स्थानीय शासन (Local Governance)
स्थानीय शासन, भारत में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन ने स्थानीय शासन को संवैधानिक मान्यता प्रदान की, जिससे पंचायत राज और शहरी स्थानीय निकायों का गठन किया गया। यह न केवल ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करता है, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रशासन और विकास को भी सशक्त बनाता है।
क. पंचायत राज (73वां संशोधन, 1992)
73वें संशोधन अधिनियम ने भारतीय संविधान के भाग IX में अनुच्छेद 243 से 243O तक शामिल किया। इसमें पंचायतों को त्रि-स्तरीय संरचना के रूप में स्थापित किया गया।
1. त्रि-स्तरीय संरचना (Three-Tier Structure)
पंचायत राज व्यवस्था तीन स्तरों पर कार्य करती है:
- ग्राम पंचायत (Village Level):
- गाँव स्तर पर पंचायत होती है।
- यह ग्राम सभा के मार्गदर्शन में कार्य करती है।
- पंचायत समिति (Intermediate Level):
- ब्लॉक या तहसील स्तर पर।
- कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर पंचायत समिति का गठन होता है।
- जिला परिषद (District Level):
- यह जिले का सर्वोच्च निकाय है।
- सभी पंचायत समितियों के कार्यों की निगरानी और समन्वय करती है।
2. ग्राम सभा (Gram Sabha)
- ग्राम सभा पंचायत राज व्यवस्था का सबसे निचला और बुनियादी स्तर है।
- इसमें गाँव के वयस्क मतदाता शामिल होते हैं।
- ग्राम सभा स्थानीय विकास योजनाओं को अनुमोदित करती है और पंचायतों के कार्यों की निगरानी करती है।
3. आरक्षण (Reservation)
- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण।
- कम से कम 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित।
- राज्य सरकारें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार आरक्षण बढ़ा सकती हैं।
4. वित्तीय अधिकार (Financial Powers)
- पंचायतों को कर वसूलने, अनुदान प्राप्त करने, और वित्तीय योजनाएँ लागू करने का अधिकार दिया गया है।
- राज्य वित्त आयोग, पंचायतों को वित्तीय संसाधन आवंटित करने की सिफारिश करता है।
5. राज्य चुनाव आयोग (State Election Commission)
- पंचायत चुनावों का संचालन करने के लिए राज्य स्तर पर स्वतंत्र चुनाव आयोग की स्थापना की गई।
- प्रत्येक पाँच वर्षों में पंचायत चुनाव होना अनिवार्य है।
ख. शहरी स्थानीय निकाय (74वां संशोधन, 1992)
74वें संशोधन अधिनियम ने भारतीय संविधान के भाग IXA में अनुच्छेद 243P से 243ZG तक जोड़ा। इसमें नगर निगमों, नगर पालिकाओं, और अन्य शहरी निकायों को शामिल किया गया।
1. नगर निगम और परिषदें
शहरी स्थानीय निकायों को उनकी जनसंख्या और क्षेत्रफल के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया गया है:
- नगर निगम (Municipal Corporation):
- बड़े शहरों में स्थापित।
- जैसे: दिल्ली, मुंबई, चेन्नई।
- नगर पालिका (Municipality):
- मध्यम आकार के शहरों में।
- जैसे: अलवर, अलीगढ़।
- नगर पंचायत (Nagar Panchayat):
- छोटे कस्बों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में।
- यह गाँव और शहर के बीच की स्थिति के लिए होती है।
2. शहरी निकायों की संरचना
- शहरी निकायों में निर्वाचित प्रतिनिधि (पार्षद) होते हैं।
- अध्यक्ष (मेयर) का चुनाव किया जाता है।
- प्रशासनिक कार्यों के लिए आयुक्त (Commissioner) की नियुक्ति होती है।
3. आरक्षण
- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण।
- महिलाओं के लिए कम से कम 33% आरक्षण।
4. वित्तीय अधिकार
- संपत्ति कर, मनोरंजन कर, जल कर जैसे कर लगाने का अधिकार।
- केंद्र और राज्य सरकार से अनुदान और सहायता।
5. मेट्रोपॉलिटन योजना समिति
- 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले महानगरों के लिए योजना समिति का गठन।
- यह समिति शहरी विकास और योजना की निगरानी करती है।
पंचायत राज और शहरी निकायों के महत्व
1. लोकतांत्रिक सशक्तिकरण
- जनता को अपनी समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान खोजने का अधिकार मिलता है।
- लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होती है।
2. विकास की गति
- स्थानीय प्रशासन विकास कार्यों की प्राथमिकताओं को बेहतर तरीके से समझता है।
- ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का विकास।
3. आर्थिक सशक्तिकरण
- पंचायत और शहरी निकायों को वित्तीय अधिकार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया गया।
4. सामाजिक न्याय
- आरक्षण के प्रावधान से समाज के पिछड़े वर्गों और महिलाओं को सशक्त किया गया।
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
- वित्तीय संसाधनों की कमी:
- पंचायतों और नगर निकायों के पास पर्याप्त वित्तीय अधिकार नहीं।
- केंद्र और राज्य सरकारों का हस्तक्षेप:
- स्थानीय प्रशासन की स्वायत्तता में बाधा।
- शिक्षित प्रतिनिधियों की कमी:
- जनप्रतिनिधियों के पास प्रशासनिक क्षमता और ज्ञान की कमी।
- अनियमित चुनाव:
- कई राज्यों में चुनाव समय पर नहीं होते।
73वें और 74वें संशोधन ने भारत में स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा देकर लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुँचाया। पंचायत राज और शहरी निकाय न केवल विकास को बढ़ावा देते हैं, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशिता को भी सुनिश्चित करते हैं। हालाँकि, चुनौतियों से निपटने के लिए वित्तीय और प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता है।