प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)
प्राकृतिक संसाधन वे सभी संसाधन हैं जो पृथ्वी द्वारा प्रदान किए जाते हैं और मानव अस्तित्व और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं। इन संसाधनों का सतत उपयोग और संरक्षण आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इनका लाभ उठा सकें।
- जल संसाधन: जल संकट, जल पुनर्चक्रण
- वन संसाधन: वन संरक्षण और वनों की अन्धाधुंध कटाई
- खनिज संसाधन: खनिजों का निष्कर्षण और उनका पर्यावरणीय प्रभाव
- ऊर्जा संसाधन: पारंपरिक (कोयला, पेट्रोलियम) और नवीकरणीय (सौर, पवन)
1. जल संसाधन (Water Resources)
जल संसाधन पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। हालांकि, बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए जल पुनर्चक्रण (Water Recycling) और जल संरक्षण के उपाय अपनाना आवश्यक है।
1.1 जल संकट (Water Crisis)
(i) जल संकट का अर्थ
जल संकट का अर्थ है पानी की उपलब्धता में कमी या उपयोग योग्य स्वच्छ जल की कमी। यह समस्या तब उत्पन्न होती है जब जल की मांग उसकी आपूर्ति से अधिक हो जाती है।
(ii) जल संकट के कारण
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अत्यधिक दोहन (Over-extraction):
- कृषि, उद्योग, और घरेलू उपयोग में जल की अत्यधिक खपत।
- भूजल स्तर में गिरावट।
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जलवायु परिवर्तन (Climate Change):
- वर्षा चक्र में अस्थिरता।
- बढ़ता तापमान और ग्लेशियरों का पिघलना।
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जल स्रोतों का प्रदूषण (Water Pollution):
- औद्योगिक और घरेलू कचरे के कारण नदियों, झीलों और भूजल का प्रदूषण।
- कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग।
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वनों की कटाई (Deforestation):
- जल संतुलन में असंतुलन।
- भूमि अपरदन और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की क्षमता में कमी।
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शहरीकरण और औद्योगीकरण:
- बढ़ती जनसंख्या के कारण जल संसाधनों पर दबाव।
- कंक्रीट संरचनाओं के कारण वर्षा जल का अवशोषण कम होना।
(iii) जल संकट के प्रभाव
- कृषि उत्पादन में गिरावट।
- पेयजल की कमी।
- स्वास्थ्य समस्याएँ (जलजनित रोग)।
- अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (उद्योगों और व्यापार पर असर)।
- वनस्पतियों और जीवों पर नकारात्मक प्रभाव।
1.2 जल पुनर्चक्रण (Water Recycling)
(i) जल पुनर्चक्रण का अर्थ
जल पुनर्चक्रण एक प्रक्रिया है जिसमें प्रयुक्त जल को पुनः उपयोग के लिए शुद्ध किया जाता है। इससे जल संकट को कम किया जा सकता है और जल संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है।
(ii) जल पुनर्चक्रण के प्रकार
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घरेलू जल पुनर्चक्रण (Domestic Water Recycling):
- नहाने, कपड़े धोने, और बर्तन धोने से निकले पानी को बागवानी और सफाई कार्यों में पुनः उपयोग करना।
- वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting)।
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औद्योगिक जल पुनर्चक्रण (Industrial Water Recycling):
- कारखानों में इस्तेमाल किए गए जल को शुद्ध कर पुनः उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग करना।
- गंदे पानी को ट्रीटमेंट प्लांट से साफ कर सिंचाई और शीतलन (Cooling) में इस्तेमाल करना।
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कृषि जल पुनर्चक्रण (Agricultural Water Recycling):
- अपशिष्ट जल को ट्रीट कर सिंचाई में पुनः उपयोग।
- टपक सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर प्रणाली का उपयोग।
(iii) जल पुनर्चक्रण के लाभ
- जल की बचत और जल संकट में कमी।
- कृषि और उद्योगों में जल उपलब्धता बढ़ाना।
- जल प्रदूषण को कम करना।
- भूजल स्तर में सुधार।
1.3 जल संकट से निपटने के उपाय
(i) जल संरक्षण के उपाय
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वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting):
- घरों और खेतों में वर्षा जल एकत्र कर भूजल पुनर्भरण बढ़ाना।
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कृषि में जल प्रबंधन:
- टपक सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर प्रणाली का उपयोग।
- जल-संरक्षण तकनीकों वाली फसलों को अपनाना।
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औद्योगिक जल प्रबंधन:
- जल पुनर्चक्रण और जल शुद्धिकरण संयंत्रों का निर्माण।
- औद्योगिक अपशिष्टों का सही तरीके से निस्तारण।
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घरेलू जल संरक्षण:
- जल की अनावश्यक बर्बादी को रोकना।
- पुनः उपयोग योग्य जल को अधिकतम प्रयोग करना।
(ii) सरकार द्वारा जल संरक्षण के प्रयास
- अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana)।
- जल शक्ति अभियान (Jal Shakti Abhiyan)।
- नमामि गंगे परियोजना (Namami Gange Programme)।
- राज्यों में जल पुनर्चक्रण और संरक्षण योजनाएँ
जल संकट एक गंभीर समस्या है, लेकिन जल पुनर्चक्रण और संरक्षण के प्रभावी उपाय अपनाकर इसे कम किया जा सकता है। सतत विकास (Sustainable Development) के लिए जल का विवेकपूर्ण उपयोग और पुनर्चक्रण आवश्यक है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जल उपलब्ध रह सके।
2. वन संसाधन (Forest Resources)
वन पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन हैं। ये न केवल जैव विविधता को संरक्षित करते हैं, बल्कि जलवायु संतुलन बनाए रखने, मिट्टी के कटाव को रोकने और कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण में भी सहायक होते हैं। लेकिन औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और कृषि विस्तार के कारण वनों की अंधाधुंध कटाई (Deforestation) हो रही है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है।
2.1 वन संसाधन का महत्व (Importance of Forest Resources)
(i) पारिस्थितिकीय महत्व (Ecological Importance)
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जलवायु नियंत्रण:
- वायुमंडलीय संतुलन बनाए रखते हैं।
- कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
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जैव विविधता संरक्षण:
- वन्यजीवों और विभिन्न वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास।
- खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं।
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जल स्रोतों की सुरक्षा:
- वर्षा जल को अवशोषित कर भूजल स्तर बनाए रखते हैं।
- नदी और झीलों के जल प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।
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मृदा संरक्षण:
- मिट्टी के अपरदन को रोकते हैं।
- रेगिस्तानीकरण (Desertification) को रोकने में सहायक।
(ii) आर्थिक महत्व (Economic Importance)
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लकड़ी और ईंधन:
- फर्नीचर, कागज, ईंधन और अन्य औद्योगिक उत्पादों के लिए उपयोग।
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औषधीय महत्व:
- विभिन्न जड़ी-बूटियाँ और वनस्पतियाँ दवाओं में प्रयोग की जाती हैं।
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रोज़गार के अवसर:
- वनों से संबंधित उद्योगों (कागज, रबर, लकड़ी) में लोगों को रोजगार मिलता है।
2.2 वनों की अंधाधुंध कटाई (Deforestation)
(i) वनों की कटाई के कारण (Causes of Deforestation)
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कृषि विस्तार (Agricultural Expansion):
- वनों को साफ करके कृषि योग्य भूमि बनाई जाती है।
- झूम खेती (Shifting Cultivation) भी एक कारण है।
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शहरीकरण और औद्योगीकरण:
- बढ़ती जनसंख्या के कारण आवासीय और औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार।
- आधारभूत संरचना (Infrastructure) के लिए वनों की कटाई।
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वन उत्पादों का अत्यधिक दोहन:
- लकड़ी, रबर, कागज और औषधीय पौधों की अत्यधिक कटाई।
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खनन गतिविधियाँ (Mining Activities):
- खनिज संसाधनों की खुदाई के लिए वनों का विनाश।
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वनाग्नि (Forest Fires):
- प्राकृतिक और मानवजनित कारणों से वनों में आग लगना।
(ii) वनों की कटाई के प्रभाव (Effects of Deforestation)
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पर्यावरणीय असंतुलन:
- जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस प्रभाव में वृद्धि।
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मृदा अपरदन (Soil Erosion):
- मिट्टी की उर्वरता में कमी और बंजर भूमि का विस्तार।
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जल संकट:
- भूजल स्तर में गिरावट और वर्षा चक्र में अस्थिरता।
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वन्यजीवों पर प्रभाव:
- जैव विविधता का ह्रास और कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा।
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मानव जीवन पर प्रभाव:
- कृषि उत्पादन में गिरावट, प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ।
2.3 वन संरक्षण (Forest Conservation)
(i) वन संरक्षण के उपाय (Measures for Forest Conservation)
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अफorestation और पुनर्वनीकरण (Afforestation and Reforestation):
- बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और नष्ट हुए वनों को पुनः उगाना।
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सतत वन प्रबंधन (Sustainable Forest Management):
- वनों के वैज्ञानिक प्रबंधन द्वारा उनकी कटाई और पुनर्रोपण में संतुलन बनाए रखना।
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संरक्षित क्षेत्र (Protected Areas):
- राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र बनाए रखना।
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संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM):
- सरकार और स्थानीय समुदायों के सहयोग से वनों का संरक्षण।
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कानूनी उपाय:
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980।
- जैव विविधता संरक्षण अधिनियम, 2002।
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समुदाय आधारित पहल:
- चिपको आंदोलन, अप्पिको आंदोलन जैसे जनआंदोलन।
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शिक्षा और जागरूकता:
- वन संरक्षण के महत्व पर जन-जागरूकता अभियान चलाना।
(ii) सरकार की पहल (Government Initiatives for Forest Conservation)
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राष्ट्रीय वन नीति (National Forest Policy, 1988):
- देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 33% भाग वन क्षेत्र बनाए रखने का लक्ष्य।
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राष्ट्रीय हरित मिशन (National Green Mission):
- वन पुनर्वास और वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।
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CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority):
- वन कटाई की क्षति की भरपाई के लिए वृक्षारोपण कार्यक्रम।
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वन्यजीव संरक्षण परियोजनाएँ:
- प्रोजेक्ट टाइगर (1973), प्रोजेक्ट एलीफेंट (1992)।
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UN REDD+ कार्यक्रम:
- वनों की कटाई और वन क्षरण को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर वित्तीय सहायता।
वन संरक्षण न केवल जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से निपटने और सतत विकास (Sustainable Development) के लिए भी अनिवार्य है। सरकार, समाज और व्यक्तियों को मिलकर वनों की अंधाधुंध कटाई रोकने और हरियाली बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। “वन है तो जीवन है” – इस मूल मंत्र को अपनाकर ही हम भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं।
3. खनिज संसाधन (Mineral Resources)
खनिज संसाधन (Mineral Resources) पृथ्वी की सतह के नीचे पाए जाने वाले धात्विक और अधात्विक पदार्थ हैं, जो उद्योगों, निर्माण कार्यों और तकनीकी विकास में उपयोग किए जाते हैं। लेकिन इनका अत्यधिक निष्कर्षण (Mining) और अनुचित उपयोग पर्यावरणीय असंतुलन का कारण बन सकता है।
3.1 खनिज संसाधनों का महत्व (Importance of Mineral Resources)
(i) आर्थिक महत्व (Economic Importance)
- औद्योगिक उपयोग:
- लोहा, बॉक्साइट, तांबा, मैंगनीज, क्रोमाइट आदि धातुएँ इस्पात उद्योग, ऑटोमोबाइल, और मशीन निर्माण में आवश्यक हैं।
- ऊर्जा उत्पादन:
- कोयला, पेट्रोलियम, और प्राकृतिक गैस ऊर्जा उत्पादन और परिवहन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
- निर्माण कार्य:
- चूना पत्थर, डोलोमाइट और जिप्सम सीमेंट उद्योग में महत्वपूर्ण हैं।
- रोजगार:
- खनन उद्योग में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है।
- विदेशी मुद्रा अर्जन:
- खनिजों का निर्यात देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाता है।
(ii) रणनीतिक और वैज्ञानिक महत्व (Strategic and Scientific Importance)
- रक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान:
- यूरेनियम, थोरियम, टाइटेनियम जैसे खनिज परमाणु ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में उपयोग किए जाते हैं।
- तकनीकी विकास:
- सिलिकॉन, लिथियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा उपकरणों के लिए आवश्यक हैं।
3.2 खनिज निष्कर्षण (Mineral Extraction)
खनिजों को विभिन्न तरीकों से निकाला जाता है, जिनमें खुली खदान (Open-Cast Mining), भूमिगत खनन (Underground Mining), ड्रेजिंग (Dredging), और कुआँ खनन (Well Mining) शामिल हैं।
(i) खनन के प्रकार (Types of Mining)
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खुले गड्ढे खनन (Open-Pit Mining):
- सतह के निकट स्थित खनिजों को निकालने के लिए भूमि की सतह को काटकर किया जाता है।
- उदाहरण: लौह अयस्क, बॉक्साइट।
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भूमिगत खनन (Underground Mining):
- गहरे स्थित खनिजों के लिए सुरंगें बनाकर खनिज निकाले जाते हैं।
- उदाहरण: कोयला, सोना, तांबा।
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ड्रेजिंग (Dredging):
- समुद्र और नदी तल से रेत, गाद और खनिज निकाले जाते हैं।
- उदाहरण: टाइटेनियम, जिरकोन।
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कुआँ खनन (Well Mining):
- तरल और गैसीय खनिजों (पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस) को निकालने के लिए कुओं का उपयोग किया जाता है।
3.3 खनिज निष्कर्षण के पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact of Mining)
खनिज निष्कर्षण से पर्यावरणीय असंतुलन उत्पन्न होता है, जो निम्नलिखित रूपों में देखा जाता है:
(i) भूमि क्षरण (Land Degradation)
- खनन के कारण बड़े भू-भाग की क्षति:
- खुले गड्ढे खनन से भूमि की उत्पादकता समाप्त हो जाती है।
- खनन अपशिष्ट (Mining Waste):
- खनिज निष्कर्षण से निकले बेकार पदार्थ और टेलिंग्स (Tailings) मिट्टी की गुणवत्ता को खराब करते हैं।
(ii) वायु प्रदूषण (Air Pollution)
- धूल और रासायनिक कणों का उत्सर्जन:
- खनन गतिविधियों से उड़ने वाली धूल और विषैली गैसें (सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड) वायु प्रदूषण बढ़ाती हैं।
- ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन:
- कोयला खनन से मिथेन (CH₄) उत्सर्जित होती है, जो ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती है।
(iii) जल प्रदूषण (Water Pollution)
- खनिज अपशिष्ट से जल स्रोतों की विषाक्तता:
- एसिड माइन ड्रेनेज (Acid Mine Drainage) से जल स्रोतों में सल्फर यौगिक मिलकर जल प्रदूषित करते हैं।
- भूजल स्तर में गिरावट:
- अत्यधिक जल दोहन से भूजल स्तर घटता है, जिससे पेयजल संकट उत्पन्न हो सकता है।
(iv) जैव विविधता पर प्रभाव (Impact on Biodiversity)
- वनों की कटाई और प्राकृतिक आवास का विनाश:
- खनन से जंगल नष्ट होते हैं, जिससे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास खत्म हो जाता है।
- वन्यजीव प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा:
- जैव विविधता को नुकसान पहुँचता है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है।
(v) मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (Impact on Human Health)
- स्वास्थ्य संबंधी बीमारियाँ:
- धूल और विषैली गैसों के कारण श्वसन तंत्र, त्वचा रोग और अन्य बीमारियाँ फैलती हैं।
- खान श्रमिकों के लिए खतरा:
- भूमिगत खनन में गैस विस्फोट और खनन दुर्घटनाओं की संभावना अधिक होती है।
3.4 सतत खनिज प्रबंधन (Sustainable Mineral Management)
खनिज संसाधनों के टिकाऊ उपयोग और पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय अपनाने की आवश्यकता है:
(i) पर्यावरण-अनुकूल खनन (Eco-Friendly Mining)
- खान पुनर्वास (Mine Reclamation):
- निष्कर्षण के बाद खनन क्षेत्रों को पुनः हरित क्षेत्र में बदलना।
- स्वच्छ तकनीकों का उपयोग:
- कम प्रदूषणकारी तकनीकों और मशीनों का उपयोग करना।
(ii) खनिज संरक्षण (Mineral Conservation)
- खनिजों का पुनर्चक्रण (Recycling of Minerals):
- धात्विक अपशिष्टों का पुनर्चक्रण कर नए खनिज निष्कर्षण की आवश्यकता को कम करना।
- खनिजों का कुशल उपयोग:
- खनिजों के अपव्यय को रोककर अधिक समय तक इनका उपयोग सुनिश्चित करना।
(iii) कानूनी उपाय (Legal Measures)
- खनन अधिनियम, 1957 (Mines and Minerals Act, 1957):
- भारत में खनन और खनिजों के सतत उपयोग के लिए लागू किया गया कानून।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA):
- खनन परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन करना।
(iv) जागरूकता और स्थानीय समुदाय की भागीदारी
- स्थानीय जनसंख्या को जागरूक करना:
- खनन से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति स्थानीय समुदायों को जागरूक करना।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी:
- खनिज निष्कर्षण नीति में स्थानीय लोगों की भागीदारी को बढ़ावा देना।
खनिज संसाधन आर्थिक और औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक हैं, लेकिन इनका अनुचित निष्कर्षण गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याओं को जन्म देता है। सतत खनन तकनीकों और कड़े पर्यावरणीय नियमों को अपनाकर ही हम खनिज संसाधनों का उपयोग टिकाऊ रूप से कर सकते हैं। खनिज संरक्षण और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना आज की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
4. ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)
ऊर्जा किसी भी देश के आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और जनजीवन की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊर्जा संसाधनों को पारंपरिक (Traditional) और नवीकरणीय (Renewable) श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
4.1 पारंपरिक ऊर्जा संसाधन (Traditional Energy Resources)
पारंपरिक ऊर्जा संसाधन वे हैं, जो जैविक या खनिज ईंधनों से प्राप्त होते हैं और सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं। इनका अत्यधिक दोहन करने से यह समाप्त हो सकते हैं तथा पर्यावरणीय प्रदूषण भी उत्पन्न करते हैं।
(i) कोयला (Coal)
उत्पत्ति और प्रकार:
- कोयला मुख्य रूप से मृत जैविक पदार्थों (पेड़-पौधों) के अवशेषों से बना हुआ एक दहनशील पदार्थ है।
- प्रमुख प्रकार:
- ऐंथ्रासाइट (Anthracite) – उच्चतम गुणवत्ता, सर्वाधिक कार्बन (80-90%)।
- बिटुमिनस (Bituminous) – सर्वाधिक उपयोगी, कार्बन 60-80%।
- लिग्नाइट (Lignite) – निम्न गुणवत्ता, कार्बन 40-55%।
- पीट (Peat) – अधूरा कोयला, सर्वाधिक नमीयुक्त।
भारत में कोयला खनन क्षेत्र:
- झारखंड (झरिया, बोकारो, रानीगंज)
- ओडिशा (तालचेर, अंगुल)
- छत्तीसगढ़ (कोरबा)
- पश्चिम बंगाल (रानीगंज)
फायदे:
- ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख स्रोत।
- सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध।
हानियाँ:
- कोयला जलने से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) जैसी गैसें निकलती हैं, जो प्रदूषण बढ़ाती हैं।
- भूमि क्षरण और वनों की कटाई का कारण बनता है।
(ii) पेट्रोलियम (Petroleum)
परिचय:
- यह जीवाश्म ईंधन है, जो समुद्री जैविक अवशेषों के अपघटन से बना है।
- इसका उपयोग वाहनों, बिजली उत्पादन, और औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।
भारत में प्रमुख पेट्रोलियम क्षेत्र:
- ओनशोर (Onshore) क्षेत्र: असम (डिगबोई, सिबसागर), गुजरात (अंकलेश्वर), राजस्थान (बाड़मेर)।
- ऑफशोर (Offshore) क्षेत्र: मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन।
फायदे:
- उच्च ऊर्जा दक्षता वाला ईंधन।
- परिवहन और औद्योगिक उपयोग में बहुप्रचलित।
हानियाँ:
- सीमित भंडार और बढ़ती मांग।
- जल और वायु प्रदूषण (ऑयल स्पिल, कार्बन उत्सर्जन)।
(iii) प्राकृतिक गैस (Natural Gas)
परिचय:
- यह एक स्वच्छ जीवाश्म ईंधन है, जिसमें मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) पाई जाती है।
- इसका उपयोग घरेलू गैस (LPG, CNG), बिजली उत्पादन, और औद्योगिक गतिविधियों में किया जाता है।
भारत में प्राकृतिक गैस भंडार:
- मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, असम, त्रिपुरा।
फायदे:
- कोयले और पेट्रोलियम की तुलना में कम प्रदूषणकारी।
- ऊर्जा दक्षता अधिक होती है।
हानियाँ:
- सीमित भंडार।
- प्राकृतिक गैस के रिसाव से मीथेन उत्सर्जन होता है, जो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाता है।
4.2 नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन (Renewable Energy Resources)
नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन वे हैं, जो प्राकृतिक स्रोतों से निरंतर उपलब्ध होते हैं और पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होते हैं।
(i) सौर ऊर्जा (Solar Energy)
परिचय:
- सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को फोटोवोल्टिक (PV) सेल या थर्मल सिस्टम द्वारा विद्युत में बदला जाता है।
- इसका उपयोग घरेलू बिजली, कृषि सिंचाई, उद्योगों में किया जाता है।
भारत में प्रमुख सौर ऊर्जा परियोजनाएँ:
- भदला सौर पार्क (राजस्थान)
- पवागड़ा सौर पार्क (कर्नाटक)
- रीवा सौर परियोजना (मध्य प्रदेश)
फायदे:
- असीमित और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत।
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन नहीं होता।
हानियाँ:
- स्थापना लागत अधिक।
- सूर्य की रोशनी पर निर्भरता, जिससे बादल या रात में उत्पादन कम होता है।
(ii) पवन ऊर्जा (Wind Energy)
परिचय:
- वायु प्रवाह से टर्बाइन की सहायता से बिजली उत्पन्न की जाती है।
- भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन में तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र अग्रणी हैं।
प्रमुख पवन ऊर्जा संयंत्र:
- मुंद्रा (गुजरात)
- कोडाइकनाल (तमिलनाडु)
- जैसलमेर (राजस्थान)
फायदे:
- सस्ती और अक्षय ऊर्जा।
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन नहीं होता।
हानियाँ:
- अनियमित हवा होने पर उत्पादन कम होता है।
- पक्षियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(iii) जलविद्युत ऊर्जा (Hydropower Energy)
परिचय:
- जल प्रवाह को नियंत्रित करके टरबाइन घुमाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है।
- बड़ी जलविद्युत परियोजनाएँ:
- भाखड़ा नांगल (हिमाचल प्रदेश)
- सरदार सरोवर (गुजरात)
- टिहरी (उत्तराखंड)
फायदे:
- स्वच्छ और नवीकरणीय स्रोत।
- सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण में सहायक।
हानियाँ:
- बड़े बांधों के निर्माण से पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव।
- जैव विविधता और जलचक्र पर प्रभाव।
(iv) जैव ऊर्जा (Bio-Energy)
परिचय:
- जैविक अपशिष्ट, फसल अवशेष, लकड़ी, और गोबर से ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।
- जैव ईंधन: इथेनॉल, बायोडीजल।
फायदे:
- पारंपरिक ईंधनों का विकल्प।
- जैव अपशिष्ट प्रबंधन में सहायक।
हानियाँ:
- बड़ी मात्रा में जैव ईंधन उत्पादन के लिए कृषि भूमि की आवश्यकता।
- उच्च लागत और सीमित संसाधन।
ऊर्जा संसाधनों का संतुलित और सतत उपयोग आवश्यक है। पारंपरिक ऊर्जा संसाधन सीमित हैं और प्रदूषण बढ़ाते हैं, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा स्वच्छ, असीमित और टिकाऊ हैं। भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए सौर, पवन और जैव ऊर्जा पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास संभव हो सके।
प्राकृतिक संसाधनों का सतत और विवेकपूर्ण उपयोग अत्यंत आवश्यक है। जल, वन, खनिज और ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण और पुनर्चक्रण (Recycling) भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होगा। सरकार और समाज को मिलकर सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों को अपनाना चाहिए ताकि प्राकृतिक संसाधन दीर्घकालिक रूप से उपलब्ध रह सकें।