चोल वंश भारत के दक्षिणी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में प्राचीन और मध्यकालीन समय में अत्यंत शक्तिशाली साम्राज्य रहा। यह वंश चालुक्यों और पल्लवों के उत्तराधिकारी के रूप में उभरा और 9वीं से 13वीं शताब्दी ईस्वी तक दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रभुत्व बनाए रखा। चोल वंश का शासनकाल दक्षिण भारत के राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का स्वर्ण युग माना जाता है।
चोल वंश (Chola Dynasty) उत्पत्ति और इतिहास
- चोल वंश का उल्लेख प्राचीन तमिल साहित्य और संगम काल में मिलता है।
- प्रारंभिक चोल शासन (300 ई.पू. – 300 ई.) सीमित क्षेत्र पर आधारित था।
- 9वीं शताब्दी में विजयनंतराया चोल और अर्द्ध-मध्यकालीन चोल शासक ने पल्लव साम्राज्य का उत्तराधिकार संभाला।
- मुख्य राजधानी तंजावुर (Thanjavur) और बाद में गंगा/चोलवती (Gangaikonda Cholapuram) थी।
चोल वंश (Chola Dynasty) प्रमुख शासक और उनका योगदान
- अदित्य चोल (871–907 ई.)
- प्रारंभिक चोल साम्राज्य के पुनर्निर्माता।
- पल्लवों और पांड्यों के विरुद्ध युद्ध कर दक्षिण तमिलनाडु पर प्रभुत्व स्थापित किया।
- राजराजा चोल प्रथम (985–1014 ई.)
- चोल साम्राज्य का स्वर्ण युग।
- राजधानी तंजावुर।
- ब्रहदेश्वर (तंजावुर) मंदिर का निर्माण।
- श्रीलंका, मालदीव, और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया और मलेशिया) में समुद्री विस्तार।
- प्रशासनिक सुधार: जिलों (Mandalam) और तहसीलों (Valanadu) में विभाजन।
- राजेंद्र चोल प्रथम (1012–1044 ई.)
- राजराजा चोल का उत्तराधिकारी।
- समुद्री अभियान: श्रीलंका, मालदीव, सुमात्रा और जावा तक विजय।
- राजधानी: गंगा-कोण्डा चोलपुरम (Gangaikonda Cholapuram)।
- चोल साम्राज्य का विस्तार उत्तरी भारत के पांड्य क्षेत्र तक।
- कुलोत्तुंगा प्रथम (1070–1120 ई.)
- प्रशासनिक सुधार और साम्राज्य की स्थिरता बनाए रखने वाले शासक।
- चोल शासन में आर्थिक विकास और मंदिर निर्माण को प्रोत्साहन।
- मध्य और उत्तर चोल शासक (12वीं–13वीं शताब्दी)
- कलियुग चोल और वीरप्पा चोल जैसे शासक।
- धीरे-धीरे साम्राज्य कमजोर हुआ और 13वीं शताब्दी में पांड्य और होयसला वंशों के प्रभाव में आया।
चोल वंश (Chola Dynasty) राज्य व्यवस्था और प्रशासन
- साम्राज्य को राज्यमंडल (Mandalam), ज़िला (Valanadu), ग्राम (Ur) और गांव (Kurram) में विभाजित किया गया।
- राज्य का शीर्ष अधिकारी: सम्राट (Emperor), जो सेना, कर और न्याय का निर्णय करता था।
- स्थानीय प्रशासन में ग्राम सभा (Village Assembly) और ग्राम पंचायत (Local Council) सक्रिय थीं।
- भूमि अनुदान (Devadana, Brahmadeya) और मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था का विकास।
चोल वंश (Chola Dynasty) धर्म और संस्कृति
- मुख्य धर्म: हिंदू (शैव और वैष्णव)।
- मंदिर निर्माण को राज्य का प्राथमिक कार्य माना गया।
- चोल शासकों ने जैन और बौद्ध मत को भी संरक्षण दिया।
- भक्ति आंदोलन (Tamil Bhakti Movement) को प्रोत्साहन।
चोल वंश (Chola Dynasty) कला और स्थापत्य
- मंदिर स्थापत्य (Temple Architecture)
- ब्रहदेश्वर मंदिर, तंजावुर (Rajaraja I) – द्रविड़ शैली का सर्वोत्तम उदाहरण।
- शिखर: 66 मीटर ऊँचा।
- संगमरमर और ग्रेनाइट से निर्मित।
- गंगा-कोण्डा चोलपुरम – राजेंद्र चोल का विशाल मंदिर।
- मुख्य विशेषताएँ:
- विशाल गोपुरम (Entrance Tower)
- भव्य गर्भगृह (Sanctum)
- मंडप (Pillared Halls)
- विस्तृत मूर्तिकला और शिला-चित्र
- ब्रहदेश्वर मंदिर, तंजावुर (Rajaraja I) – द्रविड़ शैली का सर्वोत्तम उदाहरण।
- मूर्ति कला (Sculpture)
- कांस्य मूर्तिकला का उत्कर्ष:
- नाथनाथशिव (Nataraja) मूर्तियाँ विश्व प्रसिद्ध।
- देवी-देवताओं, अप्सराओं और पौराणिक कथाओं का अंकन।
- कांस्य मूर्तिकला का उत्कर्ष:
- चित्रकला और शिलालेख
- मंदिरों की भित्ति चित्रकला में धार्मिक और सामाजिक जीवन का चित्रण।
- शिलालेख (Inscriptions) – कर निर्धारण, भूमि अनुदान, विजय विवरण और प्रशासनिक जानकारी।
चोल वंश (Chola Dynasty) अर्थव्यवस्था
- कृषि प्रधान, लेकिन व्यापार और समुद्री व्यापार भी विकसित।
- मालदीव से समुद्री व्यापार, दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, थाईलैंड) में व्यापार।
- मुद्रा प्रणाली: सोने और चाँदी के सिक्के।
चोल वंश (Chola Dynasty) साहित्य और शिक्षा
- तमिल और संस्कृत दोनों में साहित्य।
- राजाओं ने संस्कृत काव्य, इतिहास और शिल्प पर ग्रंथ लिखवाए।
- शिवभक्ति और विष्णुभक्ति आंदोलन को बढ़ावा।
- नाट्य और संगीत में योगदान, जैसे तमिल नृत्य और गायन।
चोल वंश (Chola Dynasty) का पतन
- 13वीं शताब्दी में पांड्य और होयसला वंशों के दबाव में चोल साम्राज्य कमजोर हुआ।
- 1279 ई. तक अंतिम चोल शासक हारे और साम्राज्य समाप्त हो गया।
- परंतु कला, स्थापत्य और प्रशासनिक योगदान अमर रहे।
महत्त्व
- दक्षिण भारत का राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वर्ण युग।
- मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला का उत्कर्ष।
- भक्ति आंदोलन और तमिल साहित्य का संवर्धन।
- दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव का प्रसार।
चोल वंश ने दक्षिण भारत को एक सशक्त राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र बनाया। उनके मंदिर, मूर्तिकला और शिलालेख आज भी भारतीय इतिहास और स्थापत्य कला के गहनों के रूप में खड़े हैं।
चोल वंश (Chola Dynasty) की कला एवं स्थापत्य (Chola Art and Architecture)
चोल वंश (Chola Dynasty) (9वीं–13वीं शताब्दी ई.) ने दक्षिण भारत में न केवल राजनीतिक एकता स्थापित की, बल्कि कला, स्थापत्य और मूर्तिकला को भी चरम उत्कर्ष पर पहुँचाया। विशेषकर राजराज चोल प्रथम (985–1014 ई.) और राजेन्द्र चोल प्रथम (1014–1044 ई.) के काल में कला और स्थापत्य का स्वर्णयुग माना जाता है।
1. स्थापत्य कला (Architecture)
चोल स्थापत्य मुख्यतः द्रविड़ शैली का था, परंतु इसमें पहले की पल्लव शैली का भी प्रभाव दिखाई देता है।
(क) मंदिर स्थापत्य
- चोल शासकों ने विशाल मंदिरों का निर्माण कराया जो उनकी शक्ति और धार्मिक भक्ति दोनों के प्रतीक थे।
- मंदिरों की संरचना मुख्यतः गरभागृह, मंडप, विमाना, गोपुरम् और प्राकार पर आधारित थी।
- इन मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता थी – उच्च और भव्य विमाना (शिखर) तथा विशाल गोपुरम् (प्रवेशद्वार टॉवर)।
(ख) प्रमुख चोल मंदिर
- बृहदीश्वर मंदिर (तंजावुर, 1010 ई.)
- इसे राजराज चोल प्रथम ने बनवाया।
- यह मंदिर राजराजेश्वरम् या पेरुवुडैयार कोविल के नाम से भी प्रसिद्ध है।
- इसकी ऊँचाई लगभग 216 फीट है और यह उस काल का सबसे ऊँचा मंदिर था।
- मंदिर का शिखर (विमाना) एक ही ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है, जिसका भार लगभग 80 टन है।
- यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में सम्मिलित है।
- गंगैकोंडा चोलपुरम् का बृहदीश्वर मंदिर
- इसका निर्माण राजेन्द्र चोल प्रथम ने अपने विजय अभियान की स्मृति में कराया।
- यह भी द्रविड़ शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- एयरावतेश्वर मंदिर (दरासुरम्, 12वीं शताब्दी)
- इसे राजराज द्वितीय ने बनवाया।
- इसमें नक्काशी और मूर्तिकला अत्यंत सूक्ष्म एवं कलात्मक है।
- कंपहेश्वर मंदिर (त्रिभुवनम्)
- यह चोल वंश के उत्तरकालीन स्थापत्य का उदाहरण है।
2. मूर्तिकला (Sculpture)
- चोल मूर्तिकला अपनी कांस्य प्रतिमाओं के लिए विश्वविख्यात है।
- प्रतिमाएँ मुख्यतः नटराज (शिव का तांडव रूप), विष्णु, पार्वती, दुर्गा, और भक्त संतों की बनाई गईं।
- नटराज की प्रतिमाएँ विशेष प्रसिद्ध हैं, जिनमें शिव को आनंद तांडव मुद्रा में दर्शाया गया है।
- मूर्तियों में लय, सौंदर्य और जीवंतता का अद्भुत सामंजस्य मिलता है।
3. चित्रकला (Painting)
- चोल काल में मंदिरों की दीवारों और छतों पर चित्रकला विकसित हुई।
- तंजावुर मंदिर की दीवारों पर बनी राजराज चोल और उनके गुरु करुवूर देवर की चित्रकला प्रसिद्ध है।
- चोलों के समय तंजावुर चित्रकला शैली (Tanjore Painting) की नींव पड़ी।
4. चोल वंश (Chola Dynasty) अन्य विशेषताएँ
- चोल मंदिर न केवल धार्मिक स्थल थे, बल्कि शिक्षा, संगीत, नृत्य और प्रशासन के केंद्र भी बने।
- मंदिरों में भंडारगृह, जलकुंड और सभा-मंडप का निर्माण होता था।
- शिलालेख बताते हैं कि मंदिरों को विशाल भूमि अनुदान दिए जाते थे।
चोल वंश की कला और स्थापत्य दक्षिण भारतीय इतिहास का स्वर्ण अध्याय है।
- बृहदीश्वर मंदिर जैसे स्मारक न केवल धार्मिक आस्था बल्कि राजनीतिक शक्ति और स्थापत्य कौशल के प्रतीक हैं।
- चोल मूर्तिकला विशेषकर कांस्य नटराज प्रतिमा आज भी विश्व भर में भारतीय कला का गौरव मानी जाती है।
- इसी कारण चोल कला को द्रविड़ स्थापत्य का शिखर (Pinnacle of Dravidian Architecture) कहा जाता है।
चोल वंश (Chola Dynasty) – FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. चोल वंश (Chola Dynasty) की स्थापना किसने की थी?
चोल वंश की स्थापना विजयालय चोल ने 9वीं शताब्दी में की थी।
Q2. चोल साम्राज्य का सबसे महान शासक कौन था?
राजराज चोल प्रथम और उनके पुत्र राजेन्द्र चोल प्रथम को सबसे महान शासक माना जाता है।
Q3. चोल प्रशासन की प्रमुख विशेषता क्या थी?
चोल प्रशासन विकेन्द्रित था और ग्राम पंचायत व्यवस्था पर आधारित था।
Q4. बृहदीश्वर मंदिर किसने बनवाया था?
बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण राजराज चोल प्रथम ने करवाया था।
Q5. चोल वंश के पतन का मुख्य कारण क्या था?
पांड्य और होयसल शासकों के आक्रमण तथा आंतरिक संघर्षों के कारण चोल वंश का पतन हुआ।