पर)
- पानी कर, पेशा कर, व्यापार कर, सीमा शुल्क आदि अन्य कर लागू थे
- सिंचाई व्यवस्था, खनन, वनों और पशुपालन से भी आय होती थी
- राज्य अर्थव्यवस्था में कृषि, उद्योग और वाणिज्य को संगठित करता था
गुप्तचर तंत्र (Spy System):
- ‘संस्थान’ और ‘संस्थानिक’ – दो गुप्तचर शाखाएँ
- गुप्तचरों का नेटवर्क राजा के लिए आँखे और कान
- विद्रोहों को रोकना, अधिकारियों की जाँच, जनता की भावना का आकलन
न्याय व्यवस्था:
- राजा सर्वोच्च न्यायाधीश
- धर्मशास्त्र, आचारशास्त्र और राजाज्ञा के अनुसार निर्णय
- दंडनीति कठोर थी, जिससे राज्य में अनुशासन बना रहता
- चोरी, भ्रष्टाचार, विद्रोह आदि पर सख्त दंड
सैन्य व्यवस्था:
- विशाल सेना: पैदल, अश्व, रथ, हाथी – चार अंग
- एक स्थायी सैन्य परिषद (6 विभागों के साथ) द्वारा संचालन
- सेना को वेतन और सामग्री राज्य द्वारा दी जाती थी
- सीमा सुरक्षा हेतु किले, चौकियाँ और सुदृढ़ संरचनाएँ
मौर्य प्रशासनिक ढाँचा एक आदर्श केंद्रीकृत राज्य तंत्र का उदाहरण था। राजा, मंत्रिपरिषद, महामात्र और अन्य अधिकारी मिलकर शासन को कार्यक्षम बनाते थे। इसके चलते एक विशाल साम्राज्य को न केवल एकसूत्र में बाँधना संभव हुआ, बल्कि समाज में न्याय, स्थायित्व और आर्थिक विकास को भी सुनिश्चित किया गया।
राजस्व व्यवस्था, कर प्रणाली और न्याय व्यवस्था
(Revenue System, Taxation and Judicial Administration in Mauryan Empire)
मौर्य साम्राज्य की शासन प्रणाली का आधार उसकी सुसंगठित राजस्व प्रणाली, कठोर कर व्यवस्था और दण्ड-प्रधान न्याय तंत्र था। कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ इस विषय में विस्तृत जानकारी देता है। इसके अनुसार मौर्य शासन अर्थनीति पर आधारित एक केंद्रीकृत राजकीय व्यवस्था थी, जहाँ राजस्व वसूली और न्याय व्यवस्था को अत्यधिक महत्त्व दिया गया था।
मौर्यकालीन राजस्व व्यवस्था (Mauryan Revenue System)
राजस्व प्रणाली मौर्य साम्राज्य की आर्थिक रीढ़ थी। इसकी सबसे प्रमुख विशेषताएँ थीं:
1. भूमि राजस्व (Bhumi Kar)
- राजस्व का प्रमुख स्रोत, कुल आय का लगभग 1/6 भाग
- भूमि का सर्वेक्षण कर उसकी उपज के आधार पर कर निर्धारण
- किसान राज्य का प्रत्यक्ष करदाता था
- भूमि को उत्पादकता के आधार पर वर्गीकृत किया गया था
2. उपज कर (Bhag)
- कृषि उत्पादन पर लिया जाने वाला कर
- अनाज, तिलहन, फल, सब्ज़ी आदि पर लागू
- नगद या अन्न रूप में वसूली की सुविधा
3. पशु और वन कर (Vanikar, Vanakar)
- चराई और वनों के उपयोग पर कर
- पशुपालकों, लकड़ी और औषधि संग्रहकर्ताओं पर
4. व्यापार और उत्पादन कर
- व्यापारी, शिल्पकार, कारीगरों पर व्यवसाय कर
- कारीगरों की आय पर कर वसूला जाता था
- व्यापारिक वस्तुओं पर शुल्क और टोल टैक्स भी लगाए जाते थे
5. सीमा शुल्क (Customs Duties)
- राज्य की सीमाओं पर सामान के आयात-निर्यात पर कर
- विदेशी व्यापार पर विशेष कर व्यवस्था
6. अतिरिक्त स्रोत
- खनिज, सिंचाई, मत्स्य पालन, खदानें और वनों से आय
- दंड, जुर्माना आदि भी राज्य की आय में शामिल
कर वसूली के अधिकारी
| अधिकारी | कार्य |
|---|---|
| राजुक | भूमि सर्वेक्षण, कर निर्धारण और वसूली |
| युक्त | करों का लेखा-जोखा और नियंत्रण |
| स्थानीक | स्थानीय स्तर पर कर व्यवस्था |
| गोप | ग्राम स्तर का कर अधिकारी |
न्याय व्यवस्था (Judicial System)
मौर्यकाल में न्याय प्रशासन अत्यंत व्यवस्थित, लेकिन कठोर था। यह मुख्यतः तीन स्तंभों पर आधारित था:
1. राजा – न्याय का सर्वोच्च स्रोत
- न्याय का अंतिम निर्णय सम्राट देता था
- ‘धर्म, आचार, और राजाज्ञा’ न्याय का आधार
2. न्यायिक अधिकारी
| अधिकारी | कार्य |
|---|---|
| धर्मस्थ | धार्मिक एवं सामाजिक मामलों का निपटारा |
| कर्मिक | दंड और अपराध से संबंधित मामलों का न्याय |
| महामात्र | उच्च न्यायिक अधिकारी |
3. दंड व्यवस्था (Dandaneeti)
- कौटिल्य के अनुसार राज्य के स्थायित्व हेतु कठोर दंड आवश्यक
- हत्या, चोरी, भ्रष्टाचार, विद्रोह – सभी पर कठोर दंड
- दंड का उद्देश्य – अपराध को रोकना और अनुशासन स्थापित करना
न्याय के स्रोत
- धर्मशास्त्र – धार्मिक कानून
- राजाज्ञा – राजा द्वारा घोषित विधि
- आचार – समाज में प्रचलित परंपराएँ
- युक्ति – न्यायिक विवेक का प्रयोग
मौर्यकालीन राजस्व व्यवस्था ने राज्य को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाया जबकि न्यायिक प्रणाली ने अनुशासन और व्यवस्था को बनाए रखा। यह एक ऐसी शासन प्रणाली का उदाहरण है जिसमें राजा के अधीन आर्थिक और न्यायिक शक्ति का संतुलन दिखाई देता है। कौटिल्य की ‘अर्थशास्त्र’ इस व्यवस्था का बौद्धिक आधार था, जो आज भी प्रशासनिक विज्ञान का एक श्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है।
मौर्य कालीन अर्थव्यवस्था: कृषि, वाणिज्य, शिल्प और व्यापार
(Economy of the Mauryan Period: Agriculture, Commerce, Crafts, and Trade)
मौर्य साम्राज्य की सफलता का मूल आधार उसकी सुनियोजित और विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था थी। यह अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि, वाणिज्य, शिल्पकला और आंतरिक व विदेशी व्यापार पर आधारित थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा मेगस्थनीज़ के इंडिका जैसे ग्रंथों से हमें मौर्यकालीन आर्थिक जीवन की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।
कृषि: आधारभूत आर्थिक संरचना
कृषि मौर्यकाल की मुख्य आर्थिक गतिविधि थी और अधिकांश जनसंख्या इससे जुड़ी थी।
प्रमुख विशेषताएँ:
- भूमि को उत्पादकता के आधार पर वर्गीकृत किया गया था
- सिंचाई के लिए नहरें, कूप और तालाबों का निर्माण कराया गया
- राजा के स्वामित्व वाली भूमि पर दासों और श्रमिकों से कृषि कार्य
- बीज और कृषि यंत्रों की व्यवस्था राज्य द्वारा की जाती थी
- प्रमुख फसलें: गेहूँ, जौ, चावल, तिल, कपास, गन्ना आदि
वाणिज्य और व्यापार (Commerce & Trade)
मौर्यकाल में व्यापार राज्य के अधीन रहा और इसे बढ़ावा देने हेतु व्यापक उपाय किए गए।
आंतरिक व्यापार:
- नगरों में हाट-बाजार और व्यापारिक केंद्र
- व्यापार मार्गों पर सुरक्षा और कर चौकियाँ (शुल्क चौकियाँ)
- सड़कें, विशेषकर उत्तरापथ और दक्षिणापथ, व्यापार के लिए प्रसिद्ध
समुद्री और विदेशी व्यापार:
- ताम्रलिप्ति, भरुकच्छ (भड़ौच), शुर्पारक (सोपारा) जैसे बंदरगाह सक्रिय
- रोम, मिश्र, यूनान और दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार
- निर्यात: सूती वस्त्र, मसाले, हाथी, हाथी-दांत, मसाले
- आयात: घोड़े, बहुमूल्य धातु, शराब, विलासिता की वस्तुएँ
व्यापारी वर्ग:
- श्रेणियाँ (Guilds) – व्यापारियों और शिल्पकारों के संगठन
- व्यापारी वर्ग को ‘सेठ, वणिज, श्रेठिन’ आदि कहा गया
शिल्प और कारीगरी (Crafts and Artisanship)
मौर्य काल में शिल्प और हस्तकला उद्योग अत्यंत उन्नत स्थिति में था।
प्रमुख कारीगरी और उद्योग:
| शिल्प | विवरण |
|---|---|
| कपड़ा उद्योग | सूती वस्त्र, रेशमी वस्त्र, रंगाई, कढ़ाई |
| धातु कारीगरी | ताँबा, लोहा, सोना, चाँदी से औज़ार और आभूषण |
| पत्थर पर नक्काशी | स्तंभ, मूर्तियाँ, स्थापत्य कार्य |
| मिट्टी के बर्तन | उत्तर भारत में काले चमकदार मृदभांड (N.B.P.W.) |
| हस्तशिल्प | हाथीदाँत, लकड़ी, सीप आदि की वस्तुएँ |
कारीगर वर्ग:
- शिल्पियों और कारीगरों की श्रेणियाँ होती थीं
- इनके कार्यों को नियंत्रित और विनियमित किया जाता था
- राज्य द्वारा प्रशिक्षण और कच्चे माल की आपूर्ति
आर्थिक नियोजन और राज्य की भूमिका
- अर्थशास्त्र में राजा को “प्रजा को समृद्ध बनाकर स्वयं समृद्ध बनने” की नीति दी गई
- कर, उत्पाद, मापन, व्यापार और श्रम पर राज्य का नियंत्रण
- अधिकारी वर्ग: संस्था प्रमुख, युक्त, लोकपाल, आदि आर्थिक कार्यों में संलग्न
- सरकारी कार्यशालाएँ और भंडार गृह स्थापित
मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था कृषि-प्रधान लेकिन वाणिज्य और शिल्प से संतुलित थी। इसमें राजा की सक्रिय भूमिका ने इसे संगठित और समृद्ध बनाया। वाणिज्यिक दृष्टिकोण से मौर्य साम्राज्य ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देकर भारत को प्राचीन विश्व की एक आर्थिक शक्ति बना दिया।
मौर्य कालीन कला, स्थापत्य और मूर्तिकला
(Mauryan Art, Architecture and Sculpture)
मौर्य काल भारतीय कला के इतिहास में एक सांस्कृतिक और स्थापत्य उत्कर्ष का युग था। यह वह समय था जब भारत में राज्याश्रित कला (State-sponsored Art) की शुरुआत हुई। सम्राट अशोक के शासनकाल में विशेष रूप से धार्मिक कला, स्तंभ निर्माण, शिलालेख, गुफा वास्तुकला और मूर्तिकला में अभूतपूर्व विकास देखा गया।
मौर्यकालीन कला की प्रमुख विशेषताएँ:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| राजकीय संरक्षण | कला और स्थापत्य को शाही संरक्षण प्राप्त था |
| धर्म प्रेरित कला | बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु कला का उपयोग |
| अशोक के स्तंभ | उत्कृष्ट नक्काशी, शेर की मूर्तियाँ |
| मौर्य पॉलिश | पत्थर पर चिकनी चमक, जो मौर्यकाल की विशेष पहचान है |
स्तंभ स्थापत्य (Pillar Architecture)
अशोक के स्तंभ:
- संपूर्ण भारत में लगभग 30 से अधिक अशोक स्तंभ पाए गए हैं
- मुख्यतः बलुआ पत्थर से बने
- इन स्तंभों पर धम्मलेख (धर्मादेश) खुदे होते थे
- स्तंभों की ऊपरी छवि (Capital) बहुत प्रसिद्ध – जैसे सारनाथ का सिंह स्तंभ
प्रमुख स्तंभ:
| स्थान | विशेषता |
|---|---|
| सारनाथ | सिंहों की चारमुखी मूर्ति – भारत का राष्ट्रीय प्रतीक |
| लौरिया-नंदनगढ़ | पूर्णतः संरक्षित स्तंभ |
| रुम्मिनदेई (नेपाल) | बुद्ध के जन्म स्थान को सूचित करता है |
शिलालेख और मूर्तिकला (Inscriptions and Sculpture)
- शिलालेखों को चट्टानों और स्तंभों पर ब्राह्मी लिपि में लिखा गया
- इनमें सम्राट अशोक के धम्म के सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है
- मूर्तिकला में पशु मूर्तियाँ (गाय, बैल, हाथी, सिंह) विशेष रूप से उकेरी गईं
- राजकीय मूर्तियाँ बारीकी, यथार्थ और गहराई के साथ तराशी गईं
गुफा वास्तुकला (Rock-cut Architecture)
बाराबर और नागार्जुनी की गुफाएँ:
- बिहार में स्थित ये गुफाएँ मौर्यकालीन स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण हैं
- मुख्यतः अजिवक संप्रदाय को समर्पित
- अंदर से दीवारें चिकनी और चमकदार (मौर्य पॉलिश)
- छतें अर्धवृत्ताकार और गूंज के लिए अनुकूल
मौर्यकालीन नगर नियोजन
- पाटलिपुत्र जैसे नगरों की दीवारें लकड़ी की होती थीं
- समरांगण सूत्रधार और अर्थशास्त्र में नगर व्यवस्था का वर्णन
- सड़कों का ग्रिड सिस्टम, जल निकासी की उचित व्यवस्था
- महलों और भवनों में लकड़ी और पत्थर का मिश्रित प्रयोग
मौर्यकालीन शिल्पकला की अन्य विशेषताएँ:
| क्षेत्र | विवरण |
|---|---|
| पॉलिश की कला | पत्थर की सतह को दर्पण जैसी चिकनाई देना |
| धार्मिक कला | बौद्ध प्रतीक: धर्मचक्र, अशोक चक्र, पद्म |
| प्राकृतिक रूपांकन | पशु, फूल, लताओं की मूर्तिकला |
| लोक कला | लोकशैली की मूर्तियाँ ग्रामीण जीवन से प्रेरित |
मौर्यकालीन कला और स्थापत्य न केवल तकनीकी रूप से उन्नत थे, बल्कि उन्होंने धर्म, संस्कृति और राज्य की चेतना को भी अभिव्यक्त किया। स्तंभों की भव्यता, गुफाओं की शांति, मूर्तियों की सूक्ष्मता और नगरों की योजना इस युग की कला दृष्टि और वास्तु कौशल को दर्शाती है। इस काल की कला ने आगे चलकर शुंग, कुषाण, गुप्त और अन्य भारतीय कला परंपराओं को गहरा प्रभाव प्रदान किया।
विदेशी संपर्क और यूनानी प्रभाव
(Foreign Contacts and Greek Influence in Mauryan Period)
मौर्य काल भारत के इतिहास में वह चरण था जब पहली बार भारत का पश्चिमी और मध्य एशिया से प्रत्यक्ष राजनयिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क हुआ। विशेष रूप से फारसी (ईरानी) और यूनानी (ग्रीक) सभ्यताओं से संपर्क के कारण भारत के प्रशासन, कला, वास्तुकला और मुद्रा प्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ा।
ईरानी और यूनानी संपर्क की पृष्ठभूमि
- 6वीं सदी ईसा पूर्व में फारस के अहमेनिद साम्राज्य ने सिंध और पंजाब को अपने साम्राज्य में शामिल किया।
- 4वीं सदी ई.पू. में मकदूनियाई सम्राट सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया (326 ई.पू.)।
- सिकंदर की मृत्यु (323 ई.पू.) के बाद उसके सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने भारत में शासन स्थापित करने की कोशिश की।
- चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को हराकर राजनयिक समझौता किया और राज्य विस्तार के साथ विदेशी संपर्क की नींव रखी।
चंद्रगुप्त और सेल्यूकस का समझौता
- चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच 305 ई.पू. में संधि हुई।
- सेल्यूकस ने भारत के पश्चिमी भूभाग (आधुनिक अफगानिस्तान, बलूचिस्तान) चंद्रगुप्त को सौंपे।
- इसके बदले में चंद्रगुप्त ने 500 हाथी दिए।
- सेल्यूकस ने भारत में अपना राजदूत मैगस्थनीज़ नियुक्त किया।
मैगस्थनीज़ और इंडिका (Indica)
- मैगस्थनीज़ ने मौर्य शासनकाल के पाटलिपुत्र में समय बिताया।
- उसने ‘इंडिका’ नामक ग्रंथ लिखा जिसमें मौर्य प्रशासन, समाज, नगर व्यवस्था, सैन्य संरचना आदि का विवरण है।
- यह ग्रंथ अब मूल रूप में उपलब्ध नहीं है, लेकिन यूनानी लेखकों के उद्धरणों से इसकी जानकारी मिलती है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| नगर योजना | पाटलिपुत्र की दीवारें, सड़कों और जल निकासी का वर्णन |
| प्रशासन | अधिकारियों की श्रेणियाँ, कर संग्रह प्रणाली |
| समाज | वर्ण व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति |
| सेना | विशाल सेना, हाथी-दल की भूमिका |
यूनानी प्रभाव के क्षेत्र:
1. प्रशासनिक प्रणाली:
- फारसी और यूनानी प्रभाव से भारत में राज्य के केंद्रीकरण, जासूसी व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था आदि पर असर पड़ा।
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में फारसी शैली के कई प्रशासनिक शब्द देखने को मिलते हैं।
2. सिक्के और मुद्रा प्रणाली:
- यूनानी संपर्क के बाद मौर्यकाल में धातु मुद्रा प्रणाली और मुद्रा की पद्धति अधिक संगठित हुई।
- पंचमार्क वाले सिक्कों का चलन मौर्यों के समय में और अधिक व्यवस्थित हुआ।
3. कला और स्थापत्य पर प्रभाव:
- मौर्यकालीन स्तंभों पर पाए जाने वाले बेलबूटे और आकृतियाँ यूनानी-फारसी शैली की झलक देती हैं।
- सारनाथ का अशोक स्तंभ यूनानी प्रभाव की छवि दर्शाता है (कुरसी पर घंटी के आकार की बनावट)।
4. राजनयिक संपर्क और दूतावास:
- मौर्य साम्राज्य ने यूनानी राज्यों से राजनयिक संबंध स्थापित किए।
- सेल्यूकस के बाद टॉलेमी, एंटिओकस, एंटिगोनस जैसे यूनानी शासकों के साथ संपर्क बना रहा।
- यूनानी राजदूत जैसे डियोनिसियस, डेमोक्रीटस आदि भी मौर्य दरबार में आए।
मौर्यकाल के बाद विदेशी प्रभाव का विस्तार
- मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में यूनानी, शक, पार्थियन और कुषाण जैसे विदेशी वंशों का आगमन हुआ।
- लेकिन इसकी नींव मौर्यकाल में रखी गई विदेशी नीति ने ही रखी थी।
मौर्य काल न केवल आंतरिक एकता और शक्ति का प्रतीक था, बल्कि यह भारत के विदेशी संबंधों और अंतरराष्ट्रीय पहचान का आरंभिक बिंदु भी था। यूनानी और फारसी संपर्कों से भारत को प्रशासन, वास्तुकला, कला और कूटनीति के नए आयाम मिले। मौर्य शासकों, विशेष रूप से चंद्रगुप्त और अशोक, ने इन विदेशी प्रभावों को भारतीय संस्कृति के साथ समरस कर एक समन्वित परंपरा को जन्म दिया।
13. मौर्यकालीन साहित्य और अभिलेख
(Literature and Inscriptions during the Mauryan Period)
मौर्यकाल भारतीय इतिहास का वह चरण है जब राजकीय संरक्षण में साहित्य, शास्त्र और अभिलेख लेखन को संगठित रूप मिला। विशेषकर सम्राट अशोक के समय में लेखन की परंपरा ने एक नया रूप लिया, जब धम्म प्रचार के लिए अभिलेखों का व्यापक प्रयोग हुआ। साथ ही इस काल में बौद्ध और जैन साहित्य तथा राजनीतिक शास्त्र जैसे ‘अर्थशास्त्र’ की रचना हुई, जो भारत की बौद्धिक और प्रशासनिक परंपरा की नींव बने।
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ
1. अर्थशास्त्र (कौटिल्य या चाणक्य द्वारा रचित)
- यह ग्रंथ राजनीति, अर्थव्यवस्था, सैन्य नीति, कूटनीति और शासन व्यवस्था का विस्तृत मार्गदर्शन करता है।
- लेखक: कौटिल्य (चाणक्य या विष्णुगुप्त), जो चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधान मंत्री थे।
- 15 अध्यायों में विभक्त यह ग्रंथ एक प्राचीन प्रशासनिक ग्रंथ है।
- इसमें गुप्तचर व्यवस्था, कर व्यवस्था, नगर व्यवस्था, दंडनीति, कृषि, वाणिज्य, और सामाजिक वर्गों की भूमिका** को बताया गया है।
| विषय | उल्लेख |
|---|---|
| शासन | राजा के कर्तव्य, दंड नीति |
| अर्थव्यवस्था | राजस्व, खनिज, व्यापार, कृषि |
| कूटनीति | मंडल सिद्धांत, संधि-विग्रह नीति |
| गुप्तचर | जासूसी तंत्र |
2. बौद्ध साहित्य (पालि भाषा में)
- मौर्य काल के दौरान विशेषकर अशोक के संरक्षण में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हुआ, जिससे बौद्ध साहित्य का भी विस्तार हुआ।
- प्रमुख ग्रंथ:
- त्रिपिटक: विनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक
- दीघ निकाय, मझ्झिम निकाय, थेरगाथा, थेरिगाथा
- अशोक के समय तीसरी बौद्ध परिषद (250 ई.पू.) में इन ग्रंथों का संकलन और प्रचार हुआ।
3. जैन साहित्य
- जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के उपदेशों का संकलन इस काल में प्रारंभ हुआ।
- जैन आगम (Agamas) की परंपरा इसी समय से सुदृढ़ हुई।
- मौर्य सम्राट बिंदुसार और उसके दरबारी कुछ हद तक जैन धर्म से प्रभावित रहे।
मौर्यकालीन अभिलेख (Inscriptions)
सम्राट अशोक के अभिलेख
अशोक ने धम्म के प्रचार हेतु पत्थरों, स्तंभों, गुफाओं आदि पर प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग करते हुए अभिलेख लिखवाए।
| प्रकार | विवरण |
|---|---|
| शिलालेख (Rock Edicts) | पहाड़ों और चट्टानों पर |
| स्तंभलेख (Pillar Edicts) | अशोक स्तंभों पर |
| लघु शिलालेख | छोटे क्षेत्रीय निर्देश |
| बौद्ध गुफा लेख | बाराबर गुफाओं में |
प्रमुख शिलालेख:
| क्रम | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| 1 | गिरनार (गुजरात) | सामाजिक नीति |
| 2 | कौशांबी (उ.प्र.) | धम्म प्रचार |
| 3 | शाहबाजगढ़ी (पाकिस्तान) | ब्राह्मी के साथ खरोष्ठी लिपि |
| 4 | सारनाथ स्तंभ | सिंहों की मूर्ति (राष्ट्रीय प्रतीक) |
| 5 | दिल्ली-टोपरा, लौरिया नंदनगढ़ | धम्म महामात्रों की नियुक्ति |
विषय-वस्तु:
- पशु वध पर प्रतिबंध
- धार्मिक सहिष्णुता
- स्त्री सम्मान
- जनकल्याणकारी कार्य (कुएँ, वृक्षारोपण, चिकित्सा व्यवस्था)
- सभी धर्मों के लिए आदर
लिपि और भाषा
- ब्राह्मी लिपि: अधिकांश अशोक के अभिलेख इसी लिपि में हैं।
- प्राकृत भाषा: सरल और जनसाधारण की समझ वाली भाषा।
- उत्तर-पश्चिम भारत में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग।
अभिलेखों का महत्व
- भारत का प्रथम राजकीय अभिलेख लेखन अशोक द्वारा आरंभ हुआ।
- इन अभिलेखों ने भारत के इतिहास को दिनांकबद्ध और प्रमाणित करने में सहूलियत दी।
- धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत मूल्यवान।
मौर्यकाल न केवल एक राजनीतिक महाशक्ति का युग था, बल्कि यह ज्ञान, विचार, नैतिकता और अभिव्यक्ति का युग भी था। इस युग के अभिलेखों और साहित्यिक ग्रंथों ने न केवल तत्कालीन प्रशासन, धर्म और संस्कृति को परिभाषित किया, बल्कि आधुनिक भारत के ऐतिहासिक अध्ययन की नींव भी रखी। विशेषकर अशोक के अभिलेख और कौटिल्य का अर्थशास्त्र आज भी राजनीति और प्रशासन के अद्वितीय संदर्भ बने हुए हैं।
मौर्य साम्राज्य का विघटन: कारण और परिणाम
(Decline of the Maurya Empire: Causes and Consequences)
मौर्य साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप का पहला और सबसे विशाल साम्राज्य था, जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की और उत्कर्ष सम्राट अशोक के शासनकाल में हुई। लेकिन अशोक की मृत्यु के बाद यह साम्राज्य धीरे-धीरे बिखरने लगा और अंततः 185 ई.पू. में अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या के साथ समाप्त हो गया। आइए इस साम्राज्य के विघटन के कारणों और उसके दूरगामी प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करें।
मौर्य साम्राज्य के विघटन के प्रमुख कारण:
1. अशोक की अहिंसावादी नीति:
- अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद अहिंसा और धम्म को अपनाया।
- सैन्य विस्तार और आक्रामक रणनीति को त्याग देने से साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा क्षीण हुई।
- सीमांत क्षेत्रों पर नियंत्रण कमजोर पड़ा।
2. केन्द्रीय सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण:
- मौर्य शासन अत्यधिक केन्द्रीकृत था, जिसमें अधिकांश निर्णय केंद्र से लिए जाते थे।
- अशोक के बाद कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण यह केंद्रीकरण प्रशासनिक अस्थिरता में बदल गया।
3. प्रशासनिक बोझ और खर्च:
- विशाल साम्राज्य में व्यापक प्रशासनिक व्यवस्था, धम्म महामात्रों की नियुक्ति, जनता के कल्याण की योजनाएँ अत्यधिक खर्चीली थीं।
- अशोक की धार्मिक और सामाजिक परियोजनाओं ने राज्य की आय पर दबाव डाला।
4. कमजोर उत्तराधिकारी:
- अशोक के बाद कोई भी मौर्य शासक उसकी तरह योग्य नहीं निकला।
- साम्राज्य धीरे-धीरे क्षेत्रीय शक्तियों में बँटने लगा।
5. धार्मिक और सामाजिक परिवर्तन:
- बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ ब्राह्मणों और परंपरावादियों में असंतोष बढ़ा।
- सामाजिक संतुलन में बदलाव से भी अस्थिरता उत्पन्न हुई।
6. प्रांतीय शासकों की बढ़ती शक्ति:
- साम्राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में नियुक्त प्रांतपति (गवर्नर) स्वतंत्र होने लगे।
- इनका केन्द्रीय सत्ता पर विश्वास कम होता गया और विद्रोह आरंभ हो गए।
7. आंतरिक विद्रोह और षड्यंत्र:
- अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की और शुंग वंश की स्थापना की।
- यह एक स्पष्ट राजनीतिक षड्यंत्र था जिसने मौर्य वंश का अंत कर दिया।
मौर्य साम्राज्य के विघटन के परिणाम:
| प्रभाव | विवरण |
|---|---|
| राजनीतिक विखंडन | भारत में कई छोटे-छोटे राज्य और गणराज्य उभरने लगे। केंद्रीकृत साम्राज्य का पतन हुआ। |
| शुंग वंश का उदय | सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य सम्राट की हत्या कर नए राजवंश की नींव रखी। |
| बौद्ध धर्म का ह्रास | शुंगों के शासन में बौद्ध धर्म को राज्याश्रय नहीं मिला; ब्राह्मणवाद को पुनः बल मिला। |
| ब्राह्मण पुनरुत्थान | अशोक के पश्चात ब्राह्मणों की स्थिति में सुधार हुआ और वैदिक परंपराएँ फिर से जीवित हुईं। |
| विदेशी आक्रमणों का रास्ता खुला | उत्तर-पश्चिम की सीमाओं की रक्षा कमज़ोर होने से शकों, यवनों और कुषाणों के लिए भारत में प्रवेश आसान हुआ। |
मौर्य साम्राज्य का विघटन केवल राजनीतिक पराजय नहीं था, बल्कि यह उस समय के धार्मिक, प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों का परिणाम भी था। साम्राज्य की एकता के टूटने के बावजूद मौर्य काल ने एक प्रशासनिक आदर्श, धम्म आधारित शासन, और एक व्यापक सांस्कृतिक विरासत भारत को दी, जिसे शुंग, सातवाहन और अन्य राजवंशों ने आगे बढ़ाया। यह पतन हमें बताता है कि एक साम्राज्य की शक्ति केवल युद्ध या धर्म से नहीं, बल्कि स्थायी संस्थाओं और सशक्त उत्तराधिकार से टिकाऊ बनती है।
शुंग एवं कण्व वंश: उत्तर मौर्य काल की विरासत
(Shunga and Kanva Dynasties: The Legacy of Post-Mauryan Period)
मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही भारतीय इतिहास में उत्तर मौर्य काल की शुरुआत हुई, जिसका प्रमुख नेतृत्व शुंग वंश और उसके पश्चात कण्व वंश ने किया। यह काल न केवल राजनीतिक संक्रमण का था, बल्कि धार्मिक पुनर्जागरण, संस्कृतिक पुनर्निर्माण और विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष का भी काल रहा। इन वंशों ने मौर्य परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एक नई सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान स्थापित की।
शुंग वंश का उदय और शासन:
1. पुष्यमित्र शुंग का साम्राज्यस्थापन (185 ई.पू.):
- अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सत्ता ग्रहण की।
- पुष्यमित्र स्वयं ब्राह्मण था और उसने वैदिक परंपराओं को पुनर्जीवित किया।
2. ब्राह्मणवाद का पुनरुत्थान:
- अशोक के काल में प्रभावी बौद्ध धर्म की अपेक्षा शुंगों ने ब्राह्मण धर्म को संरक्षण दिया।
- वेदों का पुनः पाठन, यज्ञों की पुनर्स्थापना की गई।
- अश्वमेध यज्ञ का आयोजन स्वयं पुष्यमित्र ने किया।
3. विदेशी आक्रमणों का प्रतिरोध:
- पुष्यमित्र ने यवनों (Indo-Greeks) के विरुद्ध सफल अभियान चलाया।
- उसने मिनांडर (मेलिंद) जैसे यूनानी शासकों की चुनौती का सामना किया।
4. शुंगों की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ:
- भारहुत और साँची के स्तूपों का पुनरुद्धार इसी काल में हुआ।
- बौद्ध धर्म की सार्वजनिक संरचनाएँ भी बनीं, हालाँकि राज्याश्रय ब्राह्मण धर्म को मिला।
5. शुंग वंश के उत्तराधिकार:
- पुष्यमित्र के बाद अग्निमित्र, वसुमित्र, और अन्ततः देवभूति शुंग वंश के शासक हुए।
- अंतिम शासक देवभूति की हत्या कण्व वंश के संस्थापक वसुदेव कण्व ने की।
कण्व वंश का उदय और शासन:
1. कण्व वंश की स्थापना (73 ई.पू.):
- ब्राह्मण वंशीय वसुदेव कण्व ने देवभूति की हत्या कर शुंग साम्राज्य को समाप्त किया।
- उसने विदिशा को अपनी राजधानी बनाया।
2. राजनीतिक सीमाएँ:
- कण्व वंश का साम्राज्य अत्यधिक सीमित था, विशेषकर मध्य भारत (विदिशा, उज्जयिनी) तक ही सीमित रहा।
- कोई विशेष युद्ध या साम्राज्य विस्तार की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
3. धार्मिक नीति:
- शुंगों की तरह कण्वों ने भी ब्राह्मणवाद को संरक्षण दिया।
- लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म को भी प्रत्यक्ष रूप से विरोध नहीं किया।
4. कण्व वंश का अंत:
- अंतिम कण्व शासक सुशर्मन को आंध्र (सातवाहन) वंश ने पराजित किया और कण्व वंश समाप्त हुआ।
उत्तर मौर्य काल की विरासत:
| क्षेत्र | योगदान/विशेषताएँ |
|---|---|
| राजनीति | ब्राह्मण नेतृत्व वाली सत्ता संरचना का विकास, यवन आक्रमणों का प्रतिरोध |
| धर्म | वैदिक ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना, बौद्ध धर्म का स्वतंत्र अस्तित्व |
| कला | साँची-भारहुत जैसे स्तूपों का निर्माण और सज्जा, शुंग कला शैली का विकास |
| संस्कृति | संस्कृत साहित्य, यज्ञों की पुनः प्रतिष्ठा, पौराणिक ग्रंथों का पुनरुद्धार |
| सामाजिक व्यवस्था | वर्ण व्यवस्था को पुनः सुदृढ़ किया गया, ब्राह्मणों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी |
शुंग एवं कण्व वंश, मौर्य साम्राज्य के बाद भारत के धार्मिक पुनरुत्थान, राजनीतिक स्थिरता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक बने। इन वंशों ने मौर्य काल की अनेक प्रशासनिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को संरक्षित करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। विशेषकर शुंगों की नीति ने ब्राह्मण धर्म के नवजीवन, यवनों के प्रतिरोध, और कला के नवोदय को संभव बनाया।