पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास – Origin & Evolution of Earth

पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास (Origin & Evolution of Earth)

पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास को समझना भूगोल और भूगर्भशास्त्र का एक महत्वपूर्ण विषय है। वैज्ञानिकों ने विभिन्न सिद्धांतों और प्रमाणों के आधार पर यह समझने का प्रयास किया है कि हमारी पृथ्वी कैसे बनी और किस प्रकार यह वर्तमान स्वरूप में विकसित हुई। इस अध्याय में, हम पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित प्रमुख सिद्धांतों, इसकी संरचना, विकास की प्रक्रियाओं, और भूगर्भीय कालक्रम का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

  • पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत: नेबुला परिकल्पना और आधुनिक सिद्धांत
  • भूवैज्ञानिक समय मापनी और पृथ्वी पर जीवन का विकास

1. पृथ्वी की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत

वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

1.1 प्राचीन धार्मिक और पौराणिक मान्यताएँ

विभिन्न सभ्यताओं में पृथ्वी की उत्पत्ति को लेकर धार्मिक और पौराणिक मान्यताएँ थीं। हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, यूनानी, और अन्य संस्कृतियों में सृष्टि के विभिन्न मिथक प्रचलित थे, लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इनके स्थान पर वैज्ञानिक व्याख्याएँ प्रदान की हैं।

1.2 बिग बैंग सिद्धांत (Big Bang Theory)

  • यह सिद्धांत आधुनिक खगोल विज्ञान में सर्वाधिक मान्य है।

  • लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले एक महा-विस्फोट (Big Bang) हुआ था, जिससे पूरे ब्रह्मांड का निर्माण हुआ।

  • इस घटना के बाद, ब्रह्मांड का विस्तार हुआ और विभिन्न आकाशगंगाएँ, तारे और ग्रह बने।

  • हमारी आकाशगंगा “मिल्की वे” और हमारा सौरमंडल इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

1.3 नीहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis)

  • यह सिद्धांत इम्मानुएल कांट और पियरे सायमन लाप्लास द्वारा दिया गया था।

  • इसके अनुसार, हमारा सौरमंडल एक विशाल गैस और धूल के बादल (नीहारिका) से बना।

  • इस नीहारिका के घूर्णन और संकुचन से सूर्य और ग्रहों का निर्माण हुआ।

1.4 प्लैनेटेसिमल थ्योरी (Planetesimal Theory)

  • चेम्बरलीन और मल्टन ने यह सिद्धांत दिया था।

  • उनके अनुसार, सौरमंडल का निर्माण तब हुआ जब एक अन्य तारा सूर्य के समीप से गुजरा और उसके गुरुत्वाकर्षण से सूर्य से कुछ पदार्थ अलग हो गया।

  • यह पदार्थ बाद में ठंडा होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।

1.5 गैसीय संकुचन सिद्धांत (Gaseous Contraction Theory)

  • यह जेम्स जीन और जेफ्रीज द्वारा प्रस्तावित सिद्धांत है।

  • इसके अनुसार, सूर्य के पास से एक बड़ा तारा गुजरने से उसकी गैसों का कुछ भाग अलग हो गया और ग्रह बने।


2. पृथ्वी की संरचना और भौगोलिक विशेषताएँ

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जाता है:

2.1 भूपर्पटी (Crust)

  • यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है और इसकी मोटाई 5 से 70 किलोमीटर तक हो सकती है।

  • इसमें मुख्यतः सिलिका (Si) और एल्युमिनियम (Al) होते हैं, जिसे SIAL (सियाल) कहा जाता है।

2.2 मेंटल (Mantle)

  • यह भूपर्पटी के नीचे स्थित परत है और लगभग 2900 किलोमीटर मोटी होती है।

  • इसमें मुख्यतः सिलिका (Si) और मैग्नीशियम (Mg) होते हैं, जिसे SIMA (सिमा) कहा जाता है।

  • यहाँ पर “कॉन्वेक्शन करंट” चलते हैं, जो टेक्टोनिक प्लेटों की गति को नियंत्रित करते हैं।

2.3 पृथ्वी का कोर (Core)

  • यह पृथ्वी का सबसे भीतरी भाग है और मुख्य रूप से लोहा (Fe) और निकेल (Ni) से बना है, जिसे NIFE (नाइफे) कहा जाता है।

  • इसे दो भागों में विभाजित किया गया है:

    1. बाहरी कोर (Outer Core) – यह तरल अवस्था में होती है।

    2. आंतरिक कोर (Inner Core) – यह ठोस अवस्था में होती है।


3. पृथ्वी के विकास की प्रक्रिया

पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद इसके विकास में कई भूगर्भीय और जलवायु संबंधी परिवर्तन हुए।

3.1 प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)

  • इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी की ऊपरी परत कई टेक्टोनिक प्लेटों में विभाजित है।

  • इन प्लेटों की गति के कारण महाद्वीपों का विचलन, भूकंप, ज्वालामुखी, पर्वत निर्माण आदि होते हैं।

3.2 महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (Continental Drift Theory)

  • अल्फ्रेड वेगेनर ने इस सिद्धांत को 1912 में प्रस्तुत किया।

  • उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर सभी महाद्वीप कभी एक “सुपरकॉन्टिनेंट” (Pangaea) का हिस्सा थे, जो बाद में अलग-अलग भागों में विभाजित हो गए।

3.3 समुद्री विस्तार सिद्धांत (Sea Floor Spreading Theory)

  • यह सिद्धांत बताता है कि महासागरीय तल में नई चट्टानों का निर्माण हो रहा है और पुरानी चट्टानें महासागरों के किनारों पर खिसक रही हैं।


4. भूगर्भीय समय-सीमा (Geological Time Scale)

पृथ्वी के इतिहास को भूगर्भीय युगों में विभाजित किया गया है:

  1. प्रोटेरोज़ोइक युग – सबसे पुराना युग, जब प्रारंभिक जीवन विकसित हुआ।

  2. पैलियोज़ोइक युग – जलीय जीवों और उभयचरों का युग।

  3. मेसोज़ोइक युग – डायनासोरों का युग।

  4. सीनोज़ोइक युग – स्तनधारियों और मानव जाति का विकास।

पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास अत्यंत जटिल प्रक्रियाएँ रही हैं, जिनमें खगोल विज्ञान, भूगर्भशास्त्र और भौतिकी का योगदान है। वैज्ञानिक सिद्धांतों के माध्यम से हमें इस प्रक्रिया को समझने में सहायता मिलती है, जिससे हम पृथ्वी के अतीत, वर्तमान, और भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाल सकते हैं।