ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, स्रोत एवं महत्व
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Early States and Societies in Eastern India, the Deccan, and South India)
मौर्य साम्राज्य के पतन (लगभग 185 ई.पू.) के पश्चात भारतीय उपमहाद्वीप में एक नवीन युग का आरंभ हुआ जिसे प्रारंभिक ऐतिहासिक राज्य एवं समाज का युग कहा जाता है। इस काल में भारत का राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा था। उत्तर भारत में जहां भारत-यूनानी, शक, कुषाण जैसे विदेशी शासकों ने प्रवेश किया, वहीं पूर्वी भारत, दकन और दक्षिण भारत में अनेक स्वदेशी और क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरने लगीं।
पूर्वी भारत में खारवेल जैसे शक्तिशाली राजा उभरे, दकन क्षेत्र में सातवाहन साम्राज्य ने एक सशक्त प्रशासनिक प्रणाली का निर्माण किया, और दक्षिण भारत में संगम कालीन चेर, चोल और पांड्य जैसे तमिल राज्यों ने संस्कृति, साहित्य और कला की दृष्टि से महान उपलब्धियाँ प्राप्त कीं।
यह समय भारतीय इतिहास में संक्रमण का युग था – साम्राज्य से क्षेत्रीय राजतंत्र की ओर, संस्कृत से प्राकृत और तमिल की ओर, और परंपरागत वैदिक पद्धतियों से बौद्ध-जैन व दक्षिण की शैव-वैष्णव परंपराओं की ओर।
क्षेत्रीय शक्तियों का उदय
मौर्य साम्राज्य की शक्ति समाप्त होने के साथ ही उन क्षेत्रों में स्थानीय वंशों की सत्ता स्थापित होने लगी जहाँ पहले मौर्यों का प्रभुत्व था। विशेष रूप से दक्षिण भारत और दकन में शक्तिशाली राज्य उभरे जो शासकीय, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अत्यंत उन्नत थे। इनमें प्रमुख हैं:
- खारवेल (कलिंग के राजा): जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता, स्थापत्य कला और जलसंचयन योजनाओं को प्रोत्साहित किया।
- सातवाहन साम्राज्य: जिन्होंने दक्षिण और मध्य भारत में एक दीर्घकालीन शासन स्थापित किया।
- संगम युगीन तमिल राज्य: चेर, चोल और पांड्य जिन्होंने तमिल साहित्य और समुद्री व्यापार को अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ दीं।
स्रोत (Sources of History)
इस काल की जानकारी मुख्यतः निम्नलिखित स्रोतों से प्राप्त होती है:
अभिलेखीय स्रोत (Epigraphic Sources):
- हथीगुंफा अभिलेख (खारवेल): यह ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा में रचित अभिलेख खारवेल की उपलब्धियों का प्रमुख स्रोत है।
- नासिक और कार्ले के अभिलेख: सातवाहनों और व्यापारिक श्रेणियों द्वारा उत्कीर्ण किए गए।
- संगम युग के शिलालेख: यद्यपि सीमित हैं, फिर भी दक्षिण भारत में कुछ शिलालेख सामाजिक और प्रशासनिक जानकारी देते हैं।
साहित्यिक स्रोत (Literary Sources):
- संगम साहित्य (तमिल भाषा): जैसे एट्टुत्तोगै (Eight Anthologies), पट्टुप्पाट्टु (Ten Idylls) इत्यादि। इनसे तत्कालीन तमिल समाज, प्रशासन, युद्ध, प्रेम और संस्कृति का सजीव चित्रण मिलता है।
- प्राकृत और पालि ग्रंथ: जैसे मिलिन्दपन्हो, गाथा सप्तशती, त्रिपिटक आदि।
- संस्कृत ग्रंथ: जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र व बाणभट्ट का हर्षचरित जिसमें सातवाहनों का उल्लेख मिलता है।
पुरातात्विक साक्ष्य (Archaeological Sources):
- नगरों के अवशेष: अमरावती, नागर्जुनकोंडा, ब्रह्मगिरी, अरिकमेडु जैसे स्थानों से उत्खनन में स्तूप, विहार, मुद्राएँ और शिल्पकला की जानकारी प्राप्त होती है।
- सिक्के: सातवाहन, चेर, चोल, पांड्य और अन्य स्थानीय शासकों द्वारा जारी टंकण मुद्रा प्रणाली के साक्ष्य।
इस काल का ऐतिहासिक महत्व
- प्रादेशिकता का उदय: भारत में विविध क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरीं जो भविष्य में गुप्त, चालुक्य और राष्ट्रकूट साम्राज्यों की आधारशिला बनीं।
- संस्कृति एवं साहित्य का प्रसार: संगम साहित्य, सातवाहन कालीन प्राकृत काव्य एवं खारवेल कालीन स्थापत्य से भारतीय सांस्कृतिक वैभव का विकास हुआ।
- बौद्ध धर्म का दक्षिण में प्रसार: अमरावती और नागर्जुनकोंडा जैसे बौद्ध केंद्र इस काल में प्रमुख बने। यहाँ से बौद्ध धर्म श्रीलंका व दक्षिण–पूर्व एशिया तक पहुँचा।
- व्यापारिक उन्नति: दक्षिण भारत से रोम और दक्षिण–पूर्व एशिया तक के व्यापारिक संबंधों की शुरुआत हुई।
- स्थापत्य एवं शिल्प कला: अमरावती की मूर्तिकला, विहार और स्तूप निर्माण तकनीकें बाद के गुप्त एवं पाल स्थापत्य को प्रभावित करती हैं।
- स्त्री की सामाजिक स्थिति और वर्ण व्यवस्था: संगम साहित्य में नारी को स्वाभिमानी, स्वतंत्र और बुद्धिमत्ता से युक्त दर्शाया गया है। वर्ण व्यवस्था का लचीला स्वरूप दक्षिण में दिखता है।
प्रारंभिक राज्य एवं समाज का यह काल भारतीय इतिहास का एक समृद्ध, बहुआयामी और संक्रमणकालीन चरण था। इसने प्राचीन भारत की सांस्कृतिक विविधता, सामाजिक संरचना और राजनीतिक विकास की नींव रखी। यह काल भारत के दक्षिणी एवं मध्य क्षेत्रों के इतिहास की स्वतंत्र पहचान को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है और भारतीय उपमहाद्वीप की समेकित सभ्यता की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध होता है।
खारवेल और कलिंग साम्राज्य – जीवन, प्रशासन, विजय अभियान
कलिंग और खारवेल का ऐतिहासिक महत्व
कलिंग (आधुनिक ओडिशा) प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली और स्वतंत्र राज्य था। मौर्य सम्राट अशोक के समय इसका विशेष ऐतिहासिक महत्त्व रहा, जब अशोक ने कलिंग पर आक्रमण कर भीषण युद्ध किया था। इस युद्ध के बाद कलिंग की राजनीतिक स्वतंत्रता समाप्त हो गई थी। लेकिन मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद कलिंग पुनः एक स्वतंत्र राज्य के रूप में उभरा।
खारवेल, कलिंग का सबसे प्रतापी और प्रसिद्ध शासक माना जाता है। वह न केवल एक सफल विजेता था, बल्कि एक कला प्रेमी, न्यायप्रिय, धार्मिक सहिष्णु और लोककल्याणकारी राजा भी था। उसके शासनकाल की जानकारी हमें विशेष रूप से हाथीगुंफा अभिलेख (Hathigumpha Inscription) से प्राप्त होती है।
खारवेल का जीवन एवं व्यक्तित्व
- वंश: खारवेल का संबंध चेदी वंश से था, जो कलिंग में शासन करता था।
- शिक्षा एवं प्रशिक्षण: उसने बचपन में ही राजकीय, सैन्य, धार्मिक एवं सांस्कृतिक शिक्षाएं प्राप्त कीं।
- धार्मिक झुकाव: खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था, किंतु उसने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई।
- चरित्रगत विशेषताएँ:
- वीर योद्धा
- धार्मिक सहिष्णु
- कुशल प्रशासक
- जनता का हितैषी
प्रशासनिक व्यवस्था
हाथीगुंफा अभिलेख से पता चलता है कि खारवेल की शासन व्यवस्था संगठित एवं लोककल्याणकारी थी।
1. राजा का स्थान
- खारवेल सर्वोच्च सत्ता का धारक था।
- वह स्वयं को ‘कलिंगाधिपति’ कहता था।
- राजकीय नीति का संचालन धर्म, नीति और न्याय पर आधारित था।
2. सेनापतित्व
- खारवेल स्वयं युद्धों में अग्रणी होता था।
- उसने एक शक्तिशाली और प्रशिक्षित सेना का गठन किया था।
3. धार्मिक नीति
- जैन धर्म को राजकीय संरक्षण दिया।
- जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ पुनर्स्थापित करवाईं।
- किंतु अन्य धर्मों के प्रति भी सम्मान बनाए रखा।
4. जनकल्याण कार्य
- बाढ़ नियंत्रण हेतु नहरों और जलाशयों का निर्माण
- राजधानी में नगर निर्माण एवं सुंदर वास्तुशिल्प का विकास
- नृत्य, संगीत और नाटक को प्रोत्साहन
खारवेल के विजय अभियान
हाथीगुंफा शिलालेख में खारवेल के जीवन के 13 वर्षों के महत्वपूर्ण घटनाक्रम उल्लेखित हैं। यह अभिलेख उसकी वीरता, राजनयिक दूरदर्शिता और युद्धनीति को उजागर करता है।
1. राज्याभिषेक (आरंभिक वर्ष)
- राज्याभिषेक के तुरंत बाद उसने सार्वजनिक भवनों का निर्माण कराया।
- राजधानी में दीवारें, महल, जल प्रबंधन संरचनाएं बनवाईं।
2. दूसरा वर्ष: पश्चिमी विजय अभियान
- उसने पश्चिम की ओर बढ़ते हुए सातवाहन शासक को पराजित किया और अपने प्रभाव का विस्तार किया।
3. चौथा वर्ष: विंध्य क्षेत्र की विजय
- मध्य भारत के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।
- विदर्भ (Berar) और आसपास के क्षेत्रों को कलिंग में शामिल किया।
4. छठा वर्ष: मगध की ओर अभियान
- खारवेल ने राजगृह (मगध की राजधानी) पर चढ़ाई की।
- मौर्योत्तर काल के मगध शासकों को हराकर मौर्यकालीन एक सिंचाई प्रणाली को पुनः चालू किया।
5. अष्टम वर्ष: दक्षिण की ओर विजय
- पांड्य राज्य तक अपनी सेना को भेजा।
- उसने वहाँ से हाथी, रत्न और मूल्यवान वस्तुएँ प्राप्त कीं।
6. दसवाँ वर्ष: उत्तर भारत में प्रभाव
- उसने उत्तर भारत के यादव शासकों को चुनौती दी।
- राजगृह से मौर्य सम्राट द्वारा ले जाए गए जैन तीर्थंकर की मूर्ति को पुनः कलिंग वापस लाया — यह कार्य धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
7. तेरहवाँ वर्ष: शांतिपूर्ण कार्य
- युद्ध से विराम लेकर उसने लोककल्याण कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया।
- धर्म, संगीत, नाटक और स्थापत्य कला को बढ़ावा दिया।
धार्मिक योगदान
- खारवेल जैन धर्म का महान संरक्षक था।
- उसने जैन मुनियों को संरक्षण दिया और जैन मूर्तियों की पुनर्स्थापना की।
- उसने जैन ग्रंथों के संरक्षण के लिए गुफाओं का निर्माण कराया, विशेष रूप से उदयगिरि और खांडगिरि की गुफाएँ।
सांस्कृतिक योगदान
- खारवेल एक संगीत और नाट्य प्रेमी शासक था।
- उसने संगीत सभाओं का आयोजन कराया।
- कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में उदयगिरि-खांडगिरि गुफाएँ उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
हाथीगुंफा अभिलेख का महत्व
- यह अभिलेख प्राकृत भाषा में है, ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है।
- इसमें खारवेल की उपलब्धियों, युद्धों, धार्मिक नीतियों और सांस्कृतिक योगदान का विस्तृत विवरण मिलता है।
- यह भारत के प्राचीन इतिहास का एक दुर्लभ और विश्वसनीय स्रोत है।
खारवेल की ऐतिहासिक भूमिका
खारवेल ने कलिंग को न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता दिलाई, बल्कि उसे एक सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र भी बना दिया। वह एक विजेता राजा, सांस्कृतिक संरक्षक, और धर्मनिष्ठ शासक के रूप में इतिहास में अमर हो गया।
वह मौर्योत्तर भारत की राजनयिक और सांस्कृतिक धारा को नया मोड़ देने वाला युगपुरुष था, जिसकी उपलब्धियाँ कलिंग की मिट्टी से निकलकर सम्पूर्ण भारतवर्ष में गूँजती हैं।
सातवाहन राजवंश – उदय, प्रशासन, समाज, अर्थव्यवस्था
1. सातवाहन राजवंश का उदय (Rise of Satavahana Dynasty)
कालावधि: लगभग 1st शताब्दी ईसा पूर्व से 3rd शताब्दी ईस्वी तक
स्थापना: सातवाहन राजवंश की स्थापना सिमुक नामक शासक ने की थी।
प्रमुख क्षेत्र: आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य भारत और कर्नाटक के कुछ भाग
महत्व: यह पहला बड़ा राज्य था जो मौर्यों के पतन के बाद दक्षिण भारत में उभरा।
स्रोत:
- पुराणों में सातवाहनों का उल्लेख “आंध्र” या “आंध्रभृत्य” नाम से होता है।
- नासिक, कनheri, नानाघाट आदि के शिलालेखों से भी जानकारी मिलती है।
- सिक्कों और विदेशी यात्रियों (जैसे प्लिनी) के विवरणों से भी इनके शासन की जानकारी मिलती है।
2. सातवाहन शासन व्यवस्था (Administration of Satavahanas)
(i) केन्द्रीय शासन:
- राजा सर्वोच्च था परंतु राजसत्ताधारित धर्म का पालन करता था।
- मंत्री परिषद, महा-अमात्य और सचिव आदि प्रमुख पदाधिकारी थे।
- सातवाहन शासक ब्राह्मण धर्म के संरक्षक माने जाते थे, परंतु बौद्ध धर्म को भी संरक्षण मिला।
(ii) प्रांतीय प्रशासन:
- राज्य को आहार या विषय नामक प्रांतों में बाँटा गया था।
- प्रत्येक प्रांत का प्रमुख महामात्र, राज्जुक या स्थविर होता था।
- स्थानीय स्तर पर नगरपालिका, ग्रामसभा आदि का संचालन होता था।
(iii) सेना और सुरक्षा:
- सेना में पैदल, अश्वारोही और रथ दल होते थे।
- गुप्तचरों और दंड-व्यवस्था का उल्लेख शिलालेखों में मिलता है।
3. सामाजिक संरचना (Society under Satavahanas)
(i) वर्ण व्यवस्था:
- सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों को विशेष संरक्षण दिया।
- समाज वर्णों में विभाजित था, परंतु दक्षिण भारत में मातृसत्तात्मक व्यवस्था के कुछ प्रमाण मिलते हैं।
(ii) स्त्री की स्थिति:
- महिलाओं को सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियों में भागीदारी थी।
- नानाघाट की लेखनाओं से ज्ञात होता है कि राजपरिवार की महिलाएं दान और सार्वजनिक कार्यों में सक्रिय थीं।
(iii) धर्म:
- सातवाहन ब्राह्मण धर्म को मानते थे, परंतु बौद्ध धर्म, विशेष रूप से हीनयान, को भी संरक्षण प्राप्त था।
- अजंता, एलोरा, नासिक की बौद्ध गुफाएँ इस युग की धार्मिक सहिष्णुता का प्रमाण हैं।
4. आर्थिक जीवन (Economy under Satavahanas)
(i) कृषि:
- कृषि सातवाहन काल की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था।
- सिंचाई हेतु जलाशयों एवं नहरों का निर्माण होता था।
(ii) उद्योग-धंधे:
- काष्ठशिल्प, वस्त्र, धातुशिल्प और मनके निर्माण में प्रवीणता थी।
- नगरों में कारीगरों की बस्तियाँ होती थीं।
(iii) व्यापार:
- आंतरिक और बाह्य व्यापार अत्यंत उन्नत था।
- सौराष्ट्र, महाराष्ट्र और आंध्र तटीय क्षेत्र व्यापारिक केंद्र थे।
- रोम, ईरान, दक्षिण एशिया के देशों से व्यापार होता था।
(iv) मुद्राएँ (Coins):
- सातवाहनों ने सीसे (lead), तांबे (copper) और चाँदी की मुद्राएँ जारी कीं।
- इन पर प्रायः प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग होता था।
5. भूमि-अनुदान और श्रेणियाँ
- ब्राह्मणों एवं बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान की परंपरा सातवाहनों में भी प्रचलित थी।
- “अग्रहारा” – ब्राह्मणों को दी गई करमुक्त भूमि।
- “धम्मशिला” – बौद्ध धर्मार्थ कार्यों हेतु दी गई भूमि।
6. विरासत (Legacy)
- सातवाहन शासकों ने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक सेतु की भूमिका निभाई।
- इस युग में बौद्ध स्थापत्य, गुफा-वास्तुकला, और व्यापारिक श्रेणियों का विकास हुआ।
- मौर्य पतन के बाद दक्षिण भारत में स्थायित्व और संस्कृति का पुनरुत्थान इसी काल में हुआ।
संगमकालीन तमिल राज्य – चेर, चोल, पांड्य
संगम युग का स्वरूप
संगम युग दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु का एक प्राचीन ऐतिहासिक काल है, जिसकी पहचान तमिल साहित्य के सबसे पुराने स्रोतों, यानी संगम साहित्य से होती है। यह काल लगभग 300 ई.पू. से 300 ई. तक फैला माना जाता है।
इस युग में तीन प्रमुख तमिल राजवंश उभरे:
- चेर
- चोल
- पांड्य
इन्हें मिलकर मुवेन्दर (तीन राजाओं का समूह) कहा गया है।
1. चेर राजवंश (Cheras)
राजधानी: वंजी (वर्तमान करुर या कोडुंगल्लूर)
भौगोलिक क्षेत्र: केरल और पश्चिमी तमिलनाडु
प्रमुख शासक:
- उदियन चेरल (Uthiyan Cheral Athan): चेरों का पहला महत्वपूर्ण राजा। संगम साहित्य में उल्लेख।
- सेनगुट्टुवन (Senguttuvan): सबसे प्रसिद्ध शासक। पत्तिनी कुल्लुरू (पतिव्रता देवी की पूजा) की परंपरा शुरू की।
- उसने उत्तर भारत के आर्यों के साथ संबंध बनाए और शायद हिमालय तक अभियान किया।
विशेषताएँ:
- चेर राजा समुद्र पार व्यापार में संलग्न थे। रोम और अरब देशों से व्यापार होता था।
- चेर शासक संगम कवियों के संरक्षणकर्ता थे।
- चेरों ने काली और मुरुगन देवताओं की पूजा की।
2. चोल राजवंश (Cholas)
राजधानी: उरैयूर (तिरुचिरापल्ली के पास), बाद में पुहार (कावेरीपट्टनम)
भौगोलिक क्षेत्र: कावेरी डेल्टा (वर्तमान तमिलनाडु का पूर्वी क्षेत्र)
प्रमुख शासक:
- करिकाल चोल (Karikala Chola): सबसे प्रसिद्ध। उसने कई युद्ध जीते और कावेरी तट पर बाँध और नहरें बनवाईं।
- उसने पुहार को एक बड़ा बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र बनाया।
विशेषताएँ:
- चोलों का शासन कृषि आधारित था। कावेरी नदी के किनारे सिंचाई का अच्छा नेटवर्क था।
- व्यापारिक गतिविधियाँ – चीन, रोम, श्रीलंका से संपर्क।
- संगम साहित्य के कई महान कवियों को संरक्षण मिला।
3. पांड्य राजवंश (Pandyas)
राजधानी: मदुरै
भौगोलिक क्षेत्र: दक्षिणी तमिलनाडु
प्रमुख शासक:
- नेडुनेजेलियन (Nedunjeliyan): शक्तिशाली राजा, जिसने चेर और चोलों को हराकर दक्षिण तमिल क्षेत्र पर प्रभुत्व स्थापित किया।
विशेषताएँ:
- पांड्य शासक संगम सभाओं (Sangam Assemblies) के प्रमुख संरक्षक थे।
- मदुरै को साहित्य और संस्कृति का केंद्र बनाया।
- उन्होंने व्यापार, खासकर मोती और मसालों के व्यापार को बढ़ावा दिया।
- हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म और जैन धर्म को भी संरक्षण मिला।
4. संगम साहित्य और इतिहास
स्रोत:
- एतुत्तोगाई (Eight Anthologies)
- पट्टुप्पाट्टु (Ten Idylls)
- तोल्काप्पियम – तमिल व्याकरण का सबसे प्राचीन ग्रंथ
इन ग्रंथों से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की जानकारी मिलती है।
5. समाज और संस्कृति
- वर्ण व्यवस्था उतनी कठोर नहीं थी। वीरता, दानशीलता, और काव्य रचना को सामाजिक प्रतिष्ठा दी जाती थी।
- महिलाओं को साहित्य और संगीत में भागीदारी की स्वतंत्रता थी।
- नायनमार और अळवार परंपरा की नींव इसी काल में पड़ी।
- वीरगाथाओं की परंपरा, संगम कवियों की स्वतंत्रता और राजाओं के खुले दरबार इस युग की विशेषता थे।
6. धर्म
- शैव, वैष्णव, मुरुगन की पूजा मुख्य रूप से होती थी।
- बौद्ध और जैन धर्म भी फैले थे, जिनके मठ और गुफा स्थापत्य इसके प्रमाण हैं।
- पत्तिनी पूजा (पतिव्रता स्त्री की पूजा) चेर राजा सेनगुट्टुवन द्वारा शुरू की गई।
7. व्यापार और अर्थव्यवस्था
- रोमन सिक्के, मोती व्यापार, मसाले, कपास, घड़ियाँ और दवाइयाँ की माँग विदेशों में थी।
- समुद्री व्यापार के लिए पुहार, मुजिरिस, कावीरिपट्टनम जैसे बंदरगाह विकसित हुए।
- मदुरै, उरैयूर, और वंजी प्रमुख शहरी केंद्र थे।
8. प्रशासन और शासन प्रणाली
- शासन राजतंत्रात्मक था पर राजा प्रजा से जुड़ा रहता था।
- मंत्रिपरिषद और सेना मौजूद थी।
- भूमि का कर आधारित वर्गीकरण था – वेलान, उझावर, कणक्कन जैसे वर्ग।
9. संगम युग का महत्व
- संगम युग ने द्रविड़ संस्कृति को सशक्त आधार दिया।
- साहित्य, संगीत, स्थापत्य और व्यापार में इस युग की उपलब्धियाँ बाद की तमिल सभ्यता के लिए मार्गदर्शक रहीं।
- यह काल उत्तर भारत के वैदिक और शास्त्रीय परंपराओं से भिन्न स्थानीय तमिल संस्कृति की पहचान का प्रतीक था।
प्रशासनिक व्यवस्था और राज्य संरचना – राजा, मंत्रिपरिषद, नगर प्रशासन
प्रारंभिक राज्य और समाज के अंतर्गत पूर्वी भारत, दकन और दक्षिण भारत में विभिन्न शक्तिशाली राजवंशों का उदय हुआ जैसे – खारवेल का कलिंग साम्राज्य, सातवाहन राजवंश और संगमकालीन तमिल राज्य (चेर, चोल, पांड्य)। इन सभी क्षेत्रों में विकसित प्रशासनिक व्यवस्था, शासन की कार्यप्रणाली और नगर प्रशासन की संरचना उस काल की राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाती है।
I. राजा की भूमिका और महत्व
- राजा सर्वोच्च शासक:
- राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता था, लेकिन वह जनकल्याणकारी भी था।
- वह राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश, सेनापति, और धार्मिक रक्षक माना जाता था।
- साम्राज्य विस्तार और कूटनीति:
- राजा की प्रतिष्ठा उसकी विजय यात्राओं और सामरिक सफलता से जुड़ी होती थी।
- जैसे खारवेल ने हाथिगुम्फा अभिलेख में अपने अभियानों का विवरण दिया है।
- धर्म के प्रति झुकाव:
- अधिकांश शासक बौद्ध धर्म के संरक्षक थे, लेकिन अन्य पंथों के प्रति भी सहिष्णुता दिखाते थे (जैसे सातवाहन और संगम शासक)।
II. मंत्रिपरिषद (Council of Ministers)
- मंत्रियों की नियुक्ति:
- राजा अपने विश्वासपात्रों को मंत्रिपरिषद में नियुक्त करता था।
- ये मंत्री प्रशासन, युद्ध, न्याय, वित्त, कृषि आदि विभागों को देखते थे।
- प्रमुख पद:
- प्रधानमंत्री (महामात्र/मंत्री) – राजा का मुख्य सलाहकार।
- सेनापति – सेना का संचालन और सुरक्षा व्यवस्था।
- पुरोहित – धार्मिक अनुष्ठानों और नीति निर्देश में भूमिका।
- समाहर्ता (राजस्व अधिकारी) – कर संग्रहण और भूमि प्रबंधन।
- न्यायिक सलाह:
- दंड व्यवस्था में मंत्रिपरिषद की राय ली जाती थी।
- निर्णय धर्मशास्त्रों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार होते थे।
III. प्रशासनिक विभाग
- राज्य का विभाजन:
- राज्य को प्रांतों (जनपदों), मंडलों, तालुका और गाँवों में बाँटा गया था।
- प्रत्येक स्तर पर अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।
- स्थानीय प्रशासन:
- गाँवों का शासन ग्रामसभा के माध्यम से होता था, जो पंचायत प्रणाली से मिलता-जुलता था।
- स्थानीय प्रशासन भूमि कर, जल प्रबंधन और विवाद समाधान करता था।
- महानगर और नगर प्रशासन:
- बड़े शहरों जैसे – पाटलिपुत्र, अमरावती, कांची, मदुरै आदि में विशेष नगरपालिका या नगर परिषदें थीं।
- शहरों में व्यापारी गिल्ड (श्रेणियाँ), दस्तकार संगठन और नगर अधिकारी मिलकर व्यवस्थाएँ चलाते थे।
IV. कर व्यवस्था और सेना
- कर संग्रहण:
- भूमि कर (भोग), व्यापार कर (शुल्क), जल कर, सीमा शुल्क आदि से राजकोष भरा जाता था।
- सातवाहनों और संगमकालीन शासकों के समय व्यापारिक केंद्रों से काफी आय होती थी।
- सेना और सुरक्षा:
- नियमित सेना के साथ-साथ जनजातीय सैनिक और भाड़े के सैनिक भी होते थे।
- नगरों की दीवारें, गुप्तचर प्रणाली और किलेबंदी सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी।
V. न्याय व्यवस्था
- राजा – सर्वोच्च न्यायाधीश:
- राजा व्यक्तिगत रूप से न्याय करता था विशेषकर बड़े अपराधों में।
- स्थानीय न्यायिक निकाय:
- गाँव स्तर पर पंचायत न्याय देती थी।
- दस्तकार गिल्डों में आंतरिक विवादों को सुलझाने की व्यवस्था होती थी।
- दंड प्रणाली:
- आर्थिक दंड, कारावास, बहिष्कार आदि प्रमुख सज़ाएँ थीं।
- न्याय में धर्मशास्त्र, स्थानीय रीतियों और परंपराओं का पालन होता था।
प्रशासनिक दृष्टि से प्रारंभिक राज्य अत्यंत संगठित थे। राजा की सर्वोच्चता थी, लेकिन मंत्रिपरिषद और स्थानीय प्रशासन भी निर्णायक भूमिका निभाते थे। सातवाहन और संगम कालीन राज्यों में नगर प्रशासन का विकास, श्रेणियों की भागीदारी और कर प्रणाली का सुव्यवस्थित रूप यह दर्शाता है कि यह राज्य प्रशासनिक रूप से समृद्ध और परिपक्व थे। यह व्यवस्था आगे चलकर गुप्त काल और अन्य राजवंशों की आधारशिला बनी।
भूमि-अनुदान प्रणाली – ब्राह्मणों, बौद्धों, शैवों को दान
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल (ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर लगभग छठी शताब्दी ईस्वी तक) में भूमि-अनुदान प्रणाली (Land Grant System) भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संरचना में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आई। यह प्रणाली न केवल धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनाई गई, बल्कि इसके माध्यम से शासकों ने प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक लाभ भी प्राप्त किए। ब्राह्मणों, बौद्ध भिक्षुओं, शैव और वैष्णव संस्थानों को दी गई भूमियाँ तत्कालीन राज्य-संरचना के पुनर्गठन का संकेत देती हैं।
I. भूमि-अनुदान की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि
- भूमि का दान प्राचीन काल से ही धर्म और पुण्य के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण माना जाता था, किंतु प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में यह एक संस्थागत रूप ले चुका था।
- मौर्य काल में भूमि पर सम्राट का स्वामित्व था, लेकिन उत्तर मौर्य काल से भूमि को निजी उपयोग हेतु दान देना शुरू हुआ।
- यह प्रथा सातवाहनों, पश्चिमी क्षत्रपों, पल्लवों, चालुक्यों और संगमकालीन शासकों द्वारा अपनाई गई।
II. भूमि-अनुदान के प्रकार
- ब्राह्मणों को भूमि-अनुदान (ब्राह्मदया):
- सातवाहन और बाद के राजाओं ने धार्मिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखने हेतु ब्राह्मणों को कर-मुक्त भूमि प्रदान की।
- इन दानों का उद्देश्य पुरोहित वर्ग को स्थायित्व देना, धार्मिक अनुष्ठानों की निरंतरता बनाए रखना था।
- इन दानों में जलस्रोत, गाँव और खेत सम्मिलित होते थे।
- बौद्ध विहारों को भूमि-दान:
- अमरावती, नागार्जुनकोंडा, कनगुहल्ला, नालंदा आदि क्षेत्रों में बौद्ध भिक्षुओं और संघों को भूमि दान की प्रथाएँ प्रचलित थीं।
- भूमि के दान से विहारों की आर्थिक आत्मनिर्भरता बनी रहती थी और धर्म प्रचार में सहायता मिलती थी।
- शैव एवं वैष्णव मंदिरों को भूमि-दान:
- पल्लव और चालुक्य राजाओं ने मंदिर निर्माण एवं पूजा-पद्धति के संचालन हेतु शैव तथा वैष्णव मंदिरों को संपत्ति प्रदान की।
- यह प्रक्रिया दक्षिण भारत में मंदिर-आधारित सामाजिक व्यवस्था के विकास का आधार बनी।
III. दान की शर्तें और अधिकार
- दान प्राप्तकर्ता को भूमि पर पूर्ण कर-मुक्त स्वामित्व मिलता था।
- शिलालेखों में यह स्पष्ट रूप से दर्ज होता था कि “इस भूमि को राजा के अधिकारियों द्वारा कर-रहित रूप में सौंपा गया है।”
- कई बार दान के साथ सामंतों और कृषकों को भी दान में दे दिया जाता था, जिनसे प्राप्त उपज से मंदिर, विद्यालय या मठ चलते थे।
IV. भूमि-अनुदान के प्रमाण
- शिलालेख और ताम्रपत्र:
- भूमि दान की जानकारी हमें प्राचीन ताम्रपत्रों, शिलालेखों और बौद्ध स्थापत्य स्थलों से मिलती है।
- जैसे: सातवाहन ताम्रपत्र, पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन और नरसिंहवर्मन के अभिलेख।
- प्रसिद्ध दान:
- खारवेल का हाथिगुम्फा अभिलेख, सातवाहन वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी के ताम्रपत्र, और पल्लवों के कुरम शिलालेख।
V. भूमि-अनुदान प्रणाली के प्रभाव
- राजस्व पर प्रभाव:
- भूमि दान कर-मुक्त होती थी, जिससे राज्य के राजस्व में कमी आती थी।
- लेकिन इसके बदले में राजा को धार्मिक वैधता और सामाजिक समर्थन प्राप्त होता था।
- सामंतवाद की शुरुआत:
- भूमि के साथ श्रमिकों और अधिकारों का हस्तांतरण हुआ, जिससे सामंतों की शक्ति बढ़ी और सामंती व्यवस्था का बीज पड़ा।
- धार्मिक केंद्रों की आर्थिक सुदृढ़ता:
- विहारों, मंदिरों और आश्रमों की आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हुई, जिससे शिक्षा, संस्कृति और धर्म का प्रसार हुआ।
- कृषि विस्तार:
- अनुदान में दी गई अनउपजाऊ भूमि को ब्राह्मणों द्वारा उपजाऊ बनाया गया, जिससे नई बस्तियाँ और कृषि भूमि विकसित हुई।
भूमि-अनुदान प्रणाली ने न केवल धार्मिक संस्थाओं को सुदृढ़ किया, बल्कि शासन व्यवस्था, समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया। यह प्रणाली बाद में गुप्त काल और दक्षिण भारत में चोल, पल्लव, और चालुक्य जैसे राजवंशों द्वारा और भी संस्थागत रूप में अपनाई गई। इसने भारतीय उपमहाद्वीप में सामंतवाद, सामाजिक विभाजन और मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था की नींव रखी।
टंकण व्यवस्था और मुद्रा प्रणाली
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल (ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक) में टंकण व्यवस्था (coinage system) और मुद्रा प्रणाली (monetary system) भारतीय उपमहाद्वीप की आर्थिक संरचना का एक प्रमुख आधार बनी। इस काल में व्यापार, कर-संग्रह, श्रमिकों की मजदूरी, धार्मिक दान आदि आर्थिक गतिविधियाँ सिक्कों के माध्यम से ही संचालित होती थीं। विभिन्न शासकों, वंशों और क्षेत्रों ने अपने-अपने प्रतीक, धातु, और लेखन प्रणाली के आधार पर टंकण व्यवस्था को अपनाया।
I. टंकण व्यवस्था की पृष्ठभूमि
- सिक्कों का प्रयोग मौर्य काल से भी पहले प्रारंभ हो चुका था, विशेष रूप से पंचमार्क सिक्कों के रूप में।
- मौर्य काल में शासकीय नियंत्रण में टकसालें थीं, परंतु उत्तर-मौर्य काल में विविध स्वतंत्र राजाओं, गणों और व्यापारिक संघों ने भी सिक्के जारी किए।
- इस काल में धातु की शुद्धता, वजन, और आकृति में विविधता दिखाई देती है।
II. प्रमुख वंशों की मुद्रा प्रणाली
1. सातवाहन राजवंश (1st Century BCE – 3rd Century CE)
- सातवाहनों ने मुख्यतः लेड (सीसा), कांस्य और चांदी के सिक्के चलाए।
- इन सिक्कों पर राजा का नाम, प्रतीक (जैसे जहाज, चंद्रमा, शंख), और प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि मिलती है।
- व्यापारिक दृष्टि से सातवाहन सिक्के दक्षिण भारत और पश्चिमी तटों पर बहुत प्रचलित थे।
2. पश्चिमी क्षत्रप (Western Kshatrapas)
- इन शासकों ने चांदी के सिक्के जारी किए जिनमें यूनानी शैली का प्रभाव देखा जा सकता है।
- सिक्कों पर सत्ताधारी का मुख प्रोफ़ाइल, चार वर्णों वाला देवनागरी लेख, और पीछे सूर्य/त्रिशूल आदि प्रतीक होते थे।
- यह व्यवस्था पश्चिम भारत के व्यापारिक स्थलों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी।
3. इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण शासक
- इन शासकों ने भारत में यूनानी शैली की द्विभाषीय मुद्राएँ (यूनानी और खरोष्ठी/ब्राह्मी) प्रचलित कीं।
- सिक्कों पर राजा की आकृति, ग्रीक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और दो भाषाओं में नाम और उपाधियाँ अंकित थीं।
- कुषाणों ने कांस्य और सोने के सिक्के चलाए, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए उपयोगी थे।
4. संगमकालीन दक्षिण भारत
- इस काल में ‘पंच-मार्क’ और ‘कल्कुट्टू सिक्कों’ का चलन था।
- चोल, चेर, और पांड्य राजाओं ने स्वर्ण और चांदी के सिक्के जारी किए, जिनमें मछली, बाघ, धनुष आदि राज्य-चिह्न अंकित होते थे।
III. टंकण व्यवस्था की विशेषताएँ
- सिक्कों का निर्माण मुख्यतः धातु टकसालों (Minting Houses) में होता था।
- राजकीय नियंत्रण में सिक्कों की धातु की शुद्धता, वजन और प्रतीकों का नियमन किया जाता था।
- सिक्कों पर राजा का नाम अंकित करने की परंपरा ने शासक की राजनीतिक वैधता और प्रचार को बढ़ाया।
IV. मुद्रा प्रणाली और व्यापार
- मुद्रा प्रणाली ने स्थानीय, अंतर-क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को तीव्र गति प्रदान की।
- भारत और रोमन साम्राज्य के बीच व्यापार में रोमन सिक्के भारत में आए, विशेषकर तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में।
- सिक्कों के खजाने (coin hoards) से पता चलता है कि विदेशी मुद्रा भी प्रचलन में थी।
V. सिक्कों से प्राप्त ऐतिहासिक जानकारी
- सिक्कों के माध्यम से हमें राजा का नाम, उपाधियाँ, धार्मिक झुकाव, कला शैली, विदेशी संपर्क, और प्रशासनिक नियंत्रण की जानकारी मिलती है।
- उदाहरण: कुषाण शासक कनिष्क के सिक्कों पर ग्रीक, ईरानी और भारतीय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ मिलती हैं, जो उनके बहुधर्मी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
टंकण व्यवस्था और मुद्रा प्रणाली ने प्राचीन भारत की राजनीतिक स्थिरता, व्यापारिक विकास, प्रशासनिक नियंत्रण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभिन्न राजवंशों द्वारा जारी किए गए सिक्के आज भी इतिहासकारों के लिए अत्यंत मूल्यवान स्रोत हैं, जो तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन की गहराई से जानकारी प्रदान करते हैं।
व्यापार, शिल्प और वाणिज्यिक श्रेणियाँ (Guilds)
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल (ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी) में व्यापार और शिल्प भारतीय समाज की आर्थिक रीढ़ थे। इस काल में स्थानीय, अंतर-क्षेत्रीय और समुद्री व्यापार ने तीव्र गति पकड़ी, जिससे आर्थिक विकास के साथ-साथ वाणिज्यिक श्रेणियाँ (Guilds या निगम) भी एक संगठित रूप में उभरीं। इन संघों ने उत्पादन, मूल्य निर्धारण, गुणवत्ता नियंत्रण और श्रमिकों के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
I. व्यापारिक गतिविधियाँ
- स्थानीय व्यापार:
- ग्रामीण और शहरी बाजारों के बीच माल का आदान-प्रदान।
- कृषि उत्पादों, हस्तशिल्प वस्तुओं और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का व्यापार।
- अंतर-क्षेत्रीय व्यापार:
- उत्तर भारत, दक्षिण भारत, पश्चिमी तट और गंगा घाटी के बीच व्यापार का प्रवाह।
- उदाहरण: सातवाहन काल में पश्चिमी भारत (जैसे तेर, प्रतिष्ठान) से पूर्वी तट तक व्यापारिक मार्ग सक्रिय थे।
- समुद्री व्यापार:
- भारत और रोमन साम्राज्य, अरब, दक्षिण-पूर्व एशिया (सुवर्णभूमि, कंबोज), श्रीलंका आदि के बीच व्यापार।
- रोम से सोने के सिक्के, भारत से मसाले, रेशम, हाथीदांत, वस्त्र निर्यात किए जाते थे।
II. शिल्प (Craft Production)
- मुख्य शिल्पों में शामिल थे:
- धातु निर्माण (लोहे, तांबे, कांसे के उपकरण)
- वस्त्र निर्माण (ऊन, सूती और रेशमी कपड़े)
- मिट्टी और पत्थर की मूर्तियाँ
- काष्ठकला, आभूषण निर्माण, सिरेमिक और कांच का काम
- नगर केंद्रों में शिल्पिकों की बस्तियाँ:
- शिल्पिक विशिष्ट क्षेत्रों में एकत्र रहते थे; जैसे – कुम्हार टोली, सुनार पारा, लोहार गली आदि।
III. वाणिज्यिक श्रेणियाँ (Guilds या निगम)
- परिभाषा और स्वरूप:
- वाणिज्यिक श्रेणियाँ, जिसे ‘श्रेणि‘ कहा जाता था, वह शिल्पकारों और व्यापारियों का एक संगठित समूह था जो विशेष पेशों के अनुसार संगठित होते थे।
- उदाहरण: ‘सेठ-श्रेणि‘, ‘कुमार-श्रेणि‘, ‘तंकार-श्रेणि‘, ‘सुवर्णकार-श्रेणि‘।
- संरचना और कार्य:
- प्रत्येक श्रेणि का अपना अध्यक्ष (श्रेष्ठी) होता था जो निर्णय लेता था।
- श्रेणियाँ अपने सदस्यों के लिए नियम बनाती थीं, ऋण देती थीं, मूल्य निर्धारण तय करती थीं, और श्रमिकों की सुरक्षा करती थीं।
- धार्मिक और सामाजिक भूमिका:
- श्रेणियाँ मंदिरों को दान देती थीं और सार्वजनिक कार्यों में भाग लेती थीं (जैसे – जलकूप, धर्मशाला का निर्माण)।
- कुछ श्रेणियाँ अपने मंदिर, देवता और उत्सव भी आयोजित करती थीं।
- राजकीय सहयोग और संरक्षण:
- कई राजाओं ने श्रेणियों को कर छूट, भूमि अनुदान और स्वायत्त अधिकार दिए।
- श्रेणियाँ कभी-कभी अस्थायी सिक्कों का टंकण भी करती थीं और युद्धकाल में सेना को धन मुहैया कराती थीं।
IV. प्रमुख स्रोतों से जानकारी
- शिलालेखों और अभिलेखों में अनेक व्यापारिक श्रेणियों का उल्लेख मिलता है:
- नासिक, कार्ले, जूनागढ़, अमरावती और मथुरा अभिलेख।
- बौद्ध और जैन साहित्य, जैसे जातक कथाएँ, में व्यापारियों और श्रेणियों का उल्लेख।
- विदेशी यात्रियों (जैसे प्लिनी, टॉलेमी) के विवरणों से समुद्री व्यापार की पुष्टि।
V. व्यापारिक केंद्र
- प्रमुख वाणिज्यिक नगर: तक्षशिला, मथुरा, उज्जैन, ताम्रलिप्ति, कोरकई, पत्तनम, तेर, प्रतिष्ठान, कांचीपुरम् आदि।
- इन नगरों में श्रेणियों की गतिविधियाँ, व्यापारिक मार्गों और बंदरगाहों के पास होने से तीव्र होती थीं।
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में भारत में व्यापार, शिल्प और वाणिज्यिक श्रेणियाँ एक सशक्त और सुव्यवस्थित आर्थिक संरचना का परिचायक हैं। इन श्रेणियों ने न केवल आर्थिक विकास को गति दी, बल्कि सामाजिक कल्याण और सांस्कृतिक उन्नति में भी योगदान दिया। श्रेणियाँ प्राचीन भारत की गिल्ड आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे उल्लेखनीय विशेषता थीं, जो मध्यकालीन गिल्ड प्रणालियों की नींव भी बनीं।
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अध्याय 10: नगर केंद्रों का विकास – अमरावती, नागर्जुनकोंडा, पुहार, मदुरै
(प्रारंभिक राज्य एवं समाज – पूर्वी भारत, दकन एवं दक्षिण भारत में)
प्रारंभिक ऐतिहासिक युग में भारत में शहरीकरण का एक महत्वपूर्ण चरण देखा गया। इस समय अनेक नगर केंद्र व्यापार, प्रशासन, धर्म और संस्कृति के केंद्र बनकर उभरे। विशेष रूप से दक्षिण भारत में अमरावती, नागर्जुनकोंडा, पुहार (कावेरिपट्टिनम) और मदुरै जैसे नगरों ने राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में केंद्रीय भूमिका निभाई।
I. अमरावती (Andhra Pradesh)
- स्थान और ऐतिहासिक महत्व
- कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह नगर आंध्र प्रदेश के सातवाहन काल में महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्र था।
- इसे धम्मनगर (धर्म का नगर) भी कहा गया।
- धार्मिक केंद्र
- यहाँ प्रसिद्ध अमरावती स्तूप स्थित है, जो प्रारंभिक बौद्ध कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- इस स्तूप की शिल्पकला में जातक कथाओं का चित्रण मिलता है।
- आर्थिक गतिविधियाँ
- यह नगर कपड़ा, आभूषण और मूर्तिकला का केंद्र था।
- समुद्री और अंतर-क्षेत्रीय व्यापार में भी इसका योगदान था।
- महत्व
- बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ यह नगर एक बुद्धिजीवी केंद्र भी बना।
II. नागर्जुनकोंडा (Andhra Pradesh)
- भौगोलिक स्थिति
- कृष्णा नदी की सहायक नदियों के किनारे स्थित यह नगर इक्ष्वाकु वंश की राजधानी रहा।
- आज यह नगर नागार्जुन सागर बांध के नीचे जलमग्न है, पर खुदाई से मिले अवशेष महत्वपूर्ण हैं।
- बौद्ध केंद्र
- यहाँ अनेक स्तूप, विहार और चैत्य मिले हैं।
- यह स्थान महायान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था।
- शिक्षा और संस्कृति
- यह नगर विद्वानों, शिल्पकारों और भिक्षुओं का प्रमुख स्थल था।
- बौद्ध शिक्षा और दर्शन के प्रचार में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- प्रशासनिक महत्व
- इक्ष्वाकु शासकों ने यहाँ प्रशासनिक भवन, मंदिर, जल प्रबंधन की व्यवस्था आदि विकसित की।
III. पुहार (कावेरिपट्टिनम, Tamil Nadu)
- स्थान और पहचान
- कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित यह नगर चोल वंश की समुद्री राजधानी था।
- इसे संगम साहित्य में पुहार या कावेरिपट्टिनम के नाम से वर्णित किया गया है।
- व्यापारिक केंद्र
- यह एक प्रसिद्ध बंदरगाह था जहाँ से विदेशों (रोम, अरब, दक्षिण पूर्व एशिया) से व्यापार होता था।
- यहाँ पर मसाले, रेशम, हाथीदांत, कपड़ा आदि का निर्यात होता था।
- सांस्कृतिक दृष्टि से
- यहाँ इल्लंगो अडिगल द्वारा रचित शिलप्पदिकारम् महाकाव्य की घटनाएँ घटित होती हैं।
- नगर में नृत्य, संगीत और नाटक का अत्यधिक प्रचलन था।
- नगर संरचना
- पुहार एक योजनाबद्ध नगर था जिसमें व्यापारी, मछुआरे, सैनिक, ब्राह्मणों की अलग-अलग बस्तियाँ थीं।
- नगर में बाजार, जलाशय, बंदरगाह और मंदिर प्रमुख अंग थे।
IV. मदुरै (Tamil Nadu)
- राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र
- यह पांड्य वंश की राजधानी थी।
- संगम साहित्य का प्रमुख केंद्र भी यही था।
- संगम सभाएँ
- यहाँ पर तीसरी संगम सभा आयोजित हुई थी, जिसमें तमिल कवियों और विद्वानों ने भाग लिया।
- धार्मिक महत्व
- मदुरै में मीनाक्षी मंदिर स्थित है जो द्रविड़ स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- यह नगर शैव और वैष्णव भक्ति आंदोलनों का भी केंद्र रहा।
- आर्थिक गतिविधियाँ
- मदुरै वस्त्र निर्माण, रत्न उद्योग और कृषि उत्पादों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
- यहाँ के व्यापारी दक्षिण भारत से उत्तरी भारत और विदेशों तक व्यापार करते थे।
अमरावती, नागर्जुनकोंडा, पुहार और मदुरै जैसे नगर प्रारंभिक दक्षिण भारतीय समाज में राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इन नगरों के विकास से यह स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक राज्य व्यवस्था केवल राजनीतिक संरचना ही नहीं थी, बल्कि शहरीकरण, व्यापार और सांस्कृतिक विकास का संगम भी थी। ये नगर आगे चलकर दक्षिण भारत की समृद्ध विरासत के प्रतीक बन गए।
बौद्ध केंद्र और मठ – दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म
(प्रारंभिक राज्य एवं समाज – पूर्वी भारत, दकन एवं दक्षिण भारत में)
दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म की उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। यह क्षेत्र न केवल महायान और हीनयान परंपराओं का संगम बना, बल्कि यहाँ अनेक प्रसिद्ध बौद्ध केंद्र, विहार और मठ भी स्थापित हुए जो शिक्षा, धर्म और कला के समृद्ध केंद्र बने।
I. दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म का विकास
- प्रारंभिक संपर्क
- अशोक के समय से ही बौद्ध धर्म दक्षिण भारत में फैलना शुरू हो गया था।
- समुद्र के माध्यम से श्रीलंका, म्यांमार और दक्षिण-पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के प्रसार में दक्षिण भारत की भूमिका रही।
- महायान परंपरा का प्रभाव
- दक्षिण भारत में विशेष रूप से महायान बौद्ध धर्म का विकास हुआ।
- बोधिसत्व की मूर्तियाँ, स्तूप और शिलालेख इस परंपरा की पुष्टि करते हैं।
II. प्रमुख बौद्ध केंद्र और मठ
1. अमरावती (Andhra Pradesh)
- सातवाहन शासकों के अधीन यह एक प्रमुख बौद्ध केंद्र बना।
- यहाँ का अमरावती स्तूप महायान परंपरा का प्रतीक है।
- यहाँ स्थित मठ और विहारों में बौद्ध भिक्षु शिक्षा एवं साधना करते थे।
- जातक कथाओं से युक्त उत्कृष्ट शिल्पकला यहाँ की विशेषता थी।
2. नागर्जुनकोंडा (Andhra Pradesh)
- इक्ष्वाकु वंश के शासनकाल में यह क्षेत्र बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र रहा।
- यहाँ विहार, स्तूप, चैत्यगृह और बौद्ध विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएँ थीं।
- यह महायान परंपरा का प्रमुख स्थल था, जहाँ बौद्ध दर्शन, चिकित्सा और व्याकरण की शिक्षा दी जाती थी।
- यह स्थान बौद्ध आचार्य नागार्जुन के नाम पर प्रसिद्ध हुआ।
3. भटप्रोलु, जगीयापेटा और घटशिला
- ये सभी स्थल भी बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में सहायक रहे।
- यहाँ स्तूपों और विहारों के अवशेष मिले हैं जो बौद्ध भिक्षु समुदाय के जीवन को दर्शाते हैं।
4. कांची (Kanchipuram, Tamil Nadu)
- कांचीपुरम बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म का एक संयुक्त धार्मिक केंद्र था।
- बौद्ध आचार्य धर्मपाल और बुद्धघोष जैसे विद्वान यहाँ अध्ययन और शिक्षण से जुड़े थे।
- यहाँ महायान ग्रंथों का अनुवाद हुआ और बौद्ध दर्शन की शिक्षा दी गई।
III. बौद्ध मठों की भूमिका
- शिक्षा के केंद्र
- विहार केवल निवास स्थान नहीं थे, बल्कि प्राचीन विश्वविद्यालयों के रूप में कार्य करते थे।
- इनमें दर्शन, आयुर्वेद, व्याकरण, ध्यान, तर्क आदि की शिक्षा दी जाती थी।
- धार्मिक प्रचार-प्रसार
- दक्षिण भारत के मठों ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड और इंडोनेशिया तक पहुँचाने में सहयोग किया।
- कई बौद्ध भिक्षु विदेशों में धर्मदूत बनकर गए।
- शिल्प और स्थापत्य
- अमरावती और नागर्जुनकोंडा जैसे केंद्रों की मूर्तिकला और वास्तुकला बौद्ध कला के उत्कर्ष को दर्शाती है।
- बौद्ध धर्म के प्रतीकों जैसे धर्मचक्र, बोधिसत्व, पद्म आदि का विस्तृत प्रयोग हुआ।
IV. बौद्ध धर्म के ह्रास के कारण
- हिन्दू धर्म और भक्ति आंदोलनों के पुनरुत्थान से बौद्ध धर्म की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर हुई।
- पल्लव और चालुक्य जैसे शासकों के वैदिक धर्म की ओर झुकाव ने भी बौद्ध धर्म को प्रभावित किया।
- इसके बावजूद, बौद्ध धर्म की स्थापत्य, साहित्य और शिक्षा परंपरा दक्षिण भारत में अमिट छाप छोड़ गई।
दक्षिण भारत का बौद्ध धर्म के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। अमरावती और नागर्जुनकोंडा जैसे बौद्ध केंद्रों ने न केवल धार्मिक चेतना का प्रचार किया, बल्कि शिक्षा, कला और संस्कृति की दृष्टि से भी भारत को गौरवान्वित किया। इन केंद्रों ने भारत के धार्मिक बहुलवाद, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक समन्वय को एक समृद्ध आयाम प्रदान किया।
संगम साहित्य और संस्कृति – साहित्य, नारी चित्रण, समाज
(प्रारंभिक राज्य एवं समाज – पूर्वी भारत, दकन एवं दक्षिण भारत में)
संगम युग (300 ईसा पूर्व – 300 ईस्वी) दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु, का एक साहित्यिक और सांस्कृतिक स्वर्णकाल माना जाता है। इस युग की विशेषता रही है – अत्यंत परिष्कृत तमिल साहित्य, जिसमें तत्कालीन समाज, युद्ध, प्रेम, नारी, प्रकृति, और धर्म का अत्यंत यथार्थवादी चित्रण मिलता है। इस साहित्य को ‘संगम साहित्य’ कहा जाता है, जो तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अद्वितीय दस्तावेज़ है।
I. संगम साहित्य: एक परिचय
- संगम शब्द का अर्थ:
- “संगम” का अर्थ है विद्वानों की सभा।
- ऐसी तीन संगम सभाओं का उल्लेख मिलता है – प्रथम (मिथकीय), द्वितीय (कपाटपुरम्), और तृतीय संगम (मदुरै)।
- तृतीय संगम से जुड़े साहित्यिक ग्रंथ उपलब्ध हैं।
- मुख्य ग्रंथ:
- एट्टुत्तोगाई (Eight Anthologies): जैसे – पुरनानूरु, अहींनानूरु, कुरुंथोगाई, नाट्टिनै, इत्यादि।
- पट्टुप्पाट्टु (Ten Idylls): जैसे – थिरूमुरुगाट्रुप्पडै, पुरनानूरु आदि।
- तोल्काप्पियम: सबसे प्राचीन तमिल व्याकरण ग्रंथ, जो सामाजिक संरचना का भी विवरण देता है।
- विषय-वस्तु:
- साहित्य को दो श्रेणियों में बाँटा गया है:
- अकम (आंतरिक विषय) – प्रेम, व्यक्तिगत भावनाएँ, स्त्री-पुरुष संबंध
- पुरम (बाह्य विषय) – युद्ध, वीरता, दान, राजनीति, सामाजिक जीवन
- साहित्य को दो श्रेणियों में बाँटा गया है:
II. संगमकालीन समाज
- जातीय संरचना:
- समाज मुख्यतः पाँच भौगोलिक क्षेत्रों (tinai) पर आधारित था – कुरिंजी (पहाड़), मुल्लै (वन), मरुतम (खेती), नेयदल (समुद्र), पालै (मरुस्थल)।
- इन क्षेत्रों के अनुसार जीवनशैली और मूल्य निर्धारित होते थे।
- आजीविका के साधन:
- कृषि (विशेषकर धान), पशुपालन, व्यापार, मछलीपालन, शिल्प और युद्ध।
- समुद्री व्यापार में चोल और पांड्य शासकों की बड़ी भूमिका थी।
- नारी की स्थिति:
- स्त्रियाँ शिक्षित थीं और साहित्यिक रचनाओं में सक्रिय रहीं।
- अव्वैयार जैसी प्रसिद्ध कवयित्रियों ने रचनाएँ कीं।
- समाज में नारी को प्रेम, करुणा, वीरता और बुद्धिमत्ता की दृष्टि से उभारा गया है।
- प्रेम विवाह और पुनर्विवाह की स्वतंत्रता का उल्लेख मिलता है।
- धार्मिक स्थिति:
- प्रारंभ में प्रकृति पूजा का प्रचलन था।
- पशुपति, मुरुगन, इंद्र, वरुण आदि की पूजा होती थी।
- बाद में वैदिक और बौद्ध धर्म का भी प्रभाव पड़ा।
III. संस्कृति और जीवन शैली
- कला और संगीत:
- संगम साहित्य में नृत्य, संगीत, और रंगमंच का विस्तृत वर्णन है।
- संगीत को ‘पाणर’ वर्ग के लोग प्रस्तुत करते थे।
- युद्ध और उत्सव:
- युद्ध वीरता का प्रतीक माना जाता था – युद्ध में मारे गए योद्धाओं के लिए ‘हीरो स्टोन’ (वीरगाथा शिलाएं) बनाई जाती थीं।
- समाज में विभिन्न उत्सव, मेलों और अनुष्ठानों का आयोजन होता था।
- दान और वीरता का आदर्श:
- संगम साहित्य में दानवीरों जैसे पारी, कारी, ओरैयन आदि का उल्लेख मिलता है जिन्होंने गरीबों और कवियों को सहर्ष दान दिया।
IV. संगम साहित्य में नारी चित्रण
- प्रेम और परिवार में भूमिका:
- स्त्रियाँ अकम काव्य की नायिकाएँ बनती हैं – वे स्वतंत्र विचार रखने वाली, प्रेम में दृढ़ और संवेदनशील होती थीं।
- वीर पत्नियाँ और माताएँ:
- युद्ध में वीरगति पाने वाले पति या पुत्र के लिए गौरव और गर्व का भाव मिलता है।
- स्त्रियाँ युद्ध में प्रेरणास्रोत भी थीं।
- कवयित्रियाँ:
- अव्वैयार, अलंगुडी वलैयार, कक्कई पाडिनियार जैसी कवयित्रियों ने समाज और नैतिकता पर आधारित रचनाएँ कीं।
संगम साहित्य न केवल तमिल भाषा की प्राचीनतम निधि है, बल्कि यह दक्षिण भारतीय समाज, स्त्री जीवन, संस्कृति, युद्ध और प्रेम का संवेदनशील दस्तावेज़ भी है। यह साहित्यिक धरोहर आज भी भारतीय सांस्कृतिक चेतना का एक गौरवशाली अध्याय मानी जाती है।
कला और स्थापत्य – स्तूप, विहार, मंदिर स्थापत्य
(प्रारंभिक राज्य एवं समाज – पूर्वी भारत, दकन एवं दक्षिण भारत में)
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में, विशेषकर दक्षिण भारत, दकन और पूर्वी भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक उन्नति के साथ-साथ कला और स्थापत्य का असाधारण विकास हुआ। इस कालखंड में बौद्ध स्तूप, विहार (मठ), चैत्यगृह और हिंदू मंदिरों की स्थापत्य परंपरा की नींव पड़ी, जो आगे चलकर भारतीय वास्तुकला की बुनियाद बनी।
I. स्तूप (Stupa)
- परिभाषा:
- स्तूप एक गोलाकार गुम्बदाकार संरचना होती है, जिसमें बुद्ध के अवशेष या उनके चिह्न रखे जाते थे।
- ये ध्यान और श्रद्धा के केन्द्र होते थे।
- मुख्य विशेषताएँ:
- अंड (गोलाकार गुंबद)
- हरमिका (छोटा बाड़ा गुंबद के ऊपर)
- छत्रावली (छत्र जैसे संरचनाएं, जो श्रद्धा और सम्मान के प्रतीक हैं)
- वेदिका (घेरने वाली रेलिंग) और तोरण (सजावटी द्वार)
- प्रसिद्ध स्तूप:
- अमरावती स्तूप (आंध्र प्रदेश) – अद्वितीय नक्काशी और रूपांकन
- नागर्जुनकोंडा स्तूप – बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं का चित्रण
- कंवलय स्तूप (ओडिशा) – कलिंग शैली का प्रभाव
- धम्मरुंडी स्तूप (दक्षिण भारत) – लघु स्तूपों का उदाहरण
II. विहार (Vihara)
- परिभाषा:
- विहार बौद्ध भिक्षुओं के आवासीय मठ होते थे।
- ये स्थायी शिक्षा और ध्यान के केन्द्र बन गए।
- प्रारंभिक विहार:
- प्रारंभ में विहार लकड़ी या ईंट के बने होते थे, बाद में ये चट्टानों को काटकर बनाए जाने लगे।
- मुख्य उदाहरण:
- भीमबेटका, नागर्जुनकोंडा, कनागनहल्ली, बादामी और एलोरा में प्रमुख विहार मिले हैं।
- नागर्जुनकोंडा में कई बहुमंजिला विहार मिले हैं जिनमें शास्त्रों की शिक्षा दी जाती थी।
- वास्तु विशेषताएँ:
- चतुर्भुज आकृति, चारों ओर छोटी कक्षाएँ (कक्षिकाएँ), बीच में खुला आंगन
- कुछ विहारों में बुद्ध प्रतिमाएँ स्थापित होती थीं
III. चैत्यगृह (Chaitya Griha)
- परिभाषा:
- चैत्यगृह पूजा स्थल होता था जहाँ श्रद्धालु स्तूप के चारों ओर घूमकर पूजा करते थे (प्रदक्षिणा)।
- यह बौद्ध धर्म की प्रार्थना सभा के रूप में प्रयोग होता था।
- प्रसिद्ध उदाहरण:
- करली (महाराष्ट्र), भीमबेटका, एलोरा, बाजिनाथ – चट्टानों को काटकर बनाए गए अद्भुत उदाहरण
- आंतरिक संरचना – आयताकार हॉल, स्तंभों की पंक्तियाँ, अंत में स्तूप
IV. मंदिर स्थापत्य
- प्रारंभिक मंदिर:
- हिंदू मंदिरों की शुरुआत भी इसी काल में हुई, विशेषकर पांड्य, चेर, और सातवाहन शासनकाल में।
- प्रारंभिक मंदिर लकड़ी के होते थे, बाद में पत्थरों के निर्माण प्रारंभ हुए।
- दक्षिण भारत में प्रारंभिक मंदिर:
- पल्लवों ने शिल्पकला को नया आयाम दिया –
- महाबलीपुरम् में रथ मंदिर (मोनोलिथिक)
- मामल्लापुरम के मंदिर – समुद्र तट के पास, अलंकृत गुफा मंदिर
- बादामी चालुक्य –
- बादामी के गुफा मंदिर, पट्टदकल और ऐहोले के मंदिर – नागर और द्रविड़ शैली का मिश्रण
- पल्लवों ने शिल्पकला को नया आयाम दिया –
- स्थापत्य शैलियाँ:
- द्रविड़ शैली – दक्षिण भारत में विकसित
- विमान, मंडप, गोपुरम की विशेषता
- प्रारंभिक मंदिरों में मूर्तियों की जगह प्रतीकों का प्रयोग अधिक होता था – शिवलिंग, पदचिह्न, यंत्र आदि
- द्रविड़ शैली – दक्षिण भारत में विकसित
V. मूर्तिकला और चित्रकला
- अमरावती और नागर्जुनकोंडा की मूर्तिकला:
- बुद्ध के जीवन, जातक कथाएँ, यक्ष-यक्षिणी चित्रण
- नारी सौंदर्य, वनस्पति, पशु-पक्षी का यथार्थवादी चित्रण
- चित्रकला:
- भित्ति चित्रों का विकास – उदाहरण: सित्तनवसल गुफा चित्र, बाघ गुफाएँ (मध्यप्रदेश)
- प्राकृतिक रंगों और धार्मिक विषयों पर आधारित
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में धार्मिक आस्था, राजकीय संरक्षण, और कला कौशल के सामूहिक प्रभाव से भारतीय स्थापत्य और मूर्तिकला की आधारशिला पड़ी। बौद्ध स्तूपों, विहारों और चैत्यगृहों से लेकर हिंदू मंदिर स्थापत्य तक, इस कालखंड ने शिल्पकला, धार्मिक अभिव्यक्ति, और सांस्कृतिक विकास को अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ दीं। ये संरचनाएँ आज भी भारतीय संस्कृति की समृद्धता की गवाही देती हैं।
वैदिक और अन्य धर्मों का प्रभाव – शैव, वैष्णव, जैन
1. वैदिक परंपरा का विस्तार
उत्तर भारत की वैदिक धार्मिक परंपराएं धीरे-धीरे पूर्वी भारत, दकन और दक्षिण भारत तक पहुँचने लगी थीं। यज्ञ, ब्राह्मणवाद, वेदों का पाठ, और वर्णाश्रम धर्म की अवधारणा दक्षिण में भी सामाजिक संरचना को प्रभावित करने लगी थी। यद्यपि दक्षिण भारत में वैदिक परंपराएं अपने शुद्ध स्वरूप में नहीं अपनाई गईं, फिर भी ब्राह्मण वर्ग का प्रभुत्व स्थापित होने लगा और यज्ञ-आधारित धार्मिक गतिविधियाँ सामान्य हो गईं।
2. शैव धर्म का उदय और प्रभाव
- शैव धर्म दक्षिण भारत में अत्यंत लोकप्रिय हुआ। शिव को प्रमुख देवता के रूप में पूजा जाना लगा। पल्लव और चोल जैसे राजवंशों ने शिव मंदिरों का निर्माण कराया।
- अमरावती और कांची जैसे क्षेत्रों में शिवलिंग की पूजा तथा नटराज (तांडव नृत्य मुद्रा में शिव) की मूर्तियाँ विशेष रूप से विकसित हुईं।
- शैव साधुओं और मतों (पशुपत, कालामुख आदि) का प्रसार इस समय हुआ।
3. वैष्णव धर्म का विकास
- विष्णु को ईश्वर के रूप में मान्यता देने वाली परंपरा दकन और तमिल क्षेत्रों में फैलने लगी थी।
- विष्णु के अवतार – राम, कृष्ण आदि की कहानियाँ जनसाधारण में लोकप्रिय हुईं।
- अलवार संतों के भक्ति गीतों और मंदिरों ने वैष्णव भक्ति आंदोलन की नींव डाली, जो आगे चलकर मध्यकाल में पूरे दक्षिण भारत में फैल गया।
4. जैन धर्म का प्रभाव
- महावीर के अनुयायियों ने दक्षिण भारत में अपने धार्मिक केंद्र स्थापित किए।
- कर्नाटक और तमिलनाडु में अनेक जैन मठ (बसदियाँ) और तीर्थस्थल जैसे श्रवणबेलगोला, मुदबिद्री आदि विकसित हुए।
- जैन ग्रंथों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद हुआ और जैन साहित्य ने तमिल व कन्नड़ साहित्य को समृद्ध किया।
- जैन भिक्षु राजाओं के दरबार में विद्वान व सलाहकार के रूप में उपस्थित रहते थे।
5. धार्मिक सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक समन्वय
- इस काल में शैव, वैष्णव, जैन और बौद्ध धर्मों के बीच समन्वय की भावना देखने को मिलती है।
- अनेक मंदिरों में बहुधर्मी प्रभाव दिखाई देते हैं – जैसे एक ही परिसर में शिवलिंग, विष्णु की मूर्ति और जैन तीर्थंकरों की आकृतियाँ मिलती हैं।
6. धर्म और सामाजिक संरचना पर प्रभाव
- शैव और वैष्णव धर्मों ने जातिगत विभाजन को मान्यता दी, पर भक्ति आंदोलन ने जाति व्यवस्था की जड़ता को चुनौती भी दी।
- जैन धर्म ने अहिंसा, सत्य और संयम के सिद्धांतों के माध्यम से सामाजिक जीवन में नैतिकता को स्थान दिया।
प्रारंभिक राज्यों की ऐतिहासिक विरासत और गुप्त युग की भूमिका
1. प्रारंभिक राज्यों का ऐतिहासिक महत्त्व
पूर्वी भारत, दकन और दक्षिण भारत में विकसित प्रारंभिक राज्य व्यवस्थाएं भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये राज्य न केवल राजनीतिक सत्ता के केंद्र बने, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी रहे। खारवेल का कलिंग साम्राज्य, सातवाहन वंश, संगमकालीन चेर, चोल और पांड्य राज्य – इन सभी ने एक समृद्ध और विविधतापूर्ण विरासत छोड़ी।
प्रशासनिक नवाचार:
- खारवेल और सातवाहनों की प्रशासनिक संरचनाओं में स्पष्ट संगठन दिखता है – जैसे राजा, मंत्री परिषद, सैन्य संगठन, नगर प्रशासन।
- भूमि अनुदान प्रणाली, राजस्व व्यवस्था और स्थानीय स्वशासन की प्रक्रियाएँ गुप्त काल की प्रशासनिक दक्षता का आधार बनीं।
सांस्कृतिक विकास:
- संगम साहित्य, सातवाहन सिक्के, स्थापत्य, और बौद्ध केंद्र – ये सभी कला, साहित्य और दर्शन की दृष्टि से बहुमूल्य हैं।
- संगम साहित्य ने लोकजीवन, स्त्री की भूमिका, और समाज की बहुस्तरीय संरचना का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया।
धार्मिक विविधता और समन्वय:
- बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णव सभी धर्मों ने इस काल में सहअस्तित्व और पारस्परिक प्रभाव के साथ विकास किया।
- इस धार्मिक सहिष्णुता और बहुलता की परंपरा आगे चलकर गुप्त युग में भी बनी रही।
2. गुप्त युग के लिए आधारशिला
प्रारंभिक राज्यों की यह विरासत गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष के लिए नींव का कार्य करती है। विशेष रूप से:
राजनीतिक रूपरेखा:
- सातवाहनों की राजनैतिक संरचना और साम्राज्य-व्यवस्था गुप्तों द्वारा अपनाई और परिष्कृत की गई।
- भूमि अनुदान और सामंतवाद की जड़ें गुप्त युग में अधिक स्पष्ट होती हैं, जिसकी बुनियाद सातवाहन युग में ही पड़ चुकी थी।
आर्थिक व्यवस्था:
- आंतरिक और समुद्री व्यापार, वाणिज्यिक श्रेणियाँ (Guilds), सिक्का प्रणाली आदि को गुप्त युग ने और अधिक संगठित रूप दिया।
सांस्कृतिक निरंतरता:
- अमरावती, नागर्जुनकोंडा जैसे केंद्रों में विकसित स्थापत्य और मूर्तिकला की परंपरा आगे चलकर अजंता–एलोरा और गुप्तकालीन मूर्तिकला की प्रेरणा बनी।
- गुप्त काल की ‘शास्त्रीय संस्कृति’ का उद्भव भी सातवाहन और संगमकालीन सांस्कृतिक जागरण से जुड़ा रहा।
3. सामाजिक संरचना और मूल्य
- वर्ण व्यवस्था, ब्राह्मण वर्चस्व, धर्म और समाज का परस्पर संबंध – यह सब गुप्त युग में अधिक गहराई से दिखाई देता है, जिसकी भूमिका पहले से तैयार हो चुकी थी।
- प्रारंभिक काल की महिलाओं की स्थिति, नगर जीवन, ग्रामीण संरचना – ये सभी गुप्त युग में और अधिक सुस्पष्ट रूप में उभरे।
प्रारंभिक राज्य और समाज न केवल क्षेत्रीय सत्ता के विकास का संकेतक हैं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता की नींव भी हैं। इन राज्यों ने:
- प्रशासनिक दक्षता,
- सांस्कृतिक विविधता,
- धार्मिक सह-अस्तित्व,
- आर्थिक आत्मनिर्भरता और
- सामाजिक जटिलता का जो रूप प्रस्तुत किया,
वही गुप्त युग की ‘शास्त्रीय भारतीय सभ्यता’ का आधार बना।
इसलिए इन प्रारंभिक राज्यों की ऐतिहासिक विरासत को केवल क्षेत्रीय विकास के रूप में नहीं, बल्कि एक राष्ट्रव्यापी ऐतिहासिक क्रम के निर्णायक चरण के रूप में समझना चाहिए।
Timeline Chart: प्रारंभिक राज्य एवं समाज (लगभग ईसा पूर्व 3rd शताब्दी – ईसा पश्चात 4th शताब्दी)
| क्रम | समय अवधि | क्षेत्र / राज्य | प्रमुख शासक / योगदान | प्रमुख घटनाएँ / विशेषताएँ |
|---|---|---|---|---|
| 1. | ई.पू. 3rd शताब्दी | कलिंग (पूर्वी भारत) | खारवेल (हाथीगुंफा अभिलेख) | – आक्रामक सैन्य अभियान – जैन धर्म का संरक्षण – जलनिकायों का निर्माण |
| 2. | ई.पू. 2nd शताब्दी – ई. 2nd शताब्दी | सातवाहन वंश (दकन) | सिमुक, गौतमीपुत्र शातकर्णि, वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी | – विदेशी शक शक्तियों को पराजय – भूमि-अनुदान, ब्राह्मणवाद का उदय – व्यापार, सिक्के, बौद्ध संरचनाएँ |
| 3. | ई.पू. 1st शताब्दी – ई. 3rd शताब्दी | संगमकालीन तमिल राज्य – चेर, चोल, पांड्य | उय्यानि चेरल, करिकाल चोल, नेडुनजेलियन पांड्य | – संगम साहित्य का उत्कर्ष – पोर्ट सिटी पुहार का विकास – रोमन व्यापार |
| 4. | ई. 1st – 3rd शताब्दी | अमरावती, नागर्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश) | सातवाहन और इक्ष्वाकु शासक | – बौद्ध स्तूप और विहार – स्थापत्य एवं चित्रकला – व्यापारिक मार्गों का विकास |
| 5. | ई. 2nd – 4th शताब्दी | पुहार, मदुरै (दक्षिण भारत) | संगमकालीन सम्राट और स्थानीय गिल्ड | – नगर जीवन, व्यापारिक गिल्ड – तमिल साहित्य, नारी चित्रण – बौद्ध, शैव, वैष्णव प्रभाव |
| 6. | ई. 3rd – 4th शताब्दी | इक्ष्वाकु वंश (नागर्जुनकोंडा) | वीरपुरुषदत्त, एभय | – बौद्ध धर्म का उत्कर्ष – महिलाओं द्वारा धार्मिक संरचना निर्माण – ब्राह्मणों को भूमि अनुदान |
| 7. | ई. 4th शताब्दी | संक्रमण काल – गुप्त युग की ओर | – | – प्रारंभिक राज्यों की विरासत का समावेश – गुप्त प्रशासन, कला और संस्कृति पर प्रभाव |
विशेष Timeline Highlights:
- ई.पू. 3rd शताब्दी: अशोक का कलिंग विजय → खारवेल का उदय
- ई.पू. 2nd – ई. 2nd शताब्दी: सातवाहन वंश का उत्कर्ष
- ई.पू. 1st – ई. 3rd शताब्दी: संगम साहित्य संकलन और तमिल राज्यों का विस्तार
- ई. 1st – 4th शताब्दी: नगरों का विकास, स्तूप निर्माण, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
- ई. 4th शताब्दी: गुप्त युग की ओर संक्रमण – प्रशासनिक और सांस्कृतिक आधार तैयार
Short Notes: प्रारंभिक राज्य एवं समाज (पूर्वी भारत, दकन, दक्षिण भारत)
खारवेल और कलिंग साम्राज्य
- खारवेल: हाथीगुंफा अभिलेख से जानकारी।
- कलिंग पर शासन: जलनिकायों का निर्माण, कला संरक्षण।
- जैन धर्म का पोषक, धार्मिक सहिष्णुता।
सातवाहन वंश
- संस्थापक: सिमुक।
- प्रमुख शासक: गौतमीपुत्र शातकर्णि (विदेशियों को पराजित किया)।
- प्रशासन: केंद्रित शासन, भूमि अनुदान परंपरा।
- अर्थव्यवस्था: शिल्प, समुद्री व्यापार, मुद्रा प्रणाली (सतमान प्रणाली)।
- धर्म: वैदिक, बौद्ध, जैन प्रभाव।
संगमकालीन तमिल राज्य
- मुख्य राज्य: चेर, चोल, पांड्य।
- साहित्यिक स्रोत: संगम साहित्य (एतुत्तोकई, पट्टुप्पाट्टु)।
- समाज: वीरता, प्रेम, स्त्रियों की सक्रिय भूमिका।
- पुहार, मदुरै जैसे बंदरगाह नगरों का विकास।
प्रशासनिक व्यवस्था
- राजा सर्वोच्च, मंत्रीमंडल की सहायता।
- नगर प्रशासन में व्यापारिक गिल्ड्स की भूमिका।
- दक्षिण भारत में ब्राह्मण और बौद्ध भूमि-अनुदान परंपरा।
भूमि अनुदान प्रणाली
- ब्राह्मणों, बौद्धों, शैवों को भूमि दान।
- अनुदान पत्र ताम्रपत्रों पर।
- राज्य की अधिराज्य सत्ता बनी रहती थी।
मुद्रा एवं टंकण प्रणाली
- सातवाहनों की “सतमान” प्रणाली।
- लेन-देन के लिए धातु मुद्राएँ – सीसा, तांबा, चाँदी।
- विदेशी सिक्कों (रोमन) का प्रयोग भी।
व्यापार एवं गिल्ड्स
- व्यापारिक श्रेणियाँ: गहनों, वस्त्रों, धातु शिल्प की गिल्ड।
- समुद्री व्यापार: रोमन साम्राज्य से व्यापार।
- “निकाय” या “श्रेणियाँ” स्थानीय व्यापार संचालन में महत्वपूर्ण।
नगर केंद्रों का विकास
- प्रमुख नगर: अमरावती, नागर्जुनकोंडा (आंध्र), पुहार, मदुरै।
- बौद्ध एवं व्यापारिक केंद्र, भित्ति चित्र और स्तूपों से सुसज्जित।
बौद्ध केंद्र और मठ
- प्रमुख केंद्र: अमरावती, नागर्जुनकोंडा, जुण्नार।
- स्तूप, विहार, चैत्य निर्माण।
- शाही संरक्षण: इक्ष्वाकु वंश, सातवाहन शासक।
संगम साहित्य और संस्कृति
- दो भाग: प्रारंभिक संगम (मूल), उत्तर संगम (परिष्कृत)।
- सामाजिक जीवन: मातृसत्तात्मक झलकें, युद्ध और प्रेम विषयक कविताएँ।
- संस्कृति: संगीत, नृत्य, उत्सव, स्त्री सम्मान।
कला और स्थापत्य
- बौद्ध स्तूप: अमरावती, नागर्जुनकोंडा।
- विहार व चैत्यगृहों की योजना विकसित।
- मंदिर स्थापत्य की प्रारंभिक झलकें।
धार्मिक प्रभाव
- वैदिक धर्म के साथ शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन मतों का समावेश।
- धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और संरक्षक शासक।
- धार्मिक संरचनाओं को भूमि और आर्थिक सहायता।
इतिहासिक विरासत और गुप्त काल की भूमिका
- इन राज्यों की प्रशासनिक, आर्थिक व सांस्कृतिक परंपराओं ने गुप्त काल की नींव रखी।
- नगर व्यवस्था, धार्मिक संरचनाएँ और भूमि अनुदान नीति आगे चलकर और विकसित हुईं।