भारत में शासन (Governance in India)

भारत में शासन (Governance in India)

भारत में शासन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें अधिकारों की रक्षा, प्रशासनिक दक्षता, सिविल सोसायटी की भागीदारी, और पारदर्शिता जैसे तत्व शामिल हैं। इसमें नागरिक अधिकार, भ्रष्टाचार की रोकथाम, और जनहित की रक्षा के लिए संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।


1. अधिकारों से संबंधित मुद्दे

(a) अधिकारों की परिभाषा और संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान ने नागरिकों को अधिकार प्रदान किए हैं, जो उनके व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक जीवन की रक्षा करते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख अधिकार हैं:

  1. मूल अधिकार (अनुच्छेद 12-35):
    • समानता का अधिकार।
    • स्वतंत्रता का अधिकार।
    • शोषण के विरुद्ध अधिकार।
    • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार।
    • सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार।
    • संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
  2. मूल कर्तव्यों का अनुपालन: नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे संविधान और राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करें।

(b) अधिकारों से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ

  1. अधिकारों का उल्लंघन:
    • जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, और धार्मिक उत्पीड़न।
  2. सूचना का अधिकार (RTI):
    • पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, लेकिन इसके उपयोग में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।
  3. डिजिटल अधिकार:
    • इंटरनेट स्वतंत्रता और डेटा सुरक्षा से जुड़े मुद्दे।
  4. महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार:
    • कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, और सांप्रदायिक हिंसा।

2. सिविल सोसायटी की भूमिका

(a) परिभाषा और महत्व

सिविल सोसायटी का अर्थ उन संगठनों, समूहों, और व्यक्तियों से है जो सरकार और बाजार से स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। इनका उद्देश्य जनहित के मुद्दों को उठाना और समाज में सुधार करना है।

(b) प्रमुख भूमिका

  1. सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना:
    • शासन में पारदर्शिता लाने के लिए RTI और PIL का उपयोग।
  2. नीति निर्माण में भागीदारी:
    • सिविल सोसायटी नीति-निर्माण और कार्यक्रमों की निगरानी में सहायक होती है।
  3. जन जागरूकता:
    • शिक्षा, स्वास्थ्य, और पर्यावरण से संबंधित मुद्दों पर लोगों को जागरूक करना।
  4. मानवाधिकार की रक्षा:
    • गरीब और वंचित वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा।

(c) चुनौतियाँ और आलोचना

  1. संसाधनों की कमी:
    • कई सिविल सोसायटी संगठनों को पर्याप्त धनराशि नहीं मिलती।
  2. सरकार के साथ संघर्ष:
    • कई बार सरकार और सिविल सोसायटी के उद्देश्यों में टकराव होता है।
  3. राजनीतिक दखल:
    • सिविल सोसायटी के कार्यों में राजनीतिक हस्तक्षेप।

3. भ्रष्टाचार और लोकपाल

(a) भ्रष्टाचार: परिभाषा और प्रभाव

भ्रष्टाचार का अर्थ है सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग निजी लाभ के लिए। यह शासन की दक्षता को प्रभावित करता है और समाज में असमानता बढ़ाता है।

(b) भ्रष्टाचार के प्रकार

  1. प्रशासनिक भ्रष्टाचार:
    • घूसखोरी, पक्षपात, और कानूनी प्रक्रियाओं में देरी।
  2. राजनीतिक भ्रष्टाचार:
    • चुनावी प्रक्रिया में अनियमितता और काले धन का प्रयोग।
  3. न्यायिक भ्रष्टाचार:
    • न्याय प्रक्रिया में अनुचित लाभ के लिए हस्तक्षेप।

(c) लोकपाल का गठन और महत्व

  1. परिभाषा:
    • लोकपाल एक स्वतंत्र निकाय है जो भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करता है।
  2. लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013:
    • इस अधिनियम के तहत लोकपाल का गठन किया गया।
    • यह केंद्र स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करता है, जबकि लोकायुक्त राज्य स्तर पर कार्य करता है।
  3. संरचना:
    • लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम 8 सदस्य होते हैं।
    • इनमें से 50% सदस्य न्यायपालिका से होते हैं, और 50% सदस्य SC/ST/OBC/महिला या अल्पसंख्यक वर्ग से।

(d) लोकपाल की शक्तियाँ और कार्य

  1. भ्रष्टाचार की जांच और कार्रवाई:
    • उच्च पदाधिकारियों और मंत्रियों के खिलाफ शिकायतों की जांच।
  2. विशेष जांच दल (SIT) का गठन:
    • गंभीर मामलों में जांच के लिए SIT का गठन करना।
  3. स्वतंत्र कार्यप्रणाली:
    • यह किसी भी सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त होता है।

(e) भ्रष्टाचार की रोकथाम के अन्य उपाय

  1. सतर्कता आयोग:
    • केंद्रीय और राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों की निगरानी।
  2. सीबीआई (CBI):
    • गंभीर आर्थिक अपराधों और भ्रष्टाचार की जांच।
  3. RTI (सूचना का अधिकार):
    • पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना।

(f) लोकपाल की चुनौतियाँ और आलोचना

  1. सीमित अधिकार:
    • लोकपाल के पास कार्यान्वयन की स्वतंत्रता नहीं है।
  2. राजनीतिक बाधाएँ:
    • जांच प्रक्रिया में देरी।
  3. जन जागरूकता की कमी:
    • लोग लोकपाल के अधिकारों और उपयोगिता के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखते।

भारत में प्रभावी शासन के लिए अधिकारों की सुरक्षा, सिविल सोसायटी की भागीदारी, और भ्रष्टाचार की रोकथाम अनिवार्य है। लोकपाल जैसे निकायों की स्थापना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इनकी प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए कानूनी और प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता है। पारदर्शिता, जवाबदेही, और जन भागीदारी को प्रोत्साहित करके ही एक मजबूत और निष्पक्ष शासन सुनिश्चित किया जा सकता है।