मृदा और कृषि (Soil and Agriculture of India)

मृदा और कृषि (Soil and Agriculture of India)

भारत कृषि प्रधान देश है, जहाँ मृदा और जलवायु की विविधता के कारण अनेक प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। मृदा (Soil) कृषि के लिए आधारभूत संसाधन है, और इसकी गुणवत्ता से ही फसल उत्पादन प्रभावित होता है। इस अध्याय में हम भारत की प्रमुख मृदाओं, उनके संरक्षण, कृषि प्रणाली, तथा हरित क्रांति के प्रभाव का अध्ययन करेंगे।

  • मृदा प्रकार: जलोढ़, काली, लाल, लैटेराइट, मरुस्थलीय, पर्वतीय मृदा
  • मृदा अपरदन और संरक्षण उपाय
  • भारत में कृषि: खाद्यान्न, नकदी फसलें, और कृषि पद्धतियाँ
  • हरित क्रांति और कृषि में प्रौद्योगिकी का उपयोग

1. मृदा प्रकार (Types of Soil in India)

भारत में जलवायु, भूगर्भीय संरचना, और अपक्षय की प्रक्रियाओं के आधार पर विभिन्न प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार भारत में निम्नलिखित प्रमुख मृदा प्रकार पाए जाते हैं:

(i) जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)

  • उत्पत्ति: नदियों द्वारा लाई गई गाद से बनी।
  • क्षेत्र: उत्तर भारत का गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान, राजस्थान के कुछ भाग, और दक्षिण भारत की तटीय पट्टियाँ।
  • विशेषताएँ:
    • यह उपजाऊ होती है और इसमें जलधारण क्षमता अधिक होती है।
    • इसमें पोटाश, फॉस्फोरस, और चूना पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
  • फसलें: गेहूँ, धान, गन्ना, दलहन, तिलहन।

(ii) काली मृदा (Black Soil or Regur Soil)

  • उत्पत्ति: ज्वालामुखीय चट्टानों के विघटन से बनी।
  • क्षेत्र: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, और तमिलनाडु।
  • विशेषताएँ:
    • इसमें उच्च जलधारण क्षमता होती है।
    • यह गहरी और उपजाऊ होती है, लेकिन शुष्क मौसम में यह दरारें डालती है।
  • फसलें: कपास, ज्वार, दालें, तिलहन।

(iii) लाल मृदा (Red Soil)

  • उत्पत्ति: आयरन ऑक्साइड की अधिकता के कारण लाल रंग।
  • क्षेत्र: उड़ीसा, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, झारखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक।
  • विशेषताएँ:
    • इसमें लोहा और एल्यूमिनियम की अधिकता होती है।
    • कम उर्वरता होने के कारण अधिक खाद और उर्वरकों की आवश्यकता होती है।
  • फसलें: मूँगफली, बाजरा, कपास, दलहन।

(iv) लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)

  • उत्पत्ति: उष्णकटिबंधीय जलवायु में तीव्र अपक्षय के कारण बनी।
  • क्षेत्र: पश्चिमी घाट, असम, मेघालय, ओडिशा, केरल।
  • विशेषताएँ:
    • इसमें लौह और ऐल्यूमिनियम की अधिकता होती है।
    • जैविक पदार्थों की कमी के कारण कम उपजाऊ।
  • फसलें: कॉफी, चाय, मसाले।

(v) मरुस्थलीय मृदा (Desert Soil)

  • उत्पत्ति: शुष्क जलवायु में रेत और बालू से बनी।
  • क्षेत्र: राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा।
  • विशेषताएँ:
    • इसमें लवण की अधिकता होती है और जल की कमी रहती है।
    • सिंचाई की सहायता से इसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
  • फसलें: बाजरा, ज्वार, तिलहन।

(vi) पर्वतीय मृदा (Mountain Soil)

  • उत्पत्ति: पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम और अपक्षय की क्रिया से बनी।
  • क्षेत्र: हिमालय, उत्तर-पूर्वी राज्य।
  • विशेषताएँ:
    • यह अम्लीय होती है और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर होती है।
  • फसलें: चाय, कॉफी, मसाले, फलों की खेती।

2. मृदा अपरदन और संरक्षण उपाय (Soil Erosion and Conservation Measures)

(i) मृदा अपरदन के कारण (Causes of Soil Erosion)

  1. पवन अपरदन – तेज हवाओं द्वारा रेतीली मिट्टी का उड़ जाना।
  2. जल अपरदन – वर्षा और बाढ़ से मृदा का बह जाना।
  3. वनों की कटाई – जड़ों के अभाव में मिट्टी ढीली होकर बह जाती है।
  4. अतिचारण (Overgrazing) – घास के अत्यधिक चरने से मिट्टी की उर्वरता घटती है।

(ii) मृदा संरक्षण के उपाय (Soil Conservation Measures)

  1. वृक्षारोपण (Afforestation) – वृक्षों की जड़ें मिट्टी को पकड़कर अपरदन रोकती हैं।
  2. सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) – पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए अपनाई जाती है।
  3. कंटूर जुताई (Contour Ploughing) – ढलान पर जुताई कर मिट्टी का बहाव रोकना।
  4. नदी तटबंध निर्माण – बाढ़ से बचाव के लिए नदियों पर तटबंध बनाना।

3. भारत में कृषि (Agriculture in India)

भारत में कृषि मुख्यतः खाद्यान्न फसलें, नकदी फसलें, और कृषि पद्धतियों पर आधारित है।

(i) खाद्यान्न फसलें (Food Crops)

  1. धान (Rice) – पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश।
  2. गेहूँ (Wheat) – पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश।
  3. मक्का (Maize) – कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार।
  4. दालें (Pulses) – मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश।

(ii) नकदी फसलें (Cash Crops)

  1. कपास (Cotton) – महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक।
  2. गन्ना (Sugarcane) – उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक।
  3. चाय (Tea) – असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु।
  4. कॉफी (Coffee) – कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु।

(iii) कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Practices)

  1. परंपरागत कृषि (Traditional Farming) – वर्षा आधारित, कम उर्वरकों का उपयोग।
  2. आधुनिक कृषि (Modern Farming) – उन्नत बीज, कीटनाशकों और उर्वरकों का उपयोग।
  3. सेंद्रिय कृषि (Organic Farming) – रासायनिक उर्वरकों के बिना, जैविक खादों का उपयोग।

4. हरित क्रांति और कृषि में प्रौद्योगिकी का उपयोग (Green Revolution and Use of Technology in Agriculture)

(i) हरित क्रांति (Green Revolution)

  • 1960 के दशक में भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत हुई।
  • प्रमुख तत्व:
    • उच्च उत्पादकता वाले बीजों (HYV Seeds) का प्रयोग।
    • रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग।
    • सिंचाई सुविधाओं का विस्तार।
  • प्रभाव: खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि, लेकिन मृदा उर्वरता में कमी और जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन।

(ii) कृषि में आधुनिक प्रौद्योगिकी

  1. ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) – पानी की बचत।
  2. जैविक खेती (Organic Farming) – पर्यावरण अनुकूल खेती।
  3. डिजिटल कृषि (Digital Agriculture) – सेंसर और ड्रोन तकनीक का उपयोग।

भारत की कृषि मृदा और जलवायु पर निर्भर करती है। मृदा संरक्षण के उपाय अपनाने से कृषि की स्थिरता बनी रह सकती है। हरित क्रांति और आधुनिक प्रौद्योगिकी से कृषि उत्पादन बढ़ा है, लेकिन पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।