महासागर और उनके गुण – Oceans and Their Properties

 महासागर और उनके गुण (Oceans and Their Properties)

महासागर पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग घेरे हुए हैं और जलवायु को संतुलित करने, जैव विविधता बनाए रखने और विभिन्न पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। महासागरों की विशेषताएँ जैसे तापमान, लवणता, धाराएँ, लहरें और ज्वार-भाटा पृथ्वी की जलवायु और मौसम पर प्रभाव डालते हैं। इस अध्याय में हम महासागरों के वितरण, उनके गुणों और महासागरीय प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

  • महासागरों का वितरण और जल के गुण
  • महासागरीय तापमान और लवणता
  • महासागरीय धाराएँ: गर्म और ठंडी धाराएँ
  • लहरें, ज्वार-भाटा, और सुनामी

  • 1. महासागरों का वितरण और जल के गुण

    (i) महासागरों का वितरण (Distribution of Oceans)

    पृथ्वी पर पाँच प्रमुख महासागर हैं:

    महासागर क्षेत्रफल (लगभग, मिलियन वर्ग किमी) गहराई (औसत, मीटर) महत्वपूर्ण विशेषताएँ
    प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) 168.72 4,280 सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर, इसमें मैरियाना ट्रेंच स्थित है।
    अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean) 85.13 3,646 यह यूरोप और अमेरिका के बीच स्थित है, इसमें मिड-अटलांटिक रिज पाया जाता है।
    हिंद महासागर (Indian Ocean) 70.56 3,741 यह गर्म जल का महासागर है और मानसून पर प्रभाव डालता है।
    दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) 21.96 3,270 अंटार्कटिका के चारों ओर स्थित, ठंडे जल का महासागर।
    आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean) 15.56 1,205 पृथ्वी का सबसे छोटा और सबसे ठंडा महासागर।

    (ii) महासागरीय जल के गुण (Properties of Ocean Water)

    महासागरीय जल में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं:

    1. घनत्व (Density): जल का घनत्व तापमान, लवणता और गहराई के अनुसार बदलता है।
    2. पारदर्शिता (Transparency): जल की स्वच्छता और उसमें मौजूद कणों की उपस्थिति से पारदर्शिता प्रभावित होती है।
    3. रंग (Color): महासागर का जल मुख्य रूप से नीला दिखाई देता है क्योंकि सूर्य के प्रकाश का नीला भाग अधिक परावर्तित होता है।
    4. घुलित गैसें (Dissolved Gases): महासागरीय जल में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन घुली होती हैं।

    2. महासागरीय तापमान और लवणता

    (i) महासागरीय तापमान (Ocean Temperature)

    • महासागरों का तापमान सूर्य के विकिरण, अक्षांश, गहराई और महासागरीय धाराओं के आधार पर भिन्न होता है।

    • भूमध्य रेखा के पास जल अधिक गर्म (25°C – 30°C) होता है, जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों में जल का तापमान 0°C से नीचे जा सकता है।

    • महासागर की गहराई के अनुसार तापमान तीन मुख्य स्तरों में विभाजित किया जाता है:

      1. सतही क्षेत्र (Surface Zone): 100-200 मीटर गहराई तक, तापमान अधिक होता है।
      2. थर्मोकलाइन (Thermocline Zone): 200-1000 मीटर गहराई तक, तापमान तेजी से गिरता है।
      3. गहरा क्षेत्र (Deep Zone): 1000 मीटर से अधिक गहराई में, तापमान बहुत कम (0°C – 4°C) रहता है।

    (ii) महासागरीय लवणता (Ocean Salinity)

    • महासागरीय जल में घुले हुए लवणों की मात्रा को लवणता (Salinity) कहते हैं।
    • सामान्यतः महासागरीय जल की लवणता 35‰ (भाग प्रति हजार) होती है।
    • लवणता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं:
      1. वर्षा और वाष्पीकरण: अधिक वाष्पीकरण से लवणता बढ़ती है (जैसे – लाल सागर)।
      2. नदी जल का मिलना: नदियों के मिलन से लवणता कम होती है (जैसे – बंगाल की खाड़ी)।
      3. हिमनदों का पिघलना: बर्फ पिघलने से लवणता कम हो जाती है।

    3. महासागरीय धाराएँ गर्म और ठंडी धाराएँ(Ocean Currents Warm and Cold Currents)

    महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents) महासागर के जल का सतत प्रवाह हैं, जो पृथ्वी के जलवायु तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये धाराएँ समुद्र के जल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं और वैश्विक तापमान संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं। महासागरीय धाराओं को उनके तापमान के आधार पर दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है:

    1. गर्म महासागरीय धाराएँ (Warm Ocean Currents)
    2. ठंडी महासागरीय धाराएँ (Cold Ocean Currents)

    इन धाराओं का निर्माण पृथ्वी के घूर्णन, वायुदाब में परिवर्तन, तापमान भिन्नता और महासागरीय लवणता जैसे विभिन्न कारकों के कारण होता है।


    3.1 महासागरीय धाराओं के निर्माण के प्रमुख कारण

    महासागरीय धाराएँ विभिन्न कारकों के कारण उत्पन्न होती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

    (i) पृथ्वी का घूर्णन (Coriolis Effect)

    • पृथ्वी के घूमने के कारण महासागरीय धाराएँ उत्तरी गोलार्ध में दक्षिणावर्त (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (Counterclockwise) प्रवाहित होती हैं।
    • इसे कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect) कहा जाता है।

    (ii) पवनें (Wind Patterns)

    • व्यापारिक पवनें (Trade Winds) और पछुआ पवनें (Westerlies) महासागरीय धाराओं की दिशा निर्धारित करने में मदद करती हैं।
    • जैसे, उत्तरी अटलांटिक में गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) को पछुआ पवनें प्रभावित करती हैं।

    (iii) तापमान और लवणता में अंतर (Temperature and Salinity Differences)

    • गर्म और ठंडे जल की भिन्नता महासागर में जल के प्रवाह को उत्पन्न करती है।
    • उच्च लवणता वाले क्षेत्रों में जल घना होता है और नीचे चला जाता है, जिससे गहरे जल की धाराएँ बनती हैं।

    (iv) महाद्वीपीय बाधाएँ (Continental Barriers)

    • महासागरीय धाराएँ जब महाद्वीपों से टकराती हैं तो उनकी दिशा बदल जाती है।
    • जैसे, दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर ब्राज़ील धारा (Brazil Current) पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है।

    3.2 गर्म महासागरीय धाराएँ (Warm Ocean Currents)

    गर्म महासागरीय धाराएँ भूमध्य रेखा (Equator) से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होती हैं। ये धाराएँ गर्म जल को उच्च अक्षांशों तक ले जाती हैं और तटीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ाती हैं।

    (i) प्रमुख गर्म महासागरीय धाराएँ और उनके स्थान

    महासागर गर्म धारा स्थान
    अटलांटिक महासागर गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) उत्तरी अटलांटिक, अमेरिका के पूर्वी तट से यूरोप की ओर
    ब्राज़ील धारा (Brazil Current) दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर
    उत्तर अटलांटिक धारा (North Atlantic Current) उत्तरी अटलांटिक
    प्रशांत महासागर कुरोशियो धारा (Kuroshio Current) जापान के पास
    अलास्का धारा (Alaska Current) उत्तरी प्रशांत में
    पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current) ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर
    हिंद महासागर अगुलहास धारा (Agulhas Current) अफ्रीका के दक्षिणी तट पर
    सोमालिया धारा (Somali Current) अफ्रीका के पूर्वी तट पर
    दक्षिणी महासागर अंटार्कटिक ध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current) अंटार्कटिका के चारों ओर

    (ii) गर्म महासागरीय धाराओं का प्रभाव

    1. तटीय जलवायु को गर्म करना:

      • गर्म धाराएँ जिन क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं, वहाँ का तापमान बढ़ा देती हैं।
      • जैसे, गल्फ स्ट्रीम के कारण ब्रिटेन का जलवायु अपेक्षाकृत गर्म रहता है।
    2. मौसम और वर्षा पर प्रभाव:

      • गर्म धाराएँ आर्द्रता को बढ़ाती हैं और वर्षा के रूप में इसे वायुमंडल में छोड़ती हैं।
      • उदाहरण: गर्म धाराओं के कारण जापान और पश्चिमी यूरोप में वर्षा अधिक होती है।
    3. मत्स्य पालन पर प्रभाव:

      • गर्म धाराओं वाले क्षेत्रों में मछलियों की विविधता अधिक होती है, जिससे मत्स्य पालन उद्योग को लाभ होता है।

    3.3 ठंडी महासागरीय धाराएँ (Cold Ocean Currents)

    ठंडी महासागरीय धाराएँ ध्रुवीय क्षेत्रों से भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होती हैं। ये धाराएँ ठंडे जल को गर्म क्षेत्रों तक ले जाती हैं और तटीय क्षेत्रों के तापमान को कम करती हैं।

    (i) प्रमुख ठंडी महासागरीय धाराएँ और उनके स्थान

    महासागर ठंडी धारा स्थान
    अटलांटिक महासागर लैब्राडोर धारा (Labrador Current) कनाडा के पूर्वी तट पर
    कनारी धारा (Canary Current) पश्चिमी अफ्रीका के पास
    बेगुएला धारा (Benguela Current) दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका के पास
    प्रशांत महासागर कैलिफोर्निया धारा (California Current) उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर
    पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current) दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर
    हिंद महासागर पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current) ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट पर
    दक्षिणी महासागर अंटार्कटिक ध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current) अंटार्कटिका के चारों ओर

    (ii) ठंडी महासागरीय धाराओं का प्रभाव

    1. तटीय क्षेत्रों को ठंडा करना:

      • ठंडी धाराएँ जिन क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं, वहाँ का तापमान कम कर देती हैं।
      • जैसे, कैलिफोर्निया तट पर ठंडी कैलिफोर्निया धारा के कारण मौसम ठंडा रहता है।
    2. वर्षा को रोकना और रेगिस्तान बनाना:

      • ठंडी धाराएँ वायुमंडल में नमी नहीं छोड़तीं, जिससे तटीय क्षेत्रों में वर्षा कम होती है।
      • उदाहरण: हम्बोल्ट धारा (Peru Current) के कारण अटाकामा रेगिस्तान बना है।
    3. समुद्री जीवों पर प्रभाव:

      • ठंडी धाराओं वाले क्षेत्रों में पोषक तत्व अधिक होते हैं, जिससे मछलियों की संख्या अधिक होती है।
      • जैसे, हम्बोल्ट धारा के कारण पेरू और चिली के तटों पर समृद्ध मत्स्य उद्योग है।

    3.4 महासागरीय धाराओं का आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व

    • जलवायु पर प्रभाव: गर्म और ठंडी धाराएँ पृथ्वी के ताप संतुलन को बनाए रखती हैं।
    • समुद्री परिवहन: समुद्री व्यापार में धाराओं का उपयोग जहाजों की गति बढ़ाने के लिए किया जाता है।
    • मत्स्य उद्योग: धाराएँ पोषक तत्वों को ऊपर लाती हैं, जिससे मछलियाँ अधिक पाई जाती हैं।
    • प्राकृतिक आपदाओं से संबंध: धाराओं का प्रभाव चक्रवातों, अल-नीनो और ला-नीना घटनाओं से जुड़ा होता है।

    गर्म और ठंडी महासागरीय धाराएँ पृथ्वी के जलवायु संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये न केवल तापमान और वर्षा को प्रभावित करती हैं, बल्कि वैश्विक मत्स्य पालन, परिवहन और प्राकृतिक आपदाओं में भी योगदान देती हैं।


    4. लहरें, ज्वार-भाटा, और सुनामी

    महासागर सतह पर लगातार गति में रहता है, और इसकी यह गतिशीलता कई भौतिक प्रक्रियाओं के कारण होती है। इन प्रक्रियाओं में प्रमुख हैं:

    1. लहरें (Waves) – पवन और अन्य बलों द्वारा उत्पन्न जल की गति।
    2. ज्वार-भाटा (Tides) – चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण जल स्तर का नियमित उत्थान और पतन।
    3. सुनामी (Tsunami) – भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट या भूस्खलन के कारण महासागर में उत्पन्न विशालकाय लहरें।

    4.1 लहरें (Waves)

    लहरें समुद्र की सतह पर होने वाली जल की गति हैं, जो हवा के प्रभाव से उत्पन्न होती हैं। यह ऊर्जा संचरण का एक माध्यम है, जिसमें जल कण केवल ऊर्ध्वाधर दिशा में गति करते हैं, लेकिन जल स्वयं आगे नहीं बढ़ता।

    (i) लहरों के निर्माण के कारण

    1. पवन (Wind): समुद्र की सतह पर बहने वाली हवा जल पर घर्षण उत्पन्न करती है, जिससे लहरें बनती हैं।
    2. भूकंप और ज्वालामुखी: समुद्र तल में आने वाले भूकंप और ज्वालामुखीय विस्फोट से लहरें उत्पन्न हो सकती हैं।
    3. महासागरीय धाराएँ और ज्वार-भाटा: महासागरीय धाराओं और ज्वार-भाटा के मिलने से भी लहरें उत्पन्न हो सकती हैं।
    4. चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्व: ज्वार के प्रभाव से महासागर में विशेष प्रकार की लहरें बनती हैं।

    (ii) लहरों के प्रमुख घटक

    1. तरंग शिखर (Crest): लहर का सर्वोच्च बिंदु।
    2. तरंग गर्त (Trough): लहर का सबसे निचला बिंदु।
    3. तरंग दैर्ध्य (Wavelength): एक तरंग शिखर से दूसरे तरंग शिखर के बीच की दूरी।
    4. तरंग ऊँचाई (Wave Height): तरंग शिखर और तरंग गर्त के बीच की ऊँचाई।
    5. तरंग आवधिकता (Wave Period): किसी निश्चित बिंदु से दो लगातार लहरों के गुजरने के बीच का समय।

    (iii) लहरों के प्रकार

    1. पवन जनित लहरें (Wind-generated Waves):
      • समुद्र की सतह पर हवा के प्रभाव से बनने वाली लहरें।
      • समुद्र में बहने वाली हवा जितनी अधिक तीव्र होगी, लहरें उतनी ही बड़ी होंगी।
    2. प्रवाहित लहरें (Swells):
      • ये बड़ी, लंबी और धीमी गति की लहरें होती हैं।
      • जब तूफान समाप्त हो जाता है, तब भी ये लहरें समुद्र में बनी रहती हैं।
    3. तूफानी लहरें (Storm Surges):
      • चक्रवात और तूफानों के कारण उत्पन्न लहरें, जो तटीय क्षेत्रों में बाढ़ ला सकती हैं।

    (iv) लहरों का प्रभाव

    • समुद्र तटों का अपरदन (Coastal Erosion)।
    • समुद्री परिवहन और मछली पकड़ने पर प्रभाव।
    • तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव।

    4.2 ज्वार-भाटा (Tides)

    ज्वार-भाटा समुद्र के जल स्तर में होने वाला नियमित उत्थान और पतन है, जो मुख्य रूप से चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होता है।

    (i) ज्वार-भाटा के निर्माण के कारण

    1. चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण (Lunar Gravity):
      • चंद्रमा का गुरुत्व समुद्र के जल को अपनी ओर आकर्षित करता है, जिससे ज्वार (High Tide) उत्पन्न होता है।
    2. सूर्य का गुरुत्वाकर्षण (Solar Gravity):
      • सूर्य भी जल पर आकर्षण बल डालता है, लेकिन इसका प्रभाव चंद्रमा से कम होता है।
    3. पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation):
      • पृथ्वी के घूमने के कारण ज्वार और भाटा नियमित अंतराल में आते हैं।

    (ii) ज्वार-भाटा के प्रकार

    1. उच्च ज्वार (High Tide): जब समुद्र का जल स्तर बढ़ता है।
    2. निम्न ज्वार (Low Tide): जब समुद्र का जल स्तर घटता है।
    3. स्प्रिंग टाइड (Spring Tide):
      • जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी एक सीधी रेखा में होते हैं, तब उच्चतम ज्वार आता है।
      • अमावस्या और पूर्णिमा के समय होता है।
    4. नीप टाइड (Neap Tide):
      • जब चंद्रमा और सूर्य समकोण पर होते हैं, तब न्यूनतम ज्वार आता है।
      • पहली और तीसरी तिमाही के चंद्रमा के समय होता है।

    (iii) ज्वार-भाटा का महत्व

    1. मत्स्य पालन: ज्वार के समय समुद्री जीव अधिक सक्रिय होते हैं, जिससे मछली पकड़ने में आसानी होती है।
    2. जल परिवहन: उच्च ज्वार के समय जहाजों को बंदरगाहों में प्रवेश और निकास में सुविधा होती है।
    3. पारिस्थितिकी पर प्रभाव: ज्वार-भाटा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है।
    4. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy): ज्वार-भाटा से नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है।

    4.3 सुनामी (Tsunami)

    सुनामी महासागर में उत्पन्न विशाल लहरों की एक श्रृंखला होती है, जो मुख्य रूप से समुद्र तल में भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, या भूस्खलन के कारण उत्पन्न होती है।

    (i) सुनामी के कारण

    1. समुद्री भूकंप (Submarine Earthquakes):
      • जब समुद्र तल में भूगर्भीय हलचल होती है, तो जल ऊपर उठता है और सुनामी उत्पन्न होती है।
    2. ज्वालामुखीय विस्फोट (Volcanic Eruption):
      • जब समुद्र के नीचे ज्वालामुखी फटता है, तो जल विस्थापित होता है और सुनामी उत्पन्न होती है।
    3. पानी के नीचे भूस्खलन (Underwater Landslides):
      • समुद्र तल में होने वाले भूस्खलन से जल में तीव्र गति से लहरें बनती हैं।

    (ii) सुनामी की विशेषताएँ

    • सामान्य लहरों की तुलना में सुनामी की तरंग दैर्ध्य बहुत अधिक होती है।
    • सुनामी की गति 700-900 किमी/घंटा तक हो सकती है।
    • उथले तटों पर आने के बाद इसकी ऊँचाई 30 मीटर या उससे अधिक हो सकती है।

    (iii) प्रमुख सुनामी घटनाएँ

    1. 2004 हिंद महासागर सुनामी:

      • 9.1 तीव्रता के भूकंप के कारण आई।
      • भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया और थाईलैंड में भारी तबाही।
    2. 2011 जापान सुनामी:

      • फुकुशिमा परमाणु संयंत्र को क्षति पहुँची।

    (iv) सुनामी से बचाव

    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Tsunami Warning System) का विकास।
    • तटीय क्षेत्रों में सुरक्षित बुनियादी ढाँचे का निर्माण।
    • सुनामी के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना।

    लहरें, ज्वार-भाटा और सुनामी महासागरीय गतिशीलता के महत्वपूर्ण घटक हैं। ये न केवल जलवायु और पर्यावरण को प्रभावित करते हैं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं।

    महासागर पृथ्वी के जलवायु तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। महासागरीय धाराएँ, लहरें और ज्वार-भाटा मौसम, जैव विविधता और मानवीय गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण महासागरों का तापमान और लवणता प्रभावित हो रही है, जिससे समुद्र स्तर में वृद्धि और तटीय क्षेत्रों पर खतरा बढ़ रहा है। इस प्रकार, महासागरों का अध्ययन पृथ्वी की जलवायु और पर्यावरणीय संतुलन को समझने के लिए आवश्यक है।