जलचक्र और जल स्रोत (Hydrological Cycle and Water Resources)
जल पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। जलचक्र (Hydrological Cycle) जल के निरंतर प्रवाह और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया है, जो पृथ्वी पर जल संतुलन बनाए रखता है। जल स्रोतों को सतही जल (Surface Water) और भूजल (Groundwater) में विभाजित किया जाता है।
1. जलचक्र (Hydrological Cycle): घटक और महत्व
जलचक्र (Hydrological Cycle) पृथ्वी पर जल के सतत संचार और पुनर्चक्रण की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के माध्यम से जल महासागरों, वायुमंडल, भूभाग और जीवों के बीच लगातार प्रवाहित होता रहता है। यह चक्र पृथ्वी पर जल संतुलन बनाए रखने और पारिस्थितिक तंत्र को सक्रिय रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
1.1 जलचक्र के घटक (Components of Hydrological Cycle)
जलचक्र कई प्रक्रियाओं के माध्यम से संचालित होता है, जिसमें जल वाष्प में बदलता है, संघनित होकर बादलों का निर्माण करता है, वर्षा के रूप में पृथ्वी पर लौटता है, और सतह एवं भूमिगत प्रवाह के माध्यम से पुनः महासागरों तक पहुँचता है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
(i) वाष्पीकरण (Evaporation)
- यह वह प्रक्रिया है जिसमें सूर्य की गर्मी से जल महासागरों, झीलों, नदियों और मिट्टी की सतह से वाष्प में बदल जाता है।
- महासागर इस प्रक्रिया में सबसे अधिक योगदान देते हैं।
- यह पृथ्वी के तापमान को संतुलित रखने में सहायता करता है।
(ii) वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)
- पौधों और पेड़ों की पत्तियों से जल वाष्प के रूप में वातावरण में जाता है।
- यह भी वाष्पीकरण का एक रूप है, जिसे जैविक वाष्पोत्सर्जन कहा जाता है।
- यह जल संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है।
(iii) संघनन (Condensation)
- जब वायुमंडल में जलवाष्प ठंडी होती है, तो यह छोटे-छोटे जलकणों में परिवर्तित होकर बादलों का निर्माण करती है।
- संघनन से कुहासा, ओस और बादल भी बनते हैं।
- यह वर्षा और अन्य रूपों में जल को पुनः पृथ्वी तक पहुँचाने में सहायक होता है।
(iv) वर्षा (Precipitation)
- जब संघनित जलकण भारी हो जाते हैं, तो वे वर्षा, हिमपात, ओलों या ओस के रूप में पृथ्वी पर गिरते हैं।
- वर्षा पृथ्वी की जल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है।
- यह महासागरों, झीलों, नदियों और भूजल पुनर्भरण में योगदान देता है।
(v) अपवाह (Runoff)
- जब वर्षा का जल नदियों, झीलों और महासागरों की ओर प्रवाहित होता है, तो इसे अपवाह कहा जाता है।
- यह जल चक्र में जल को सतही जल स्रोतों तक पहुँचाने में मदद करता है।
- यह नदियों के प्रवाह और मिट्टी अपरदन को प्रभावित करता है।
(vi) रिसाव (Infiltration)
- जब वर्षा का जल भूमि की सतह में प्रवेश करता है और भूजल भंडार को भरता है, तो इसे रिसाव कहते हैं।
- यह जल बाद में कुओं, झरनों और भूमिगत धाराओं के रूप में सतह पर आ सकता है।
(vii) भूमिगत प्रवाह (Groundwater Flow)
- भूमिगत जल पृथ्वी के नीचे चट्टानों और मिट्टी के बीच प्रवाहित होता है।
- यह धीरे-धीरे नदियों, झीलों और महासागरों में मिल सकता है।
- यह जल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
1.2 जलचक्र का महत्व (Importance of Hydrological Cycle)
जलचक्र पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने और जल आपूर्ति सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
(i) जल की निरंतर आपूर्ति
- जलचक्र पृथ्वी पर जल को पुनः वितरित करता है, जिससे सभी जीवों के लिए जल की उपलब्धता बनी रहती है।
- यह नदियों, झीलों, भूजल और महासागरों के जल स्तर को संतुलित रखता है।
(ii) पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखना
- जलचक्र वनस्पतियों, जीवों और पारिस्थितिक तंत्र के बीच जल संतुलन बनाए रखता है।
- यह जैव विविधता को बनाए रखने में सहायक होता है।
(iii) जलवायु और मौसम को प्रभावित करना
- जलचक्र वर्षा, आर्द्रता और तापमान को नियंत्रित करता है।
- यह सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक घटनाओं को प्रभावित करता है।
(iv) कृषि और खाद्य उत्पादन में सहायता
- जलचक्र कृषि के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
- वर्षा और भूजल पुनर्भरण से फसलों की सिंचाई संभव होती है।
(v) जल विद्युत उत्पादन
- जल प्रवाह का उपयोग जलविद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है, जो स्वच्छ ऊर्जा का एक स्रोत है।
- बांधों और जलाशयों में जल संग्रहण करके बिजली उत्पन्न की जाती है।
(vi) भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge)
- जलचक्र भूजल भंडारण को फिर से भरता है, जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए जल उपलब्ध रहता है।
- भूमिगत जल स्रोतों को बनाए रखने के लिए जलचक्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(vii) प्राकृतिक आपदाओं को नियंत्रित करना
- जलचक्र संतुलित वर्षा प्रदान करता है, जिससे सूखे और बाढ़ की घटनाओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
- अधिक वाष्पीकरण से सूखा और अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसी आपदाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
जलचक्र एक निरंतर और प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो पृथ्वी पर जल संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इसके विभिन्न घटक जैसे वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा, अपवाह और भूजल प्रवाह जल को सतत प्रवाहित रखते हैं। जलचक्र न केवल जल आपूर्ति सुनिश्चित करता है, बल्कि जलवायु, कृषि, ऊर्जा उत्पादन और पारिस्थितिकी संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मुख्य बिंदु:
✔ जलचक्र पृथ्वी पर जल के प्रवाह और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया है।
✔ इसके प्रमुख घटक वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा, अपवाह और भूजल प्रवाह हैं।
✔ यह जल संतुलन, पारिस्थितिकी, कृषि, ऊर्जा उत्पादन और जलवायु को प्रभावित करता है।
✔ जलचक्र के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं हो सकता।
इसलिए, जलचक्र को बनाए रखना और जल संरक्षण की दिशा में प्रयास करना आवश्यक है, ताकि पृथ्वी पर जल की सतत उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
2. सतही जल स्रोत (Surface Water Sources)
सतही जल वे जल स्रोत हैं, जो पृथ्वी की सतह पर स्थित होते हैं, जैसे नदियाँ, झीलें और जलप्रपात।
(i) नदियाँ (Rivers)
नदियाँ मीठे पानी का प्रमुख स्रोत हैं और कई जलवायु क्षेत्रों में जल की आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं।
(a) नदियों के प्रकार
- हिमानी पोषित नदियाँ (Glacial Rivers):
- ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियाँ, जैसे – गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु।
- वर्षा पोषित नदियाँ (Rain-fed Rivers):
- वर्षा जल से बनने वाली नदियाँ, जैसे – गोदावरी, कावेरी।
- झरनों से निकलने वाली नदियाँ (Spring-fed Rivers):
- प्राकृतिक झरनों से निकलने वाली नदियाँ।
(b) नदियों का महत्व
- पीने और सिंचाई के लिए जल आपूर्ति।
- जल विद्युत उत्पादन।
- मछली पकड़ने और पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में सहायक।
- औद्योगिक और घरेलू उपयोग।
(ii) झीलें (Lakes)
झीलें भू-भागों में जल संचित करने वाले प्राकृतिक या कृत्रिम जलाशय हैं।
(a) झीलों के प्रकार
- मीठे पानी की झीलें (Freshwater Lakes):
- झीलों में संग्रहीत मीठा जल पेयजल और सिंचाई के लिए उपयोगी होता है।
- उदाहरण – डल झील (भारत), विक्टोरिया झील (अफ्रीका)।
- खारे पानी की झीलें (Saltwater Lakes):
- समुद्र से कटे हुए जलाशयों में लवणता अधिक होती है।
- उदाहरण – चिल्का झील (भारत), कैस्पियन सागर (विश्व की सबसे बड़ी खारी झील)।
- ग्लेशियर झीलें (Glacial Lakes):
- ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलें।
- उदाहरण – सतोपंथ झील (भारत)।
- मानव निर्मित झीलें (Artificial Lakes):
- बांधों द्वारा बनाई गई झीलें।
- उदाहरण – गोविंद सागर (भाखड़ा नांगल डैम)।
(b) झीलों का महत्व
- वर्षा जल का संचयन और जल आपूर्ति।
- मत्स्य पालन और पर्यटन स्थल।
- बाढ़ नियंत्रण और भूजल पुनर्भरण।
(iii) जलप्रपात (Waterfalls)
जब कोई नदी या जलधारा ऊँचाई से तेजी से गिरती है, तो जलप्रपात बनता है।
(a) प्रसिद्ध जलप्रपात
- एंजेल फॉल्स (Angel Falls), वेनेजुएला – विश्व का सबसे ऊँचा जलप्रपात।
- विक्टोरिया फॉल्स (Victoria Falls), अफ्रीका – विश्व का सबसे चौड़ा जलप्रपात।
- जोग फॉल्स (Jog Falls), भारत – कर्नाटक में स्थित भारत का प्रमुख जलप्रपात।
(b) जलप्रपात का महत्व
- जलविद्युत उत्पादन।
- पर्यटन स्थल और प्राकृतिक सौंदर्य।
- स्थानीय पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है।
3. भूजल स्रोत और उसका संरक्षण (Groundwater Sources and Conservation)
भूजल वह जल है, जो धरती की सतह के नीचे चट्टानों के छिद्रों और दरारों में संचित होता है।
(i) भूजल स्रोत
- कुएँ (Wells):
- भूजल को निकालने के लिए बने गड्ढे।
- उथले कुएँ और गहरे कुएँ (ट्यूबवेल)।
- झरने (Springs):
- भूमिगत जल प्राकृतिक रूप से बाहर आता है।
- भूजल भंडार (Aquifers):
- जल को संचित करने वाली चट्टानी संरचनाएँ।
- कृत्रिम पुनर्भरण (Artificial Recharge):
- भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए मानव निर्मित तकनीकें।
(ii) भूजल संकट और संरक्षण
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भूजल संकट के कारण
- अत्यधिक दोहन और अंधाधुंध खपत।
- शहरीकरण और औद्योगीकरण।
- वर्षा जल संचयन की कमी।
- जल प्रदूषण और लवणता वृद्धि।
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भूजल संरक्षण के उपाय
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting):
- वर्षा जल को भूमिगत संरचनाओं में संचित करना।
- कृषि में जल दक्षता:
- ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर प्रणाली का उपयोग।
- वन संरक्षण:
- वनों की कटाई को रोककर जल संचित किया जा सकता है।
- जल पुनर्चक्रण (Water Recycling):
- घरेलू और औद्योगिक जल का पुनः उपयोग।
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting):
जलचक्र पृथ्वी पर जल के सतत प्रवाह को बनाए रखता है, जिससे जल संतुलन बना रहता है। सतही जल स्रोत जैसे नदियाँ, झीलें और जलप्रपात, तथा भूजल स्रोत पृथ्वी पर जल उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। लेकिन अत्यधिक दोहन और प्रदूषण के कारण जल संकट बढ़ रहा है, जिसे जल संरक्षण उपायों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।