वायुमंडलीय दाब और पवन प्रणाली (Atmospheric Pressure and Wind Systems)

 वायुमंडलीय दाब और पवन प्रणाली (Atmospheric Pressure and Wind Systems)

वायुमंडलीय दाब (Atmospheric Pressure) और पवन प्रणाली (Wind Systems) पृथ्वी के जलवायु तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह दोनों मिलकर मौसम, जलवायु परिवर्तन, समुद्री धाराओं और वर्षा प्रणाली को प्रभावित करते हैं। इस अध्याय में, हम वायुमंडलीय दाब बेल्ट, विभिन्न प्रकार की पवनें, चक्रवात और जेट धाराओं के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे।

  • वायुमंडलीय दाब बेल्ट और उनका स्थानांतरण
  • पवन के प्रकार: व्यापारिक पवन, पछुआ पवन, ध्रुवीय पवन, मानसूनी पवन
  • चक्रवात और जेट धाराएँ

1. वायुमंडलीय दाब बेल्ट और उनका स्थानांतरण (Pressure Belts and Their Shifting)

वायुमंडलीय दाब क्या है?

वायुमंडलीय दाब वह बल है, जो पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा प्रति इकाई क्षेत्र पर डाला जाता है। इसका मापन मिलीबार (mb) या हेक्टोपास्कल (hPa) में किया जाता है। औसतन, समुद्र तल पर वायुमंडलीय दाब 1013.25 hPa होता है।

मुख्य दाब पट्टियाँ (Pressure Belts of Earth)

पृथ्वी पर तापमान वितरण और पवन परिसंचरण के कारण 7 प्रमुख दाब पट्टियाँ बनती हैं:

  1. उच्च तापीय निम्न दाब पट्टी (Equatorial Low Pressure Belt) – 0° से 5° अक्षांश:

    • यहाँ सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिससे अत्यधिक गर्मी होती है।
    • गर्म हवा ऊपर उठती है, जिससे निम्न दाब क्षेत्र बनता है।
    • इसे “डोलड्रम्स (Doldrums)” भी कहते हैं, क्योंकि यहाँ हवाएँ शांत होती हैं।
  2. उष्णकटिबंधीय उच्च दाब पट्टियाँ (Subtropical High Pressure Belts) – 25° से 35° अक्षांश:

    • गर्म हवा ऊपर उठकर ठंडी होकर नीचे आती है।
    • इस क्षेत्र को “घोड़ों की शांति पट्टी (Horse Latitudes)” कहा जाता है।
    • यहाँ शुष्क जलवायु पाई जाती है, जिससे अधिकांश रेगिस्तान इसी क्षेत्र में स्थित होते हैं।
  3. औषधि पवन निम्न दाब पट्टियाँ (Subpolar Low Pressure Belts) – 60° अक्षांश:

    • यहाँ ठंडी और गर्म हवाएँ आपस में मिलती हैं, जिससे निम्न दाब बनता है।
    • इस क्षेत्र में तीव्र चक्रवात बनने की संभावना रहती है।
  4. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टियाँ (Polar High Pressure Belts) – 90° अक्षांश:

    • ध्रुवीय क्षेत्रों में अत्यधिक ठंड के कारण हवा भारी होती है और नीचे बैठती है।
    • इससे उच्च दाब क्षेत्र बनता है।

दाब पट्टियों का स्थानांतरण

  • ग्रीष्म ऋतु (Summer): सूर्य उत्तरायण (Tropic of Cancer – 23.5°N) की ओर होता है, जिससे दाब पट्टियाँ उत्तर की ओर खिसक जाती हैं।
  • शीत ऋतु (Winter): सूर्य दक्षिणायण (Tropic of Capricorn – 23.5°S) की ओर होता है, जिससे दाब पट्टियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।

2. पवन के प्रकार (Types of Winds)

पृथ्वी की सतह पर पवनें मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं:

(i) प्रधान पवनें (Primary or Planetary Winds)

ये पवनें पूरे वर्ष एक निश्चित दिशा में बहती हैं और तीन प्रकार की होती हैं:

  1. व्यापारिक पवनें (Trade Winds) – 0° से 30° अक्षांश:

    • यह पवनें उष्णकटिबंधीय उच्च दाब क्षेत्र से विषुवतीय निम्न दाब क्षेत्र की ओर चलती हैं।
    • उत्तरी गोलार्ध में यह उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवन (Northeast Trade Winds) कहलाती हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवन (Southeast Trade Winds)
    • ये वर्षा और मानसून को प्रभावित करती हैं।
  2. पछुआ पवनें (Westerlies) – 30° से 60° अक्षांश:

    • यह हवाएँ उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब क्षेत्र से उपध्रुवीय निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहती हैं।
    • उत्तरी गोलार्ध में यह दक्षिण-पश्चिमी पछुआ पवनें (Southwest Westerlies) और दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर-पश्चिमी पछुआ पवनें (Northwest Westerlies) कहलाती हैं।
    • यह हवाएँ यूरोप और अमेरिका के मौसम को प्रभावित करती हैं।
  3. ध्रुवीय पवनें (Polar Winds) – 60° से 90° अक्षांश:

    • यह पवनें ध्रुवीय उच्च दाब क्षेत्र से उपध्रुवीय निम्न दाब क्षेत्र की ओर चलती हैं।
    • यह बहुत ठंडी और शुष्क होती हैं।

(ii) मौसमी पवनें (Seasonal or Monsoonal Winds)

  • मानसूनी पवनें (Monsoon Winds) मौसमी रूप से दिशा बदलती हैं।
  • गर्मी में ये समुद्र से भूमि की ओर चलती हैं, जिससे वर्षा होती है।
  • सर्दियों में ये भूमि से समुद्र की ओर चलती हैं, जिससे शुष्क मौसम बनता है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून वर्षा लाता है।

(iii) स्थानीय पवनें (Local Winds)

  • ये हवाएँ किसी विशेष क्षेत्र में स्थानीय कारणों से चलती हैं।
  • प्रमुख उदाहरण:
    • लू (Loo): भारत में गर्मियों में चलने वाली गर्म और शुष्क हवा।
    • फेन (Föhn): यूरोप में बहने वाली गर्म और शुष्क हवा।
    • मिस्ट्रल (Mistral): फ्रांस में ठंडी तेज़ हवा।

3. चक्रवात और जेट धाराएँ (Cyclones and Jet Streams)

चक्रवात और जेट धाराएँ पृथ्वी के वायुमंडलीय परिसंचरण के महत्वपूर्ण घटक हैं। ये दोनों प्राकृतिक घटनाएँ मौसम और जलवायु को गहराई से प्रभावित करती हैं। चक्रवात एक निम्न दाब क्षेत्र है, जिसमें हवाएँ केंद्र की ओर घूमती हैं, जबकि जेट धाराएँ उच्च ऊँचाई पर तेज़ गति से चलने वाली पवन धाराएँ हैं। इस अध्याय में, हम चक्रवातों और जेट धाराओं के प्रकार, उनके निर्माण के कारण और उनके प्रभावों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।


3.1 चक्रवात (Cyclones)

चक्रवात क्या है?

चक्रवात एक निम्न दाब प्रणाली है, जिसमें वायु केंद्र की ओर घूमती है और ऊपर उठती है। उत्तरी गोलार्ध में ये वामावर्त (Counterclockwise) दिशा में घूमते हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में ये दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घूमते हैं।

चक्रवातों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है:

(i) उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)

परिभाषा:
उष्णकटिबंधीय चक्रवात महासागरों के गर्म जल वाले क्षेत्रों में विकसित होने वाले तीव्र निम्न दाब वाले तूफान होते हैं।

निर्माण के कारण:

  1. समुद्र की सतह का तापमान 27°C या अधिक होना चाहिए।
  2. जलवाष्प का तीव्र वाष्पीकरण और संवहन।
  3. कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect) की उपस्थिति।
  4. कम ऊर्ध्वाधर पवन कतरन (Vertical Wind Shear)।
  5. निम्न दाब क्षेत्र का निर्माण और गहरे बादलों का संघटन।

संरचना:

  1. आँख (Eye):
    • यह चक्रवात का केंद्र होता है।
    • यहाँ हवाएँ शांत रहती हैं और बादल नहीं होते।
  2. आँख की दीवार (Eye Wall):
    • यह सबसे विनाशकारी क्षेत्र होता है, जहाँ तेज़ हवाएँ और भारी वर्षा होती है।
  3. वर्षा पट्टियाँ (Rain Bands):
    • यह घुमावदार बादलों की पट्टियाँ होती हैं, जो आँधी और मूसलधार बारिश लाती हैं।

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नामकरण:

  • अमेरिका में – हरिकेन (Hurricane)
  • जापान में – टाइफून (Typhoon)
  • ऑस्ट्रेलिया में – विली-विली (Willy-Willy)
  • भारत में – चक्रवात (Cyclone)

प्रभाव:

  1. भारी वर्षा और बाढ़।
  2. तेज़ हवाएँ, जिससे मकानों और बुनियादी ढाँचे को नुकसान।
  3. फसलों को हानि और जलभराव।
  4. मानव जीवन और संपत्ति का विनाश।

भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात:

  • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में विकसित होते हैं।
  • 2019 में आया ‘फानी चक्रवात’ (भारत का सबसे विनाशकारी चक्रवातों में से एक)।

(ii) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones)

परिभाषा:
ये चक्रवात 30° से 65° अक्षांशों के बीच विकसित होते हैं और मुख्य रूप से वायुमंडलीय मोर्चों (Atmospheric Fronts) से जुड़े होते हैं।

निर्माण के कारण:

  1. गर्म और ठंडी हवाओं का मिलन।
  2. मध्य अक्षांशीय पश्चिमी पवनें (Westerlies) और ध्रुवीय पवनों (Polar Winds) का परस्पर क्रिया।
  3. स्थानीय वायुदाब परिवर्तनों के कारण।

संरचना:

  • इन चक्रवातों में एक गर्म मोर्चा (Warm Front) और एक ठंडा मोर्चा (Cold Front) होता है।
  • इनसे वर्षा, बर्फबारी और तेज़ हवाएँ उत्पन्न होती हैं।

प्रभाव:

  1. वर्षा और हिमपात।
  2. कृषि पर सकारात्मक प्रभाव।
  3. ठंडे देशों में बर्फीले तूफानों का कारण।

भारत में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात:

  • भारत में यह पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) के रूप में आते हैं और उत्तरी भारत में सर्दियों की वर्षा लाते हैं।

3.2 जेट धाराएँ (Jet Streams)

जेट धाराएँ क्या हैं?

जेट धाराएँ वायुमंडल के ऊपरी भाग (10-15 किमी ऊँचाई) में तेज़ गति से बहने वाली संकरी वायुधाराएँ हैं। इनकी गति 110 से 400 किमी/घंटा तक हो सकती है।

मुख्य प्रकार की जेट धाराएँ:

  1. ध्रुवीय जेट (Polar Jet Streams) – 50° से 60° अक्षांश पर।
  2. उष्णकटिबंधीय जेट (Subtropical Jet Streams) – 25° से 35° अक्षांश पर।

भारत में जेट धाराएँ और उनका प्रभाव:

  1. गर्मी में जेट धाराएँ उत्तर की ओर चली जाती हैं, जिससे मानसून सक्रिय होता है।
  2. सर्दियों में यह दक्षिण की ओर खिसकती हैं, जिससे शीतलहर बढ़ जाती है।
  3. पश्चिमी विक्षोभ को भारत में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

जेट धाराओं का वैश्विक प्रभाव:

  1. मौसम पूर्वानुमान में सहायता।
  2. विमानों की उड़ान को प्रभावित करती हैं।
  3. मौसम के अचानक बदलाव का कारण।

चक्रवात और जेट धाराएँ पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक हैं। उष्णकटिबंधीय और शीतोष्ण चक्रवात विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं को जन्म देते हैं, जबकि जेट धाराएँ मौसम परिवर्तन को नियंत्रित करती हैं। इनकी गहरी समझ मौसम पूर्वानुमान और प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकती है।

वायुमंडलीय दाब और पवन प्रणाली पृथ्वी के जलवायु तंत्र को नियंत्रित करते हैं। व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें और मानसूनी पवनें मौसम के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चक्रवात और जेट धाराएँ भी मौसम परिवर्तन को प्रभावित करती हैं। इन सभी तत्वों की समझ हमें जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में सहायता कर सकती है।