वाकाटक साम्राज्य (Vakataka dynasty) का उदय एवं विस्तार (c. 250–c. 510 CE)
वाकाटक कौन थे?
वाकाटक दक्षिण-मध्य भारत (विशेषतः विदर्भ/महाराष्ट्र, उत्तर तेलंगाना, उत्तरी कर्नाटक, पूर्वी मध्य प्रदेश) में सतवाहनों के उत्तराधिकारी रूप में उभरे और उत्तर भारत के गुप्त साम्राज्य के समकालीन रहे। राजनीतिक दृष्टि से इन्होंने दक्कन में स्थायित्व, उत्तर से दक्षिण तक वैवाहिक व कूटनीतिक गठबंधनों और सांस्कृतिक संरक्षण (विशेषतः अजंता) के सहारे एक प्रभावशाली शक्ति का रूप लिया। इनके दो प्रमुख राजवंशी शाखाएँ थीं—
- प्रवरपुर–नन्दिवर्धन शाखा (विदर्भ केन्द्रित)
- वत्सगुल्म शाखा (आज का वाशीम क्षेत्र)।
1) उदय: संस्थापक से सम्राट तक
(A) संस्थापक: विंध्यशक्ति (c. 250–270 CE)
परम्परा व पुराण-साक्ष्यों में विंध्यशक्ति को वाकाटक वंश का संस्थापक कहा गया है। उपलब्ध शिलालेखों में उनका संक्षिप्त उल्लेख मिलता है, पर इतना स्पष्ट है कि उन्हीं ने विदर्भ में वंश की बुनियाद रखी और सीमित परंतु सुदृढ़ प्रभुत्व स्थापित किया।
(B) विस्तार का असली प्रारम्भ: प्रवरसेन I (c. 270–330 CE)
विंध्यशक्ति के उत्तराधिकारी प्रवरसेन I ने वास्तविक विस्तार किया—विदर्भ से आगे बरार, बरार से दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व की ओर। उन्होंने वैदिक अश्वमेध आदि यज्ञ कराकर सार्वभौम सत्ता का दावा किया और स्वयं को ‘सम्राट’ के रूप में प्रक्षेपित किया। इनके काल में वाकाटक शक्ति एक क्षेत्रीय सरदार से उदीयमान साम्राज्य में बदल गई।
प्रवरसेन I के पुत्रों के बीच प्रांतीय व्यवस्था ने आगे चलकर शाखा-विभाजन का रूप लिया, जिससे दो प्रमुख रेखाएँ उभरती हैं—प्रवरपुर–नन्दिवर्धन और वत्सगुल्म।
2) शाखा-विभाजन और उसके राजनीतिक निहितार्थ
(A) प्रवरपुर–नन्दिवर्धन (विदर्भ) शाखा
नन्दिवर्धन (आधुनिक नागर्दन/रामटेक के पास) प्रारम्भिक राजधानी रही। क्रम से रुद्रसेन I → पृथ्वीसेन I → रुद्रसेन II (इन्हीं की शादी गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावतीगुप्ता से हुई) आते हैं। रुद्रसेन II के अकाल निधन (c. 385 CE) के बाद प्रभावतीगुप्ता ने c. 390–410 CE तक राज्य-प्रतिनिधि (Regent) के रूप में शासन सम्भाला—यह दक्कन राजनीति में गुप्त-प्रभाव और ब्राह्मणधर्म के सुदृढ़ीकरण का निर्णायक मोड़ था।
इसके बाद प्रवरसेन II (दमोदरसेन) का शासन आया। उन्होंने राजधानी नन्दिवर्धन से नये नगर ‘प्रवरपुर’ (आधुनिक पौनार–वर्धा क्षेत्र) में स्थानान्तरित की; साहित्यिक रूप से भी वे महत्त्वपूर्ण हैं (प्राकृत ‘सेतुबन्ध’ परम्परा उनसे जोड़ी जाती है)। उनके बाद नरेन्द्रसेन और पृथ्वीसेन II के समय में पूर्वोत्तर (मेघला–अमरकंटक/महाकान्तक), बघेलखण्ड और गोंडवाना तक वाकाटक प्रभाव के प्रमाण मिलते हैं।
(B) वत्सगुल्म (वाशीम) शाखा
दूसरी शाखा के संस्थापक सर्वसेन माने जाते हैं; आगे विन्ध्यसेन और फिर हरिषेण आते हैं। हरिषेण (c. 475–c. 500 CE) के समय वत्सगुल्म शाखा ने पश्चिम महाराष्ट्र, विदर्भ, उत्तरी-मराठवाड़ा और नर्मदा-दक्षिण क्षेत्रों तक प्रभाव फैलाया। अजंता गुफाओं (उत्तर चरण) का संरक्षण इसी शाखा ने किया—यह दक्कन-बौद्ध कला की चरम उपलब्धि है और वाकाटक सांस्कृतिक संरक्षण की ‘हस्ताक्षर उपलब्धि’ मानी जाती है।
3) विस्तार की रणनीति: युद्ध, वैवाहिक गठबंधन और आश्रय
- वैवाहिक कूटनीति: रुद्रसेन II–प्रभावतीगुप्ता विवाह ने उत्तर की गुप्त शक्ति से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाए। इससे वाकाटक दरबार में संस्कृत, वैष्णव-आचार और गुप्त मुद्रात्मक/प्रशस्ति परम्परा का प्रवेश और वैधता-संवर्द्धन हुआ।
- प्रांतीय–फ्यूडल मॉडल: प्रवरसेन I के बाद पुत्रों/उप-राजाओं को प्रान्त देकर शाखाएँ विकसित करना—इससे सीमाविस्तार लचीले अधीनस्थों के माध्यम से हुआ, पर दीर्घकाल में यही मॉडल केन्द्र-विकेन्द्र में बदल गया।
- सांस्कृतिक वैधता: वैदिक यज्ञ, ब्राह्मणों को भूमि-दान (ताम्रपत्र अनुदान), तथा बौद्ध विहारों/गुफा-वास्तु (अजंता) का संरक्षण—इनके सहारे राजनीतिक प्रभुत्व को धार्मिक–सांस्कृतिक स्वीकृति मिली।
4) भू-राजनीतिक फैलाव (समय के साथ)
- प्रारम्भ (c. 250–300): विदर्भ केन्द्र; सतवाहनोत्तर शक्ति–रिक्ति में उदय।
- प्रवरसेन I (c. 270–330): विदर्भ से बरार/नर्मदा-दक्षिण तक; ‘सम्राट’ की छवि; वैदिक यज्ञ–प्रतिष्ठा।
- रुद्रसेन I–पृथ्वीसेन I (c. 330–380): विदर्भ-केन्द्र का सुदृढ़ीकरण; पश्चिम-दक्षिण सीमाओं पर दबाव।
- रुद्रसेन II–प्रभावतीगुप्ता (c. 380–410): गुप्त-संबन्ध; प्रशासन में संस्कृत–वैष्णव प्रभाव; स्थिरता।
- प्रवरसेन II (c. 420–455): राजधानी प्रवरपुर, सांस्कृतिक उत्कर्ष; विदर्भ से उत्तर-पूर्व (मेघला/अमरकंटक) तक पहुँच।
- हरिषेण (c. 475–500): वत्सगुल्म शाखा का उत्कर्ष; अजंता का उत्तर चरण; पश्चिम-महाराष्ट्र/कोंकण तक प्रभाव।
पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक वाकाटक प्रभाव अपने अधिकतम आयाम पर था; इसके तुरन्त बाद, दक्कन की अन्य उभरती शक्तियों (नल, कालाचारी–महेष्वर, आदि) और आन्तरिक शाखा-विभाजन के कारण केन्द्रित शक्ति शिथिल हुई।
5) राजधानी व केन्द्रीय स्थल
- नन्दिवर्धन (आधुनिक नागर्दन/रामटेक, नागपुर ज़िला): प्रारम्भिक प्रशासनिक–राजनीतिक केन्द्र।
- प्रवरपुर (आधुनिक पौनार, वर्धा): प्रवरसेन II द्वारा बसाया गया नया शाही नगर; यहीं से बाद के अनेक ताम्रपत्र जारी हुए।
- वत्सगुल्म (आज का वाशीम): पश्चिमी शाखा की राजधानी; अजंता–वर्धा–गोदावरी गलियारे पर नियन्त्रण।
6) विस्तार के उपादान (Key Drivers)
- सामरिक भूगोल: सतपुड़ा–विदर्भ का पठारी भू-भाग, वर्धा–वैंगंगा–पैनगंगा–ताप्ती–गोदावरी का नदी-जाल—रक्षा व संचार के अनुकूल।
- कूटनीति: गुप्त–विवाह-संबंध; सीमांत जनपदों (असमक/रिषिक/कोंकण) में स्थानीय नरेशों को आश्रित बनाकर “रक्षक–सरंक्षक” मॉडल।
- आर्थिक आधार: कृषि-उपज, वन-सम्पदा, ताम्रपत्र भूमि-दान के माध्यम से ब्राह्मण बसाहट—राजस्व और वैधता दोनों।
- संस्कृति–धर्म: वैदिक–ब्राह्मण परम्परा का संरक्षण + बौद्ध कला/वास्तु (अजंता) का पोषण—बहुधर्मी सह-अस्तित्व से व्यापक स्वीकृति।
7) परीक्षा-उपयोगी बिंदु (Quick Recall)
- संस्थापक विंध्यशक्ति; वास्तविक विस्तार प्रवरसेन I।
- दो प्रमुख शाखाएँ: प्रवरपुर–नन्दिवर्धन और वत्सगुल्म।
- प्रभावतीगुप्ता (गुप्त राजकुमारी) का c. 390–410 CE तक वाकाटक शासन पर अभिभावकत्व; पुणे/रिद्धापुर ताम्रपत्र साक्ष्य।
- प्रवरसेन II—राजधानी प्रवरपुर, साहित्यिक संरक्षक।
- हरिषेण—अजंता (उत्तर चरण) के शाही संरक्षक; पश्चिम–दक्कन में प्रभाव का चरम।
वाकाटक साम्राज्य का उदय दक्कन की सत्ता-रिक्ति के बीच विदर्भ केन्द्र से हुआ और वैदिक–ब्राह्मण वैधता, वैवाहिक कूटनीति (विशेषतः गुप्तों से), प्रांतीय–शाखा मॉडल और सांस्कृतिक संरक्षण के सहारे पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक यह शक्ति अपने चरम पर पहुँची। राजनीति (गठबंधन), अर्थ (भूमि-अनुदान), और संस्कृति (अजंता, संस्कृत–प्राकृत साहित्य)—इन तीन स्तम्भों ने विस्तार की गति प्रदान की और आगे के दक्कनी परिदृश्य (नल, कालाचारी, राष्ट्रकूट–पूर्ववर्त्ता) के लिए आधारभूमि तैयार की।
वाकाटक साम्राज्य का राजनीतिक इतिहास
गुप्त साम्राज्य के समकालीन और दक्षिण भारत तथा दकन क्षेत्र के महत्वपूर्ण राजवंशों में वाकाटक साम्राज्य का विशेष स्थान है। यह साम्राज्य तीसरी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में उभरकर चौथी-पाँचवीं शताब्दी ईस्वी तक अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। वाकाटक गुप्तों के समकालीन एवं सहयोगी थे और उन्होंने दकन में राजनीतिक एकता तथा सांस्कृतिक विकास में अहम भूमिका निभाई।
वाकाटक वंश की प्रमुख शाखाएँ
इतिहासकारों ने वाकाटक साम्राज्य को मुख्यतः दो शाखाओं में विभाजित किया है:
- नागपुर शाखा (प्रवृत्तिशेन शाखा) – प्रारंभिक शासक प्रवृत्तिशेन प्रथम से आरंभ।
- वंजन शाखा (विंध्याशक्ति शाखा/वर्धन शाखा) – जिसकी राजधानी वर्धन (प्राचीन वर्धमान) थी।
इन दोनों शाखाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में सत्ता स्थापित की, किंतु दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध भी विद्यमान रहे।
प्रमुख शासकों का राजनीतिक इतिहास
1. विंध्यशक्ति (Vindhyashakti) – संस्थापक (250 ई.)
- वाकाटक वंश का प्रथम शासक।
- पुराणों और शिलालेखों से ज्ञात होता है कि उसने अपने पराक्रम से वंश की नींव रखी।
- कालिंजर एवं विदर्भ क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित किया।
2. प्रवृत्तिशेन प्रथम (Pravarasena I) (270–330 ई.)
- वाकाटक वंश का सबसे शक्तिशाली शासक, जिसे साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- उसने वैदिक यज्ञों का आयोजन किया, जैसे – अश्वमेध, राजसूय, वाजपेय इत्यादि।
- स्वयं को सम्राट की उपाधि धारण की और दकन का एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया।
- उसके शासनकाल में वाकाटक गुप्तों की तरह एक महाशक्ति बन गए।
3. रुद्रसेन प्रथम (Rudrasena I) (330–355 ई.)
- प्रवृत्तिशेन प्रथम का उत्तराधिकारी।
- उसके काल में साम्राज्य स्थिर रहा, परंतु गुप्तों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क की शुरुआत हुई।
- उसने गुप्त वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए।
4. प्रवृत्तिशेन द्वितीय (Pravarasena II) (355–400 ई.)
- इसे ‘प्रवृत्तिशेन बलभद्र’ भी कहा जाता है।
- विदर्भ क्षेत्र में स्थायी राजधानी नागपुर स्थापित की।
- उसके शासनकाल में साहित्य और संस्कृति का विकास हुआ।
5. रुद्रसेन द्वितीय (Rudrasena II) (400–415 ई.)
- रुद्रसेन द्वितीय का विवाह गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) की पुत्री प्रभावती गुप्त से हुआ।
- इस विवाह ने गुप्त–वाकाटक संबंधों को और प्रगाढ़ कर दिया।
- रुद्रसेन द्वितीय की असमय मृत्यु के बाद, उसकी पत्नी प्रभावती गुप्त ने राज्य की संरक्षिका (Regent) के रूप में शासन किया।
6. प्रभावती गुप्त (415–440 ई.)
- गुप्त वंश की राजकुमारी एवं वाकाटक वंश की महारानी।
- उसने अपने नाबालिग पुत्रों की ओर से शासन किया।
- इस अवधि में गुप्त साम्राज्य का वाकाटक साम्राज्य पर विशेष प्रभाव रहा।
- उसके शासकीय अभिलेखों से धार्मिकता, दान और भूमि-अनुदान की परंपरा का पता चलता है।
7. प्रवृत्तिशेन तृतीय (Pravarasena III) (440–460 ई.)
- प्रभावती गुप्त का पुत्र।
- उसके समय में साम्राज्य पुनः स्वतंत्र हुआ।
- उसने साहित्यिक संरक्षण दिया तथा संस्कृत भाषा के विकास में योगदान किया।
8. हरिषेण (Harishena) (475–500 ई.)
- वाकाटक वंश का अंतिम महान शासक।
- उसका राज्य दक्षिण में नर्मदा से लेकर कांची (तमिलनाडु) तक विस्तृत था।
- हरिषेण का नाम अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के निर्माण से जुड़ा है।
- उसकी मृत्यु के पश्चात् वाकाटक साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हो गया।
वाकाटक साम्राज्य का पतन
- हरिषेण की मृत्यु के बाद साम्राज्य कई छोटे-छोटे भागों में बिखर गया।
- वाकाटक साम्राज्य पर हूणों के आक्रमण तथा चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के उदय का गहरा प्रभाव पड़ा।
- अंततः छठी शताब्दी के उत्तरार्ध तक वाकाटक साम्राज्य विलुप्त हो गया।
वाकाटक साम्राज्य ने गुप्तों के सहयोगी और समकालीन के रूप में भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। इनके शासनकाल में न केवल राजनीतिक स्थिरता रही, बल्कि धर्म, संस्कृति, साहित्य, कला और स्थापत्य का भी व्यापक विकास हुआ। विशेषकर अजंता की गुफाएँ वाकाटक शासन की सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण हैं।
वाकाटक साम्राज्य की राज्य व्यवस्था एवं प्रशासन
वाकाटक साम्राज्य (3री से 5वीं शताब्दी ईस्वी) प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण राजवंश था, जिसने विशेष रूप से दक्कन (विदर्भ, आंध्र, तेलंगाना और मध्य भारत के कुछ भाग) में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित किया। वाकाटकों की प्रशासनिक प्रणाली गुप्त साम्राज्य से गहराई से प्रभावित थी, क्योंकि वे गुप्तों के समकालीन और कभी-कभी उनके सहयोगी भी रहे। गुप्तकालीन शासन पद्धति के आधार पर ही वाकाटक शासकों ने अपने साम्राज्य की शासन व्यवस्था विकसित की।
1. राजसत्ता एवं राजकीय पद (Kingship and Royal Authority)
- सम्राट की केंद्रीय भूमिका – वाकाटक शासक स्वयं को “धर्ममहामात्र” और “राजाधिराज” जैसे उपाधियों से विभूषित करते थे।
- राजा को धर्म का संरक्षक और प्रजाजनों का पालक माना जाता था।
- वाकाटक राजाओं की सत्ता वंशानुगत थी और शाही परिवार में उत्तराधिकार पिता से पुत्र या निकट संबंधियों को मिलता था।
- राजसत्ता धार्मिक और वैदिक आदर्शों से जुड़ी हुई थी।
2. प्रशासनिक ढाँचा (Administrative Structure)
वाकाटक साम्राज्य का प्रशासन गुप्तों के समान विकेन्द्रित (Decentralized) था।
- केंद्रीय प्रशासन – सम्राट, मंत्रीमंडल, सैन्य अधिकारी, पुरोहित और दूत।
- प्रांतीय प्रशासन – साम्राज्य को कई प्रदेशों या जनपदों में बाँटा गया था। प्रत्येक प्रांत पर एक राजकुमार (कुमारामात्य) या विश्वसनीय अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी।
- स्थानीय प्रशासन –
- विशय (जिला) और आहारा (राजस्व इकाई) प्रमुख स्तर थे।
- गांव प्रशासन ग्रामसभा द्वारा चलता था। गांव में ग्रामिक अथवा ग्रामाधिपति राजकीय कार्यों को संचालित करता था।
3. मंत्रीमंडल एवं उच्च अधिकारी (Council of Ministers & Officials)
- वाकाटक शासक अपने प्रशासन में सक्षम मंत्रियों की सहायता लेते थे।
- प्रमुख अधिकारी:
- संधिविग्रहिक – संधि और युद्ध मामलों का प्रभारी।
- महादंडनायक – न्याय एवं दंड व्यवस्था का अधिकारी।
- महाप्रतिहार – दरबार का उच्च अधिकारी।
- भोगपति – राजस्व एवं भूमि प्रबंधन का प्रभारी।
- सेनापति – सेना का सर्वोच्च कमांडर।
4. राजस्व व्यवस्था (Revenue System)
- वाकाटक साम्राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी।
- भूमि राजस्व सबसे बड़ा आय-स्रोत था।
- प्रमुख कर:
- कर – भूमि कर।
- उपरिकर – अतिरिक्त कर।
- पण – मुद्रा आधारित कर।
- व्यापार एवं कुटीर उद्योगों से भी राजस्व प्राप्त होता था।
- भूमि अनुदान प्रथा (Land Grant System) – ब्राह्मणों और धार्मिक संस्थानों को करमुक्त भूमि दान करना आम बात थी। इसने सामंतवाद की नींव रखी।
5. न्यायिक व्यवस्था (Judicial System)
- राजा सर्वोच्च न्यायाधीश माना जाता था।
- धर्मशास्त्रों और स्मृतियों पर आधारित न्याय प्रणाली थी।
- उच्च अधिकारियों के माध्यम से आपराधिक, दीवानी और धार्मिक मामलों का निपटारा होता था।
- गाँव स्तर पर विवादों का निपटारा ग्रामसभा करती थी।
6. सैन्य संगठन (Military Organization)
- वाकाटक सेना मुख्यतः पैदल सैनिकों, घुड़सवारों, रथों और हाथियों से बनी थी।
- गुप्तों की तरह इनके पास भी एक स्थायी सेना थी।
- सीमाओं की सुरक्षा और साम्राज्य विस्तार के लिए सैन्य शक्ति का महत्वपूर्ण स्थान था।
- विदर्भ और आंध्र क्षेत्र में सामरिक दृष्टि से किले और नगर विकसित किए गए।
7. प्रशासन की विशेषताएँ (Features of Vakataka Administration)
- गुप्त प्रशासन का अनुकरण – गुप्तकालीन प्रशासन से प्रेरित ढाँचा।
- विकेन्द्रित व्यवस्था – प्रांतीय और स्थानीय अधिकारियों को पर्याप्त स्वतंत्रता।
- भूमि अनुदान नीति – धार्मिक वर्ग को भूमि देकर राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखना।
- धार्मिक प्रभाव – शासन का आधार धर्म और वैदिक सिद्धांत।
- सामंतवाद की वृद्धि – अनुदान प्रथा और सामंतों का उभार।
वाकाटक साम्राज्य की राज्य व्यवस्था गुप्तकालीन प्रशासन का दर्पण थी। इसमें राजसत्ता की सर्वोच्चता, विकेन्द्रित शासन प्रणाली, भूमि अनुदान नीति, और धर्म आधारित न्याय व्यवस्था प्रमुख थीं। वाकाटकों ने दक्कन क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता और सांस्कृतिक समृद्धि प्रदान की। हालांकि भूमि अनुदान और सामंतवाद की प्रवृत्ति ने धीरे-धीरे उनकी शक्ति को कमजोर कर दिया, जिससे आगे चलकर साम्राज्य का पतन हुआ।
आर्थिक दशाएँ एवं भूमि अनुदान (Economic Conditions and Land Grants in Vakataka Period)
1. वाकाटक साम्राज्य की आर्थिक पृष्ठभूमि
वाकाटक साम्राज्य (3री से 5वीं शताब्दी ई.) मध्य भारत में राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा। इसका प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक विकास गुप्त साम्राज्य से गहराई से जुड़ा हुआ था। वाकाटक शासकों ने आर्थिक समृद्धि को बनाए रखने के लिए कृषि, भू-राजस्व, व्यापार, शिल्प और भूमि अनुदान की नीति को संगठित किया।
- साम्राज्य का मुख्य आधार कृषि उत्पादन था।
- कर प्रणाली गुप्त प्रशासनिक ढाँचे से मिलती-जुलती थी।
- व्यापारिक संपर्क दकन, मालवा, विदर्भ, अंध्र और समुद्री तट तक फैला हुआ था।
2. कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था
- वाकाटक साम्राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि आधारित थी।
- भूमि का स्वामित्व राज्य, सामंत और कृषकों के बीच विभाजित था।
- कृषक अन्न, फल, तिलहन, कपास और धान की खेती करते थे।
- सिंचाई के लिए कुएँ, तालाब और नहरें प्रयुक्त होती थीं।
- कुछ अभिलेखों में जल-स्रोतों की मरम्मत एवं देखरेख के उल्लेख मिलते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सिंचाई पर ध्यान दिया जाता था।
3. कर प्रणाली (Revenue System)
- राज्य का प्रमुख राजस्व स्रोत भूमि कर (भूमि-भाग) था।
- कृषकों से फसल का एक निश्चित अंश लिया जाता था।
- करों में –
- उपकर्ष कर (उत्पादन कर),
- भोग कर (स्थानीय उत्पादों पर कर),
- शुल्क (व्यापारिक कर),
- सीमा शुल्क (नदी-तट और नगर प्रवेश कर)
शामिल थे।
4. व्यापार एवं शिल्प
- वाकाटक शासक गुप्त साम्राज्य के सहयोगी होने के कारण उत्तर भारत, दकन और समुद्रतटीय क्षेत्रों से जुड़े थे।
- व्यापार के लिए प्रमुख मार्ग:
- उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाला विदर्भ मार्ग,
- पश्चिमी समुद्र तट से सोपारा, कोंकण, बारूची बंदरगाह,
- पूर्व की ओर कटक और अंध्र के बंदरगाह।
- व्यापारिक वस्तुएँ: कपास, रत्न, लोहे के औजार, हाथीदाँत, मसाले, अनाज और धातुएँ।
- शिल्प एवं हस्तकला – कपड़ा बुनाई, धातु शिल्प, मूर्तिकला और मिट्टी के बर्तन।
5. भूमि अनुदान नीति (Land Grant Policy)
वाकाटक साम्राज्य भूमि अनुदान पर विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
- भूमि अनुदान ब्राह्मणों, मठों और धार्मिक संस्थाओं को दिए जाते थे।
- इन्हें अग्रहारा भूमि कहा जाता था।
- भूमि अनुदान अभिलेखों में कर-मुक्ति, सिंचाई अधिकार, पशुपालन अधिकार, और गाँव की प्रशासनिक व्यवस्था शामिल होती थी।
- यह परंपरा गुप्तकालीन भूमि अनुदान नीति से प्रेरित थी।
भूमि अनुदान के परिणाम:
- ब्राह्मणों का प्रभाव बढ़ा – धार्मिक एवं सामाजिक श्रेष्ठता को बल मिला।
- कृषक समाज पर बोझ – कृषक दोहरी जिम्मेदारी (राज्य और दान-प्राप्तिकर्ता) के अधीन हुए।
- नगर-केन्द्रों का पतन – शहरी उत्पादन घटा और व्यापारिक गतिविधियों में कमी आई।
- सामंतवाद की नींव – भूमि अनुदान से स्थानीय शक्तियाँ उभरने लगीं, जिसने बाद में भारतीय सामंतशाही को जन्म दिया।
6. अभिलेखीय प्रमाण
- रिधपुर अभिलेख (प्रवाहण सेन वाकाटक) – भूमि अनुदान का स्पष्ट उल्लेख।
- वाकाटक अभिलेख बताते हैं कि भूमि अनुदान कर-मुक्त होते थे।
- कई दानपत्रों में यह उल्लेख मिलता है कि ब्राह्मणों को दिए गए गाँवों पर स्थानीय किसानों को कर देना पड़ता था, जिससे उनके अधिकार सीमित हो जाते थे।
वाकाटक साम्राज्य की आर्थिक व्यवस्था कृषि, कर, व्यापार और भूमि अनुदान पर आधारित थी। यद्यपि साम्राज्य ने कृषि और व्यापार से समृद्धि अर्जित की, परंतु भूमि अनुदान की बढ़ती परंपरा ने दीर्घकाल में सामंतवाद, नगरों के पतन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव को जन्म दिया। इसने गुप्तोत्तर कालीन भारतीय समाज-आर्थिक ढाँचे को गहराई से प्रभावित किया।
नगर केंद्र एवं व्यापार (वाकाटक साम्राज्य)
वाकाटक साम्राज्य (तीसरी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी) भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण काल रहा। इस काल में नगर केंद्रों, व्यापार और आर्थिक जीवन में गहन परिवर्तन देखने को मिले। यद्यपि वाकाटकों का प्रशासन और राजनीति गुप्त साम्राज्य से प्रभावित थी, फिर भी उनके व्यापारिक जीवन और नगर केंद्रों की भूमिका की अपनी विशिष्टता थी।
1. नगर केंद्रों का विकास
- वाकाटक काल में कई नगर धार्मिक, प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्रों के रूप में उभरे।
- प्रमुख नगर केंद्र – प्रवरपुर (राजधानी), नागपुर क्षेत्र के नगर, विदर्भ, अमरावती और वर्धा घाटी के शहरी स्थल।
- अजंता गुफाएँ (अजंता-एलोरा क्षेत्र) वाकाटक शासकों के संरक्षण में न केवल धार्मिक केंद्र बने, बल्कि यहाँ व्यापारियों और तीर्थयात्रियों का आना-जाना भी होता रहा।
- नगरों के चारों ओर कृषि आधारित गाँव जुड़े रहते थे, जो खाद्यान्न और कच्चा माल उपलब्ध कराते थे।
2. व्यापारिक मार्ग
- वाकाटक साम्राज्य दकन (मध्य भारत और विदर्भ) के महत्त्वपूर्ण भू-भाग पर स्थित था, जिससे यह उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम व्यापारिक मार्गों को जोड़ता था।
- प्रमुख मार्ग:
- उत्तर से दक्षिण मार्ग – गुप्त साम्राज्य और दकन को जोड़ने वाला मार्ग।
- पूर्वी तट मार्ग – आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक जाने वाला।
- पश्चिमी तट मार्ग – समुद्रतटीय व्यापार हेतु कोंकण और गुजरात से जुड़ा।
- इस साम्राज्य के व्यापारी दक्षिण भारत, श्रीलंका और समुद्र पार के व्यापार में भी सक्रिय थे।
3. आंतरिक व्यापार
- वाकाटक काल में स्थानीय व्यापार गाँवों और नगरों के बीच खूब फला-फूला।
- कृषि उत्पाद (धान, गेंहू, जौ, कपास) और हस्तशिल्प वस्तुएँ (मृद्भांड, धातु उपकरण, वस्त्र) बाजारों में बिकती थीं।
- नगरों में साप्ताहिक हाट-बाजार प्रणाली भी प्रचलित थी।
4. बाहरी व्यापार
- समुद्री व्यापार का प्रमुख मार्ग पश्चिमी भारत और आंध्र प्रदेश से जुड़ा हुआ था।
- वाकाटक काल में रोमन साम्राज्य के पतन के कारण विदेशी व्यापार कुछ हद तक कम हुआ, परंतु अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संपर्क जारी रहा।
- प्रमुख निर्यात – कपास, रेशम, कीमती रत्न, हाथी दाँत की वस्तुएँ और धातु।
- प्रमुख आयात – घोड़े, मोती, मसाले और विलासिता की वस्तुएँ।
5. व्यापार में गिल्ड (श्रेणियाँ) की भूमिका
- शिल्पकार और व्यापारी गिल्डों (श्रेणियों) में संगठित थे।
- ये गिल्डें न केवल व्यापार नियंत्रित करती थीं, बल्कि धार्मिक कार्यों, मंदिर निर्माण और दान-पुण्य में भी योगदान देती थीं।
- गिल्डें व्यापारिक विवादों का निपटारा भी करती थीं और राज्य प्रशासन के साथ मिलकर कार्य करती थीं।
6. नगर केंद्रों का पतन
- पाँचवीं शताब्दी के बाद नगर केंद्रों की गतिविधियाँ कमजोर होने लगीं।
- भूमि अनुदान नीति और सामंतवाद के बढ़ने से ग्रामीणकरण की प्रक्रिया तेज हुई।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की कमी ने नगरों की आर्थिक स्थिति को कमजोर किया।
- धीरे-धीरे नगर प्रशासनिक और धार्मिक केंद्र बनकर रह गए, जबकि आर्थिक गतिविधियों का केंद्र गाँव हो गया।
वाकाटक साम्राज्य के समय नगर और व्यापारिक केंद्र सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के महत्त्वपूर्ण अंग थे। वाकाटकों ने नगरों को प्रशासनिक और धार्मिक रूप से समृद्ध बनाया तथा व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखा। यद्यपि समय के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और शहरी जीवन में गिरावट आई, फिर भी वाकाटक काल ने दकन में शहरी संस्कृति और व्यापारिक नेटवर्क को लंबे समय तक प्रभावित किया।
समाज, जाति व्यवस्था और स्त्रियों की स्थिति (वाकाटक साम्राज्य)
वाकाटक साम्राज्य (तीसरी से पाँचवीं शताब्दी ई.) का समाज गुप्तकालीन भारतीय समाज से अत्यधिक मिलता-जुलता था। इस समय जाति व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं ने सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। साथ ही, स्त्रियों की स्थिति भी धार्मिक व सामाजिक दृष्टिकोण से विशिष्ट थी।
1. समाज की सामान्य संरचना
- समाज वर्ण-व्यवस्था पर आधारित था – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
- वाकाटक काल में धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और वैदिक परंपराएँ समाज में गहराई से जुड़ी थीं।
- ग्रामीण समाज कृषि और भूमि पर आधारित था, जबकि नगर समाज व्यापार और शिल्प पर निर्भर था।
- ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग का वर्चस्व सबसे अधिक था।
2. जाति व्यवस्था
- चारों वर्ण अपने-अपने धर्म और कर्तव्यों (स्वधर्म) का पालन करते थे।
- ब्राह्मण – धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ और अनुष्ठान।
- क्षत्रिय – राज्य संचालन और सैन्य कार्य।
- वैश्य – व्यापार और कृषि।
- शूद्र – शारीरिक श्रम और सेवा कार्य।
- उपजातियों (जैसे शिल्पकार वर्ग, लुहार, बढ़ई, कुम्हार, जुलाहे) का भी उल्लेख मिलता है।
- जातियों के बीच विवाह और सामाजिक संबंध सीमित थे, परंतु आर्थिक दृष्टि से सभी आपस में जुड़े रहते थे।
3. सामाजिक प्रथाएँ
- धर्म और कर्मकांड का पालन समाज में अनिवार्य था।
- ब्राह्मणों और क्षत्रियों को उच्च स्थान प्राप्त था, जबकि शूद्रों को निम्न कार्यों में लगाया जाता था।
- समाज में पुण्य दान, यज्ञ, मंदिर निर्माण और भूमि दान जैसी प्रथाएँ प्रचलित थीं।
- वाकाटक शासक स्वयं भी ब्राह्मणों और धार्मिक कार्यों को संरक्षण देते थे।
4. स्त्रियों की स्थिति
- वाकाटक समाज में स्त्रियों की स्थिति मिश्रित थी।
- उच्च वर्ग की स्त्रियाँ (राजघराने, ब्राह्मण परिवार) धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में सक्रिय थीं।
- स्त्रियों को धार्मिक अनुष्ठानों और दान-पुण्य में भाग लेने का अवसर मिलता था।
- भूमि दान और मंदिरों में दान करने वाली स्त्रियों के शिलालेख उपलब्ध हैं।
- अधिकांश स्त्रियाँ घरेलू कार्यों तक सीमित रहती थीं।
- बाल विवाह प्रचलित था, और स्त्रियों की स्वतंत्रता सीमित थी।
- पर्दा प्रथा का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, परंतु स्त्रियों से शील और मर्यादा की अपेक्षा की जाती थी।
- विधवाओं की स्थिति कठिन थी, यद्यपि कुछ उच्च कुलीन स्त्रियाँ धार्मिक कार्यों में सक्रिय रहीं।
5. शिक्षा और स्त्रियाँ
- ब्राह्मण और राजघराने की स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त कर सकती थीं।
- स्त्रियाँ धार्मिक ग्रंथों, संस्कृत भाषा और संगीत-कला में भी दक्ष थीं।
- कला संरक्षण में स्त्रियों की भूमिका विशेष रही – अजंता गुफाओं की कला वाकाटक कालीन समाज की स्त्रियों की सांस्कृतिक अभिरुचि को दर्शाती है।
6. समाज में स्त्रियों की भूमिका
- स्त्रियाँ परिवार और कुल की मर्यादा और परंपरा की संरक्षिका मानी जाती थीं।
- वे धार्मिक कार्यों और पवित्र व्रतों का पालन करती थीं।
- राजा की पत्नियाँ और रानियाँ राजनीतिक जीवन में परोक्ष रूप से प्रभाव डालती थीं।
वाकाटक कालीन समाज जाति-आधारित और धार्मिक परंपराओं से बँधा हुआ था। ब्राह्मणों और क्षत्रियों का सामाजिक वर्चस्व स्पष्ट था। स्त्रियों की स्थिति सीमित थी, परंतु उच्च कुल की स्त्रियाँ धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में सम्मानित स्थान रखती थीं। इस प्रकार, वाकाटक काल का समाज धार्मिक आस्थाओं, जाति व्यवस्था और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित था।
शिक्षा, साहित्य एवं सांस्कृतिक योगदान (Education, Literature and Cultural Contribution of the Vakataka Empire)
1. वाकाटक काल में शिक्षा की स्थिति
- वाकाटक साम्राज्य में शिक्षा का स्तर उच्च था और यह ब्राह्मणवादी परंपरा पर आधारित थी।
- शिक्षा मुख्यतः गृहों, आश्रमों और मठों में दी जाती थी।
- गुरुकुल प्रणाली का महत्व था, जहाँ छात्र वेद, वेदांग, स्मृति, ज्योतिष, गणित और दर्शन का अध्ययन करते थे।
- शिक्षा का मुख्य उद्देश्य धार्मिक एवं नैतिक जीवन के साथ-साथ प्रशासनिक और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन हेतु योग्य व्यक्तियों का निर्माण करना था।
- बौद्ध शिक्षा केंद्र भी सक्रिय थे, विशेषकर अजंता गुफाओं में विद्यमान बौद्ध संघ और विहार शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे।
2. साहित्य का विकास
वाकाटक काल में साहित्यिक गतिविधियाँ निरंतर विकसित हुईं।
- संस्कृत साहित्य
- संस्कृत भाषा को राजाश्रय प्राप्त था।
- वाकाटक शासक साहित्य और विद्या के संरक्षक थे।
- संस्कृत में धार्मिक ग्रंथों, काव्यों और दार्शनिक रचनाओं का लेखन हुआ।
- प्राकृत और बौद्ध साहित्य
- प्राकृत भाषा भी क्षेत्रीय स्तर पर प्रचलित थी।
- बौद्ध भिक्षुओं द्वारा रचित जातक कथाएँ और सूत्र शिक्षा का माध्यम बनीं।
- प्रमुख विद्वान
- वाकाटक शासकों के समय में अनेक विद्वानों को संरक्षण मिला।
- कालिदास जैसे महान कवि का वाकाटकों के समकालीन होना उल्लेखनीय है। यद्यपि कालिदास गुप्त दरबार से जुड़े थे, लेकिन वाकाटक दरबार भी उनके संपर्क में रहा।
- प्रवरसेन द्वितीय ने सेतुबन्ध नामक संस्कृत नाटक की रचना की।
3. सांस्कृतिक योगदान
- कला एवं स्थापत्य
- वाकाटक काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि अजंता की बौद्ध गुफाएँ और चित्रकला है।
- ये गुफाएँ विश्व-प्रसिद्ध हैं और भारत की सांस्कृतिक धरोहर में विशेष स्थान रखती हैं।
- गुफाओं में निर्मित विहार और चैत्यगृह धार्मिक और शैक्षिक दोनों प्रयोजनों की पूर्ति करते थे।
- धार्मिक सहिष्णुता
- वाकाटक शासक वैष्णव और शैव धर्म के अनुयायी थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म को भी संरक्षण दिया।
- इसने समाज में सांस्कृतिक समन्वय की भावना को प्रोत्साहित किया।
- मंदिर स्थापत्य
- इस काल में पत्थरों और ईंटों से बने मंदिर विकसित हुए।
- नागर शैली के मंदिरों का प्रारंभ वाकाटक काल से ही माना जाता है।
- संगीत और नृत्य
- अजंता की चित्रकला से यह स्पष्ट होता है कि उस समय संगीत और नृत्य समाज और धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग थे।
- नृत्य की मुद्राएँ और वाद्ययंत्र (वीणा, मृदंग, बांसुरी) स्पष्ट रूप से अंकित हैं।
4. वाकाटक कालीन सांस्कृतिक धरोहर की विशेषताएँ
- अजंता की गुफाएँ : चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य का अद्वितीय संगम।
- धर्म और संस्कृति का समन्वय : बौद्ध, शैव और वैष्णव परंपराओं का मिश्रण।
- शिक्षा केंद्र : अजंता विहार, ब्राह्मण आश्रम, मंदिरों में शिक्षा की व्यवस्था।
- साहित्यिक योगदान : संस्कृत साहित्य का उत्कर्ष, प्रवरसेन द्वितीय जैसे शासक-कवि का योगदान।
कला एवं स्थापत्य (विशेषतः अजंता चित्रकला)
वाकाटक साम्राज्य (3री–5वीं शताब्दी ईस्वी) न केवल एक सशक्त राजनीतिक शक्ति था, बल्कि यह भारतीय कला और संस्कृति के स्वर्णिम अध्याय के रूप में भी प्रसिद्ध है। विशेषकर अजंता की गुफाएँ वाकाटक शासकों के संरक्षण में विकसित हुईं, जिन्हें विश्व की उत्कृष्टतम बौद्ध कला एवं चित्रकला धरोहर माना जाता है।
1. वाकाटक कालीन कला का सामान्य स्वरूप
- वाकाटक शासक गुप्तकालीन कला-परंपरा से प्रभावित थे।
- इस काल में बौद्ध धर्म (विशेषकर महायान) से संबद्ध विहार (मठ) और चैत्य (स्तूप पूजा-गृह) की स्थापना की गई।
- इस युग की कला में धार्मिकता, भावनात्मक अभिव्यक्ति, यथार्थवाद और सौंदर्यबोध का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
- मूर्तिकला और चित्रकला दोनों का विकास हुआ, किंतु अजंता की चित्रकला सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
2. अजंता की गुफाएँ: सामान्य परिचय
- अजंता गुफाएँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित हैं।
- ये गुफाएँ एक घोड़े की नाल के आकार की घाटी में वाघोरा नदी के किनारे निर्मित हैं।
- कुल मिलाकर 30 गुफाएँ हैं, जिनमें से कुछ चैत्य गृह (पूजा स्थल) और अधिकांश विहार (भिक्षुओं के निवास स्थान) हैं।
- इनका निर्माण द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक हुआ, परंतु इनका उत्कर्ष वाकाटक शासक हरिषेण (लगभग 460–478 ई.) के शासनकाल में हुआ।
3. वाकाटक संरक्षण और हरिषेण का योगदान
- वाकाटक राजा हरिषेण कला के महान संरक्षक माने जाते हैं।
- उनके समय में अजंता गुफाओं का नव-निर्माण और चित्रांकन हुआ।
- हरिषेण के सामंतों और उच्चाधिकारियों ने भी दान देकर गुफाओं के निर्माण में सहयोग दिया।
- गुफा संख्या 16 और 17 की दीवारों पर शिलालेखों से स्पष्ट होता है कि ये कार्य वाकाटक साम्राज्य के संरक्षण में हुआ।
4. अजंता चित्रकला की विशेषताएँ
- विषय-वस्तु:
- मुख्यतः जातक कथाएँ (बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ)।
- बुद्ध के जीवन से जुड़े प्रसंग।
- महायान बौद्ध धर्म की आदर्श कल्पनाएँ।
- सामान्य जनजीवन – राजा, रानी, व्यापारी, गायक, नर्तक, वन्य जीव-जंतु आदि।
- शैली और तकनीक:
- ये चित्र फ्रेस्को-सेको तकनीक में बनाए गए, जिसमें गीले प्लास्टर पर रंग चढ़ाकर उन्हें स्थायी बनाया गया।
- रंग प्राकृतिक खनिजों और पौधों से बनाए जाते थे।
- आकृतियों में भाव-भंगिमा की अभिव्यक्ति, आँखों की गहराई और चेहरे का सौंदर्य अद्वितीय है।
- कलात्मक विशेषताएँ:
- शरीर की आकृतियाँ कोमल, गोलाकार और अनुपातपूर्ण।
- परिधान पारदर्शी और ललित।
- आभूषणों और अलंकरण का सुंदर प्रदर्शन।
- चित्रों में गति और जीवंतता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर।
5. प्रमुख अजंता चित्रण
- गुफा 1: बोधिसत्व पद्मपाणि और वज्रपाणि के भव्य चित्र।
- गुफा 2: जातक कथाएँ जैसे विशांतर जातक।
- गुफा 16: बुद्ध के जीवन प्रसंग और जातक चित्र।
- गुफा 17: अजंता की सबसे समृद्ध गुफा, जिसमें बुद्ध के विभिन्न जन्म और राजकीय जीवन के दृश्य चित्रित हैं।
- गुफा 26: महापरिनिर्वाण बुद्ध की मूर्ति और चित्रांकन।
6. स्थापत्य कला
- गुफाएँ दो प्रकार की थीं –
- चैत्य गृह (स्तूप सहित प्रार्थना स्थल) – गुफा 9, 10, 19, 26।
- विहार (मठ या निवास) – गुफा 1, 2, 16, 17 आदि।
- स्थापत्य में बौद्ध धर्म के धार्मिक तत्वों के साथ-साथ गुप्तकालीन स्थापत्य कला का प्रभाव देखा जा सकता है।
- स्तंभों और छतों पर की गई नक्काशी में ललित कला की झलक मिलती है।
7. वाकाटक कालीन कला की महत्ता
- अजंता की गुफाएँ न केवल भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं, बल्कि विश्व कला धरोहर भी हैं।
- इन चित्रों में भारतीय समाज, धर्म, संस्कृति और दार्शनिक विचारों का अद्भुत समन्वय झलकता है।
- इस कला ने गुप्तकालीन कला की परंपरा को और अधिक भव्यता प्रदान की।
- आज ये गुफाएँ यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में संरक्षित हैं।
वाकाटक साम्राज्य, विशेषकर हरिषेण के शासनकाल में अजंता कला और स्थापत्य ने भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अपना नाम दर्ज किया। इन गुफाओं में निहित चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि तत्कालीन समाज की कलात्मक परिष्कृति, सौंदर्य-बोध और जीवन-दर्शन की झलक प्रस्तुत करते हैं। अजंता चित्रकला वास्तव में भारतीय कला का शिखर है, जिसने विश्व भर में भारतीय संस्कृति की गौरवमयी छवि स्थापित की।