परमार वंश प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण राजवंशों में से एक था, जिसने लगभग 9वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी ईस्वी तक मालवा और उसके आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया। इस वंश की राजधानी प्रारम्भ में उज्जैन थी, किंतु बाद में धार (धारानगरी) को मुख्य राजधानी बनाया गया। परमार वंश कला, साहित्य, स्थापत्य और सांस्कृतिक प्रगति के लिए प्रसिद्ध है। इस वंश का उदय प्रायः गुर्जर–प्रतिहारों के अधीन सामंतों के रूप में हुआ, किन्तु धीरे-धीरे इन्होंने स्वतंत्र शक्ति स्थापित की।
1. परमार वंश की उत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास
- परमार वंश का संबंध आग्नेय क्षत्रियों (अग्निकुल) से माना जाता है।
- एक परंपरा के अनुसार, परमार, चौहान, सोलंकी और प्रतिहार—ये चारों वंश “अग्निकुल क्षत्रिय” कहलाए, जिनका उद्भव आबू पर्वत पर हुआ।
- ऐतिहासिक रूप से यह वंश 9वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मालवा क्षेत्र में उभरा।
- प्रारंभ में ये प्रतिहारों के अधीन सामंत रहे।
2. प्रमुख शासक
(i) उपेंद्र (कृष्णराज) (9वीं शताब्दी)
- परमार वंश का संस्थापक माना जाता है।
- प्रतिहार शासकों का सामंत था।
(ii) वाकपति मुंज (974–995 ई.)
- सबसे प्रसिद्ध परमार शासक।
- “मुंजराज” या “वाकपति” के नाम से प्रसिद्ध।
- इन्होंने अनेक युद्ध लड़े और कन्नौज, गुर्जर-प्रतिहारों तथा चालुक्यों के विरुद्ध अपनी शक्ति दिखाई।
- कला एवं साहित्य का बड़ा संरक्षक, स्वयं भी कवि था।
- मुंज ने अनेक नगरों एवं मंदिरों का निर्माण कराया।
(iii) भोजराज (1010–1055 ई.)
- परमार वंश का सबसे महान और प्रसिद्ध शासक।
- भोज के समय परमार साम्राज्य की राजधानी धार (धारानगरी) थी।
- भोज का राज्य उत्तर में चंबल से लेकर दक्षिण में गोदावरी तक, और पश्चिम में साबरमती से लेकर पूर्व में विदिशा तक फैला हुआ था।
- भोज एक महान विद्वान, साहित्यकार और कला-संरक्षक था।
- उसे “परमार भोज” के नाम से भी जाना जाता है।
- भोज ने ‘सरस्वतीकंठाभरण’, ‘राजमार्तंड’, ‘समरांगणसूत्रधार’ (स्थापत्य और शिल्प पर ग्रंथ), तथा आयुर्वेद, खगोल और साहित्य पर अनेक ग्रंथ लिखे।
- उसने ‘भोजशाला’ नामक शिक्षा–केंद्र की स्थापना की।
(iv) उदयादित्य (1059–1080 ई.)
- भोज के बाद राज्य को स्थिरता प्रदान की।
- विदिशा में उदयेश्वर मंदिर (शिव मंदिर) का निर्माण कराया।
(v) नरवर्मन और यशोवर्मन (11वीं–12वीं शताब्दी)
- इन शासकों के काल में परमार साम्राज्य की शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगी।
- चालुक्य, चालुक्य–होयसाल और चालुक्य–सोलंकी वंशियों के साथ निरंतर संघर्ष हुआ।
(vi) महलक्ष्मीदेव और महादेव (12वीं–13वीं शताब्दी)
- इस समय परमार राज्य धीरे-धीरे कमजोर हुआ।
- दिल्ली के सुल्तानों (खिलजी वंश) की शक्ति बढ़ने से परमारों का प्रभाव घट गया।
(vii) महलक देव (14वीं शताब्दी)
- परमार वंश का अंतिम शासक माना जाता है।
- 1305 ई. में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐनुलमुल्क ने उसे पराजित कर परमार वंश का अंत कर दिया।
3. परमार वंश का प्रशासन और शासन
- परमार शासक स्वयं को “मालवाधिपति” और “धारानरेश” कहते थे।
- शासन में सामंतों और feudatories का प्रभाव था।
- प्रांतों और नगरों का प्रशासन स्थानीय शासकों एवं अधिकारियों द्वारा किया जाता था।
- भोज के समय विद्वानों और कवियों को दरबार में विशेष स्थान प्राप्त था।
4. साहित्य और संस्कृति
- परमार वंश विशेष रूप से साहित्य और विद्या के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।
- राजा भोज स्वयं संस्कृत का महान विद्वान था।
- भोजशाला में कवियों, विद्वानों और कलाकारों को संरक्षण मिला।
- भोज ने विज्ञान, स्थापत्य, साहित्य, राजनीति और कला पर कई ग्रंथ लिखे।
- “समरांगणसूत्रधार” स्थापत्यशास्त्र का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
5. कला और स्थापत्य
- परमारों के काल में मालवा क्षेत्र में मंदिर निर्माण की विशेष शैली विकसित हुई।
- परमार शैली की विशेषताएँ:
- मंदिरों में ऊँचे शिखर और अलंकृत गर्भगृह।
- गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणापथ।
- मंडप एवं तोरण का विशेष प्रयोग।
- स्तंभों पर गहन नक्काशी और शिल्पकला।
प्रमुख स्थापत्य उदाहरण:
- भोजपुर (भोपाल के पास) का अधूरा शिवमंदिर (भोजेश्वर मंदिर)।
- धार की भोजशाला।
- विदिशा का उदयेश्वर मंदिर।
- मंडू और उज्जैन के कई मंदिर एवं जलसंरचनाएँ।
6. परमार वंश का पतन
- भोज की मृत्यु के बाद परमार शक्ति तेजी से कमजोर हुई।
- चालुक्य, सोलंकी और अन्य पड़ोसी वंशों ने उन पर आक्रमण किए।
- अंततः 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने परमार वंश को समाप्त कर दिया।
परमार वंश मालवा की राजनीति, संस्कृति और कला में अत्यंत महत्वपूर्ण था। विशेषकर राजा भोज का काल इस वंश का स्वर्णयुग माना जाता है। परमार शासकों ने न केवल विशाल साम्राज्य स्थापित किया बल्कि साहित्य, विज्ञान, स्थापत्य और शिल्पकला में भी गहरा योगदान दिया। “भोजशाला” और भोज द्वारा रचित ग्रंथ भारतीय इतिहास में ज्ञान और संस्कृति के उच्च शिखर के प्रतीक हैं।
परमार वंश की कला और स्थापत्य
परमार वंश (9वीं–14वीं शताब्दी) का उदय मालवा क्षेत्र (धार, उज्जैन, मांडव आदि) में हुआ। इस वंश के राजाओं ने न केवल राजनीति और युद्ध में अपनी छाप छोड़ी, बल्कि कला, साहित्य और स्थापत्य में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। परमारों की राजधानी धारानगर (धार) और बाद में मांडव कला एवं संस्कृति के प्रमुख केंद्र बने।
1. परमारों का कला–संरक्षण
- परमार शासक कला और साहित्य के महान संरक्षक थे।
- राजा वाकपति मुंज और भोजराज (1010–1055 ई.) विशेष रूप से कला व स्थापत्य के संरक्षक माने जाते हैं।
- भोजराज स्वयं बड़े विद्वान और काव्य-शास्त्र के पारखी थे। उनके समय में परमार कला अपने शिखर पर पहुँची।
- परमारों के संरक्षण में मालवा शैली की कला का विकास हुआ, जो उत्तर भारतीय नागर शैली का ही परिष्कृत रूप थी।
2. परमार वंश की स्थापत्य विशेषताएँ
परमारों की स्थापत्य शैली में विशिष्ट विशेषताएँ दिखाई देती हैं –
- नागर शैली का प्रभाव
- परमारों के मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली पर आधारित थे।
- इनके शिखर ऊँचे और वक्राकार (curvilinear) होते थे।
- मालवा शैली
- परमार काल में मंदिर निर्माण की एक विशिष्ट शैली विकसित हुई, जिसे मालवा शैली कहते हैं।
- इसमें पत्थर की नक्काशी, जटिल जालियाँ और मंडप की योजना खास होती थी।
- मंदिर योजना
- मंदिर चतुर्भुजाकार आधार पर बनाए जाते थे।
- गर्भगृह, अंतराल, मंडप और सभामंडप प्रमुख अंग होते थे।
- मंडपों की छतें गुम्बदाकार दिखाई देती थीं।
- शिल्प और मूर्तिकला
- मूर्तियों में गहरी नक्काशी और बारीक अलंकरण की प्रवृत्ति दिखती है।
- देवी–देवताओं की प्रतिमाएँ शास्त्रीय लक्षणों के साथ बनाई जाती थीं।
- पौराणिक कथाओं, देवियों, गंधर्वों और यक्ष–यक्षिणियों की मूर्तियाँ भी मिलती हैं।
3. प्रमुख स्थापत्य और स्मारक
- भोजशाला (धार)
- राजा भोज द्वारा निर्मित यह संस्थान मंदिर और पाठशाला दोनों का कार्य करता था।
- यहाँ सरस्वती देवी का मंदिर था।
- भोजशाला में विद्या, कला और साहित्य का अद्भुत संगम हुआ।
- भीमबेटका गुफाएँ (संरक्षण)
- परमार काल में पूर्व–ऐतिहासिक गुफाओं का संरक्षण हुआ और कई स्थानों पर मंदिर बने।
- धार और मांडव के किले
- परमारों ने अपनी राजधानी को सुदृढ़ किलों से सुरक्षित किया।
- मांडव किले का विस्तार भी परमार काल में हुआ।
- भोजपुर का शिव मंदिर (भोजेश्वर मंदिर)
- परमार कला का सबसे भव्य उदाहरण।
- राजा भोज द्वारा भोजपुर में निर्मित यह अधूरा शिव मंदिर स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है।
- इसमें विश्व के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक (लगभग 18 फीट ऊँचा) स्थापित है।
- मंदिर का शिखर अधूरा रह गया, पर इसकी योजना और भव्यता अद्वितीय है।
- इसे “उत्तर भारत का खजुराहो” भी कहा जाता है।
- जैन मंदिर
- परमारों ने जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी अनेक मंदिर बनवाए।
- इनकी नक्काशी और मूर्तिकला अत्यंत सुंदर थी।
4. साहित्य और कला का संगम
- परमार कला केवल स्थापत्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि साहित्य और विज्ञान में भी उच्च स्तर प्राप्त हुआ।
- राजा भोज द्वारा “समरांगण सूत्रधार” नामक ग्रंथ लिखा गया, जो स्थापत्य और मूर्तिकला पर आधारित है।
- इस ग्रंथ में मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और यंत्रों (जैसे यंत्रचलित विमान और यंत्रमानव) के निर्माण का वर्णन है।
5. परमार कला की विशेषताएँ (संक्षेप में)
- नागर शैली पर आधारित मालवा शैली।
- ऊँचे और वक्राकार शिखर।
- मंडपों की गुम्बदाकार छतें।
- बारीक पत्थर की नक्काशी।
- विशाल मंदिर निर्माण की परंपरा (भोजेश्वर मंदिर)।
- साहित्य और स्थापत्य का अद्भुत संगम।
परमार वंश की कला और स्थापत्य ने मध्य भारत की सांस्कृतिक धारा को समृद्ध किया। राजा भोज के संरक्षण में यह शैली अपने उत्कर्ष पर पहुँची। भोजेश्वर मंदिर और भोजशाला परमार स्थापत्य के अद्वितीय उदाहरण हैं। इनकी कला में भव्यता, सूक्ष्मता और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम दिखाई देता है, जो मध्यकालीन भारतीय संस्कृति की महानता का प्रतीक है।
परमार वंश (Parmar Dynasty) FAQs
Q1. परमार वंश की स्थापना किसने की थी?
परमार वंश की स्थापना उपह्राज (Upendra / Krishnaraja) ने 9वीं शताब्दी के आरंभ में की थी।
Q2. परमार वंश की राजधानी कहाँ थी?
परमार वंश की राजधानी धार (मध्यप्रदेश) थी।
Q3. परमार वंश का सबसे महान शासक कौन था?
👉 परमार वंश का सबसे महान शासक महाराजा भोज (1010–1055 ई.) था, जो अपनी विद्वता और कला–संरक्षण के लिए प्रसिद्ध था।
Q4. राजा भोज किस वंश से संबंधित थे?
राजा भोज परमार वंश से संबंधित थे।
Q5. परमार वंश के संस्थापक उपेन्द्र/कृष्णराज के बाद कौन शासक बना?
उपेन्द्र/कृष्णराज के बाद उनके उत्तराधिकारी वाक्पति मुंजराज (Munja / Vakpati II) शासक बने।
Q6. परमार वंश का पतन कब और कैसे हुआ?
परमार वंश का पतन 14वीं शताब्दी में हुआ, जब दिल्ली सल्तनत और मालवा के सुल्तानों ने इनके राज्य पर अधिकार कर लिया।
Q7. राजा भोज ने किस प्रकार के ग्रंथों की रचना की?
राजा भोज ने साहित्य, ज्योतिष, आयुर्वेद, राजनीति और स्थापत्य पर अनेक ग्रंथों की रचना की। इनमें से समरांगण सूत्रधार (वास्तुकला पर) सबसे प्रसिद्ध है।
Q8. परमार वंश का सबसे अंतिम शासक कौन था?
परमार वंश का अंतिम प्रमुख शासक महेंद्रपाल था, जिसके बाद वंश का धीरे–धीरे पतन हो गया।
Q9. परमार वंश का इतिहास प्रतियोगी परीक्षाओं में क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि परमार वंश मध्य भारत की राजनीति, साहित्य, कला, स्थापत्य और संस्कृति में अत्यधिक योगदान देने वाला वंश था, विशेषकर राजा भोज के काल में।
Q10. परमार वंश को और किस नाम से जाना जाता है?
परमार वंश को पवार वंश (Pawar Dynasty) के नाम से भी जाना जाता है।