जनसंख्या और पर्यावरण (Population and Environment)

जनसंख्या और पर्यावरण (Population and Environment)

  • जनसंख्या वृद्धि और उसके पर्यावरणीय प्रभाव
  • जनसंख्या और संसाधनों का संतुलन
  • पर्यावरणीय दबाव और जनसंख्या नियंत्रण

1. जनसंख्या वृद्धि और उसके पर्यावरणीय प्रभाव

जनसंख्या वृद्धि सीधे प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण पर प्रभाव डालती है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, संसाधनों की माँग भी बढ़ती जाती है, जिससे पर्यावरण पर दबाव बढ़ता है।

(i) प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन

  • जल संकट: पीने और सिंचाई के लिए जल की माँग बढ़ने से भूजल स्तर गिरता है।
  • वन कटाई: कृषि, उद्योग और आवासीय जरूरतों के लिए जंगलों की कटाई होती है।
  • खनिज संसाधनों का क्षय: कोयला, पेट्रोलियम, और धातुओं का अधिक दोहन पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है।

(ii) प्रदूषण में वृद्धि

  • वायु प्रदूषण: बढ़ते वाहन, कारखाने और ऊर्जा उत्पादन वायु गुणवत्ता को खराब करते हैं।
  • जल प्रदूषण: औद्योगिक और घरेलू कचरे से नदियाँ और झीलें दूषित हो जाती हैं।
  • मृदा प्रदूषण: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग से भूमि की उर्वरता घटती है।

(iii) जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव

  • ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है।
  • जंगलों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन जलवायु असंतुलन पैदा करते हैं।

(iv) जैव विविधता पर प्रभाव

  • जनसंख्या वृद्धि के कारण जंगलों की कटाई से वन्यजीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं
  • समुद्री प्रदूषण के कारण जलीय जीवों पर संकट बढ़ रहा है।

2. जनसंख्या और संसाधनों का संतुलन

(i) सतत संसाधन प्रबंधन

  • जल संरक्षण: वर्षा जल संचयन, बूंद सिंचाई जैसी तकनीकों का उपयोग।
  • वनों की रक्षा: वनीकरण, वन्यजीव संरक्षण योजनाएँ लागू करना।
  • ऊर्जा का सतत उपयोग: नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन) को बढ़ावा देना।

(ii) टिकाऊ कृषि

  • जैविक खेती और पारंपरिक कृषि तकनीकों का उपयोग।
  • रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का नियंत्रित प्रयोग।

(iii) अपशिष्ट प्रबंधन

  • कचरे का पुनर्चक्रण और अपशिष्ट पृथक्करण को अपनाना।
  • प्लास्टिक मुक्त नीति को प्रोत्साहित करना।

3. पर्यावरणीय दबाव और जनसंख्या नियंत्रण

3.1 पर्यावरणीय दबाव (Environmental Pressure)

पर्यावरणीय दबाव का तात्पर्य उन नकारात्मक प्रभावों से है, जो बढ़ती जनसंख्या और मानवीय गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों एवं पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ते हैं। यह विभिन्न रूपों में प्रकट होता है, जैसे कि वायु प्रदूषण, जल संकट, जैव विविधता का ह्रास, भूमि क्षरण, और जलवायु परिवर्तन

(i) पर्यावरणीय दबाव के प्रमुख कारण

  1. जनसंख्या वृद्धि: अधिक जनसंख्या का अर्थ है संसाधनों की अधिक मांग, जिससे भूमि, जल, वायु आदि पर दबाव बढ़ता है।
  2. शहरीकरण: शहरों का विस्तार कृषि भूमि और वन क्षेत्र को नष्ट कर देता है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है।
  3. उद्योगीकरण: औद्योगिक उत्पादन से वायु, जल, और मृदा प्रदूषण बढ़ता है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
  4. वृक्षों की अंधाधुंध कटाई: लकड़ी, कृषि, और निर्माण कार्यों के लिए वनों की कटाई से जैव विविधता का संकट उत्पन्न होता है।
  5. ऊर्जा संसाधनों का अति दोहन: कोयला, पेट्रोलियम, और गैस जैसे ऊर्जा स्रोतों का अत्यधिक उपयोग ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ाकर ग्लोबल वार्मिंग को तेज करता है।
  6. कृषि विस्तार और रासायनिक उपयोग: कृषि भूमि बढ़ाने के लिए जंगलों को काटा जाता है, और कीटनाशकों तथा उर्वरकों के अधिक उपयोग से मृदा प्रदूषण और जल स्रोतों का क्षरण होता है।
  7. अपशिष्ट उत्पादन और प्लास्टिक प्रदूषण: बढ़ता कचरा, विशेषकर प्लास्टिक और ई-कचरा, जल स्रोतों और भूमि को दूषित करता है।

(ii) पर्यावरणीय दबाव के प्रमुख प्रभाव

  1. जलवायु परिवर्तन: अत्यधिक प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग, मौसम परिवर्तन, समुद्र स्तर में वृद्धि, और सूखा-बाढ़ जैसी आपदाएँ बढ़ रही हैं।
  2. जल संकट: भूजल स्तर गिर रहा है और पीने योग्य जल की उपलब्धता में कमी आ रही है।
  3. जैव विविधता की हानि: वनों की कटाई और प्रदूषण के कारण कई प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं।
  4. भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण: अत्यधिक खेती, वनों की कटाई और उद्योगों के कारण उपजाऊ मिट्टी नष्ट हो रही है।
  5. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव: बढ़ता प्रदूषण स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों जैसे अस्थमा, हृदय रोग और कैंसर को जन्म दे रहा है।

3.2 जनसंख्या नियंत्रण (Population Control)

जनसंख्या नियंत्रण का उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि दर को सीमित कर पर्यावरणीय दबाव को कम करना है। इसके लिए सरकारें विभिन्न योजनाएँ और नीतियाँ अपनाती हैं।

(i) जनसंख्या नियंत्रण के उपाय

  1. परिवार नियोजन (Family Planning):

    • गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग
    • नसबंदी और अन्य स्थायी उपाय
    • विवाह की न्यूनतम आयु को बढ़ावा देना
  2. शिक्षा और जागरूकता:

    • महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना, क्योंकि शिक्षित महिलाएँ छोटे परिवार की योजना बनाती हैं।
    • परिवार नियोजन और स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करना।
  3. सरकारी नीतियाँ और कार्यक्रम:

    • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (2000) में जनसंख्या स्थिरीकरण पर बल दिया गया।
    • “हम दो, हमारे दो” जैसे अभियान जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देते हैं।
  4. स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता:

    • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रसूति और नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारना।
    • गर्भनिरोधक साधनों की नि:शुल्क उपलब्धता।
  5. आर्थिक प्रोत्साहन और कानून:

    • छोटे परिवार रखने वाले लोगों को आर्थिक लाभ देना।
    • कुछ राज्यों में दो से अधिक बच्चों वाले अभिभावकों को सरकारी योजनाओं में प्रतिबंधित करना।
  6. रोजगार और महिला सशक्तिकरण:

    • महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर जल्दी विवाह और अधिक बच्चों की प्रवृत्ति को कम करना।
    • रोजगार के अवसरों में वृद्धि कर श्रम शक्ति को बढ़ावा देना, जिससे जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आती है।

पर्यावरणीय दबाव और जनसंख्या वृद्धि एक-दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। यदि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जाए, तो संसाधनों पर दबाव कम होगा, जिससे वनों, जल स्रोतों, जैव विविधता और वायुमंडल को संरक्षित किया जा सकेगा। सतत विकास के लिए पर्यावरण-संवेदनशील नीतियों, जनसंख्या नियंत्रण उपायों, और संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है।