चालुक्य वंश ( Chalukya Dynasty ) – विस्तृत विवरण Complete Notes

चालुक्य वंश complete notes Ancient Indian History Practice Test

चालुक्य वंश

चालुक्य वंश ( Chalukya Dynasty ) प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजवंश था, जिसने दक्षिण भारत तथा मध्य भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया। चालुक्यों का उदय 6वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ और इन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति, कला, स्थापत्य तथा संस्कृति में एक नई दिशा प्रदान की। चालुक्यों की तीन प्रमुख शाखाएँ मानी जाती हैं—

  1. बादामी चालुक्य (6वीं–8वीं शताब्दी ई.)
  2. पूर्वी चालुक्य (वेंगी, आंध्र प्रदेश)
  3. पश्चिमी चालुक्य (कल्याणी चालुक्य, 10वीं–12वीं शताब्दी ई.)

यहाँ हम मुख्यतः बादामी चालुक्यों का अध्ययन करेंगे, जिन्होंने कर्नाटक क्षेत्र में अपनी राजधानी बादामी (ऐहोल के समीप) स्थापित की थी।

बादामी चालुक्य वंश (6वीं–8वीं शताब्दी ई.) – विस्तृत विवरण

भारत के प्राचीन इतिहास में चालुक्य वंश का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह वंश 6वीं शताब्दी ई. में उभरा और 8वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में अपनी सत्ता स्थापित रखी। इन्हें प्रायः “बादामी चालुक्य” या “पुलकेशी चालुक्य” कहा जाता है, क्योंकि इनकी राजधानी बादामी (आधुनिक कर्नाटक का बागलकोट ज़िला) थी।

1. उत्पत्ति और स्थापना

  • चालुक्य वंश की उत्पत्ति को लेकर मतभेद हैं।
    • कुछ इतिहासकार इन्हें उत्तर भारत के क्षत्रिय वंश से मानते हैं।
    • कुछ के अनुसार, इनकी उत्पत्ति दक्षिण भारत के स्थानीय जनजातीय समूहों से हुई।
  • प्रारंभिक संस्थापक – जयसिंह/राणरग (5वीं शताब्दी ई.) को माना जाता है।
  • वास्तविक संस्थापक – पुलकेशिन प्रथम (543 ई.) जिन्होंने बादामी को राजधानी बनाकर राज्य की नींव रखी।

2. प्रमुख शासक

(क) पुलकेशिन प्रथम (543–566 ई.)

  • चालुक्य वंश का संस्थापक।
  • बादामी को राजधानी बनाया।
  • कई दुर्गों का निर्माण करवाया।
  • नंदिनगर (आधुनिक नंदलूर) पर अधिकार।

(ख) किर्तिवर्मन प्रथम (566–597 ई.)

  • पुलकेशिन प्रथम का पुत्र।
  • कांची (पल्लवों की राजधानी) पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की।
  • दक्षिण कोंकण और उत्तरी मैसूर क्षेत्र को राज्य में मिलाया।

(ग) मंगलेश (597–610 ई.)

  • किर्तिवर्मन प्रथम का भाई।
  • अजन्ता गुफा संख्या 17 के शिलालेख में उसका उल्लेख है।
  • “त्रिपुरी युद्ध” में विजयी रहा।

(घ) पुलकेशिन द्वितीय (610–642 ई.) – सबसे महान शासक

  • चालुक्य साम्राज्य का चरमोत्कर्ष इन्हीं के समय हुआ।
  • हर्षवर्धन को नर्मदा के तट पर हराया (640 ई.)।
  • पल्लवों से लम्बे समय तक संघर्ष (विशेषकर नरसिंहवर्मन प्रथम से)।
  • 642 ई. में पल्लवों के राजा नरसिंहवर्मन ने बादामी को जीत लिया और पुलकेशिन द्वितीय युद्ध में मारा गया।
  • पुलकेशिन द्वितीय का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी किया है।

(ङ) विक्रमादित्य प्रथम (655–681 ई.)

  • पल्लवों से पुनः युद्ध कर बादामी को मुक्त कराया।
  • चालुक्य शक्ति को पुनर्जीवित किया।

(च) विक्रमादित्य द्वितीय (733–746 ई.)

  • कांची पर आक्रमण कर पल्लवों को हराया।
  • कांची के मंदिरों को दान दिया, उन्हें नष्ट नहीं किया।

(छ) किर्तिवर्मन द्वितीय (746–753 ई.)

  • बादामी चालुक्यों का अंतिम शासक।
  • इन्हें राष्ट्रकूट राजा दंतीदुर्ग ने पराजित कर सत्ता समाप्त कर दी।

3. प्रशासन

  • राजसत्ता पूर्ण रूप से वंशानुगत थी।
  • राजा के नीचे मंत्री, अमात्य और सामंत।
  • भूमि को प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा गया।
  • ग्राम-सभा (सभा व समिति) का उल्लेख भी मिलता है।

4. धर्म

  • चालुक्य शासक मुख्यतः वैष्णव और शैव थे।
  • जैन धर्म और बौद्ध धर्म को भी संरक्षण मिला।
  • बादामी, ऐहोले और पट्टदकल में शिव और विष्णु मंदिरों का निर्माण।

5. कला और स्थापत्य

  • बादामी चालुक्य काल को “प्रारंभिक चालुक्य शैली” का युग माना जाता है।
  • मुख्य केंद्र – बादामी, ऐहोले और पट्टदकल
  • स्थापत्य विशेषताएँ:
    • पाषाण मंदिर और गुफा मंदिर।
    • नागर और द्रविड़ शैली का मिश्रण।
    • पट्टदकल को यूनेस्को ने “विश्व धरोहर स्थल” घोषित किया है।
  • प्रमुख मंदिर –
    • ऐहोले का लाड़खान मंदिर और दुर्ग मंदिर
    • पट्टदकल का विरुपाक्ष मंदिर (विक्रमादित्य द्वितीय की रानी लोकमहादेवी ने बनवाया)।
    • बादामी की गुफाएँ (शिव, विष्णु और जैन धर्म से संबंधित)।

6. साहित्य और संस्कृति

  • संस्कृत और कन्नड़ साहित्य का विकास।
  • पुलकेशिन द्वितीय के समय कवि रवीकीर्ति प्रसिद्ध थे (ऐहोले शिलालेख का लेखक)।
  • चालुक्य शिलालेख संस्कृत और कन्नड़ में लिखे गए।

7. चालुक्यों का पतन

  • विक्रमादित्य द्वितीय के बाद वंश कमजोर हुआ।
  • अंतिम शासक किर्तिवर्मन द्वितीय था।
  • राष्ट्रकूटों के शासक दंतीदुर्ग ने 753 ई. में इन्हें हराकर समाप्त कर दिया।

8. महत्व और योगदान

  • चालुक्य काल ने दक्षिण भारत में कला, स्थापत्य और संस्कृति को नई दिशा दी।
  • ऐहोले और पट्टदकल भारतीय मंदिर वास्तुकला के प्रयोगशाला कहे जाते हैं।
  • राजनीतिक दृष्टि से इन्होंने दक्षिण भारत को एकजुट किया और उत्तर भारतीय शक्तियों से टक्कर ली।

बादामी चालुक्य वंश (6वीं–8वीं शताब्दी) दक्षिण भारत का एक गौरवशाली राजवंश था, जिसने कला, स्थापत्य, धर्म और संस्कृति में अमूल्य योगदान दिया और जिसका प्रभाव आगे आने वाले राष्ट्रकूटों व पश्चिमी चालुक्यों में भी स्पष्ट दिखाई देता

पूर्वी चालुक्य वंश (वेंगी)

1. उत्पत्ति और स्थापना

  • पूर्वी चालुक्य वंश की स्थापना 7वीं शताब्दी ई. में कुब्ज विष्णुवर्धन ने की।
  • विष्णुवर्धन मूलतः चालुक्य वंश (बादामी) का शासक पुलकेशिन द्वितीय का भाई था।
  • पुलकेशिन द्वितीय ने अपने भाई विष्णुवर्धन को आंध्र प्रदेश के वेंगी प्रदेश (आधुनिक गोदावरी और कृष्णा नदी क्षेत्र) का शासन सौंपा।
  • विष्णुवर्धन ने स्वतंत्रता की नींव रखी और बाद में यह वंश पूर्वी चालुक्य कहलाया।

2. भौगोलिक क्षेत्र

  • राजधानी : प्रारंभ में वेंगी (पेड्डवेगि, आधुनिक एलुरु के समीप)
  • बाद में राजधानी को राजमहेंद्रवरम् (राजमुंद्री) ले जाया गया।
  • क्षेत्र : आधुनिक आंध्र प्रदेश का गोदावरी–कृष्णा डेल्टा, जिसे उस समय आंध्र प्रदेश/वेंगी देश कहा जाता था।

3. प्रमुख शासक

(क) कुब्ज विष्णुवर्धन (615 – 641 ई.)

  • पूर्वी चालुक्य वंश का संस्थापक।
  • अपने भाई पुलकेशिन द्वितीय की सहायता से आंध्र क्षेत्र का अधिपति बना।
  • बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म दोनों का संरक्षण किया।

(ख) जयसिंह I (641 – 673 ई.)

  • विष्णुवर्धन का उत्तराधिकारी।
  • पल्लवों और चालुक्यों के बीच संघर्ष जारी रहा।

(ग) गुणग विजयादित्य III (849 – 892 ई.)

  • लंबे शासनकाल वाला शासक।
  • पल्लवों से संघर्ष में सफल।
  • प्रशासन और संस्कृति का विकास किया।

(घ) अम्म I (919 – 934 ई.)

  • इस शासक के समय पूर्वी चालुक्य वंश राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ा।
  • पल्लवों और राष्ट्रकूटों ने इस प्रदेश में हस्तक्षेप किया।

(ङ) राजराज नरेंद्र (1019 – 1061 ई.)

  • पूर्वी चालुक्यों का सबसे महान शासक माना जाता है।
  • उसने चोल वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित किए।
  • आंध्र साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा दिया।

(च) कुलोत्तुंग I (1070 – 1122 ई.)

  • वह वास्तव में चोल वंश का शासक था, परंतु उसकी माता पूर्वी चालुक्य की थी।
  • इसके बाद पूर्वी चालुक्य वंश धीरे–धीरे चोल साम्राज्य में विलीन हो गया।

4. प्रशासन

  • प्रशासन चालुक्य वंश (बादामी) की परंपराओं पर आधारित था।
  • राज्य को राष्ट्र, विषय, ग्राम में विभाजित किया गया।
  • ग्रामीण स्वायत्तता (village autonomy) बहुत मजबूत थी।
  • सभाएँ और समितियाँ प्रशासन में भाग लेती थीं।

5. धर्म और संस्कृति

  • वैष्णव और शैव दोनों संप्रदायों का संरक्षण किया।
  • बौद्ध धर्म भी प्रचलित रहा, विशेषकर अमरावती क्षेत्र में।
  • ब्राह्मणों को भूमिदान (अग्रहारा) दिए गए।

6. साहित्य और शिक्षा

  • आंध्र साहित्य का उत्कर्ष इन्हीं के काल में हुआ।
  • तेलुगु भाषा का विकास – पूर्वी चालुक्यों ने तेलुगु को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाया।
  • राजराज नरेंद्र ने राजराजेश्वरम कीर्तन और कई धार्मिक ग्रंथों का संरक्षण किया।
  • प्रसिद्ध कवि नन्नय भट्ट (महाभारत के तेलुगु अनुवादक) इसी काल के थे। इन्हें आंध्र महाभारतम् का प्रथम अनुवादक माना जाता है।

7. कला और स्थापत्य

  • पूर्वी चालुक्य काल में द्रविड़ शैली का मंदिर निर्माण हुआ।
  • प्रमुख मंदिर :
    • द्राक्षाराम (भवानी मंदिर)
    • भिमेश्वर मंदिर, द्राक्षाराम
    • राजमहेंद्रवरम् क्षेत्र के अनेक मंदिर

8. चोल संबंध

  • 11वीं शताब्दी में पूर्वी चालुक्य वंश का गहरा वैवाहिक संबंध चोल साम्राज्य से हुआ।
  • राजराज नरेंद्र ने चोल राजकुमारी से विवाह किया।
  • इस कारण वेंगी प्रदेश चोल साम्राज्य की राजनीति में शामिल हो गया।

9. पतन

  • 11वीं शताब्दी के अंत तक पूर्वी चालुक्य वंश की स्वतंत्र सत्ता क्षीण हो गई।
  • अंततः यह वंश चोल साम्राज्य में विलीन हो गया (लगभग 1189 ई.)।

10. महत्व और योगदान

  • दक्षिण भारत के इतिहास में पूर्वी चालुक्यों ने आंध्र प्रदेश को सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान दी।
  • तेलुगु भाषा और साहित्य के संरक्षक के रूप में इनका स्थान विशेष है।
  • इन्होंने आंध्र क्षेत्र को उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीति का केंद्र बनाया।

पश्चिमी चालुक्य (कल्याणी चालुक्य, 10वीं–12वीं शताब्दी ई.)

बादामी चालुक्यों के पतन के बाद चालुक्यों का एक नया वंश उभरा, जिसे पश्चिमी चालुक्य या कल्याणी चालुक्य कहा जाता है। इसका उदय 10वीं शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ और राजधानी कल्याणी (वर्तमान बसवकल्याण, कर्नाटक) रही। यह वंश प्रायः कर्नाटक के मध्य क्षेत्र (गंगावाड़ी से गोदावरी घाटी तक) पर शासन करता था।

स्थापना और विस्तार

  • इस वंश की स्थापना तैलप द्वितीय (973 ई.) ने की। उसने राष्ट्रकूटों की सत्ता को समाप्त कर चालुक्यों की पुनः स्थापना की।
  • राजधानी पहले मान्यखेट थी, पर बाद में उसने कल्याणी को राजधानी बनाया।
  • राज्य विस्तार में गोदावरी से कावेरी नदी तक का क्षेत्र सम्मिलित था।

प्रमुख शासक

  1. तैलप द्वितीय (973–997 ई.)
    • राष्ट्रकूटों को पराजित कर सत्ता स्थापित की।
    • पांड्य, चोल और परमारों से संघर्ष किया।
    • राजधानी को कल्याणी में स्थापित किया।
  2. सोमेेश्वर प्रथम (1042–1068 ई.)
    • चोल शासकों से संघर्ष।
    • उसने कल्याणी को राजधानी के रूप में विकसित किया।
    • 1068 ई. में चोलों से पराजित होकर आत्महत्या की।
  3. सोमेेश्वर द्वितीय (1068–1076 ई.)
    • उसके समय में चोल और चालुक्य संघर्ष तीव्र रहा।
  4. विक्रमादित्य षष्ठ (1076–1126 ई.)
    • इस वंश का सबसे महान शासक माना जाता है।
    • उसने चोलों को पराजित किया और अपनी शक्ति स्थापित की।
    • कन्नड़ साहित्य और स्थापत्य कला का संरक्षण किया।
    • उनके दरबार में कई कवि और विद्वान उपस्थित थे।
  5. सोमेेश्वर तृतीय (1126–1138 ई.)
    • साहित्य और विद्या का प्रेमी शासक।
    • उसने संस्कृत और कन्नड़ में कई ग्रंथों की रचना करवाई।
  6. सोमेेश्वर चतुर्थ (1184–1200 ई.)
    • अंतिम प्रमुख शासक।
    • अंततः चालुक्यों की शक्ति क्षीण हो गई और उनका स्थान होयसल और काकतीय शक्तियों ने ले लिया।

प्रशासन

  • चालुक्यों का प्रशासन परंपरागत ढंग का था।
  • राज्य को ‘नाडु’ और ‘विषय’ इकाइयों में विभाजित किया गया।
  • स्थानीय प्रशासन में सभा, ग्राम पंचायत और नागर पंचायत को विशेष महत्व प्राप्त था।

धर्म और संस्कृति

  • चालुक्यों ने शैव और वैष्णव धर्म दोनों को संरक्षण दिया।
  • जैन धर्म का भी काफी प्रभाव रहा।
  • विक्रमादित्य षष्ठ ने जैन और शैव दोनों संप्रदायों का संरक्षण किया।

कला और स्थापत्य

  • पश्चिमी चालुक्यों की कला शैली को कल्याणी चालुक्य शैली या गदग शैली कहा जाता है।
  • यह शैली बादामी चालुक्य और होयसल स्थापत्य के बीच की कड़ी है।
  • प्रमुख मंदिर –
    • कुक्कानुर का काशीविश्वेश्वर मंदिर
    • गदग का त्रिकूटेश्वर मंदिर
    • लक्कुंडी का काशीविश्वेश्वर मंदिर
    • इटगी का महादेव मंदिर (कर्नाटक का “कांची काशी” कहा जाता है)

साहित्यिक योगदान

  • कन्नड़ और संस्कृत साहित्य का उत्कर्ष हुआ।
  • विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा की रचना की (हिन्दू विधि पर महत्त्वपूर्ण ग्रंथ)।
  • बिल्हण (कश्मीरी कवि) ने विक्रमादित्य षष्ठ के दरबार में विक्रमांकदेवचरितम् लिखा।
  • कन्नड़ भाषा में रन्ना, पोंना और नगवर्मा जैसे कवि प्रसिद्ध हुए।

पतन

  • 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में चालुक्यों की शक्ति क्षीण हो गई।
  • होयसल, काकतीय और यादव शासकों ने उनके प्रदेश पर अधिकार कर लिया।
  • 1189 ई. के बाद पश्चिमी चालुक्य शक्ति का लोप हो गया।

पश्चिमी चालुक्यों ने दक्षिण भारत में राजनीति, प्रशासन, धर्म, कला और साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी कल्याणी शैली ने आगे चलकर होयसल स्थापत्य की नींव रखी। उनके समय में कन्नड़ और संस्कृत साहित्य का विकास हुआ और दक्षिण भारत का राजनीतिक परिदृश्य पुनः आकार ग्रहण करता रहा।

चालुक्यों की कल्याणी शैली की कला और स्थापत्य (10वीं–12वीं शताब्दी ई.)

पश्चिमी चालुक्य या कल्याणी चालुक्य (10वीं–12वीं शताब्दी) ने दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य को एक नई दिशा दी, जिसे प्रायः कल्याणी शैली (Kalyani Style) या पश्चिमी चालुक्य शैली भी कहा जाता है। यह शैली बादामी चालुक्यों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए होयसलों और विजयनगर स्थापत्य के लिए आधार बनी।

1. कल्याणी शैली की मुख्य विशेषताएँ

  1. डॉ. एच. कन्नान की परिभाषा के अनुसार इसे “देक्कन के चालुक्य स्थापत्य का उत्कर्ष” माना जाता है।
  2. यह शैली द्रविड़ और नागर शैली का सम्मिश्रण है, परन्तु इसमें अपनी मौलिक पहचान भी है।
  3. मंदिरों का निर्माण प्रायः ग्रीन क्लोराइट शिस्ट (soapstone) में हुआ, जिससे बारीक नक्काशी संभव हुई।
  4. विमान (शिखर) अपेक्षाकृत नीचा और अलंकृत होता था।
  5. मंदिरों में मंडपों की संख्या अधिक रही, जो स्तंभों से युक्त और खुली संरचना वाले थे।
  6. स्थापत्य में ताराकृति (star-shaped) गर्भगृह और लहरदार दीवारें देखने को मिलती हैं।
  7. मंदिरों में सूक्ष्म नक्काशी, कंगूरों, देवी-देवताओं, अप्सराओं और पौराणिक कथाओं का चित्रण मिलता है।
  8. इनके स्थापत्य में होयसला शैली की नींव स्पष्ट दिखाई देती है।

2. प्रमुख मंदिर एवं स्थापत्य उदाहरण

(क) लक्कुंडी (Lakkundi)

  • यह स्थल कल्याणी चालुक्यों की राजधानी के समीप था और प्रमुख स्थापत्य केंद्र बना।
  • यहाँ लगभग 100 मंदिर और 50 से अधिक कुएँ बने थे।
  • काशी विश्वेश्वर मंदिर – कल्याणी शैली का सर्वोत्तम उदाहरण। इसमें द्रविड़ और नागर शैलियों का सुंदर मिश्रण दिखाई देता है।
  • मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी मिलती है।

(ख) गडग (Gadag)

  • यह भी चालुक्य स्थापत्य का महत्वपूर्ण केंद्र रहा।
  • यहाँ के मंदिरों में स्तंभयुक्त मंडप और अलंकृत शिखर मिलते हैं।
  • त्रिकूट मंदिर योजना (तीन गर्भगृह वाला) का विकास हुआ।

(ग) धारवाड़ और इतगी

  • महादेव मंदिर, इतगी (1112 ई.) – इसे “देक्कन का सबसे सुंदर मंदिर” कहा जाता है।
  • मंदिर का शिखर, मंडप और मूर्तिकला उत्कृष्ट है।

3. कल्याणी शैली की कला

  • मूर्तिकला में देवी-देवताओं, गंधर्वों, अप्सराओं और पौराणिक प्रसंगों का अंकन मिलता है।
  • मंडपों के स्तंभ बेलनाकार और अत्यंत कलात्मक नक्काशी से युक्त होते थे।
  • देवी दुर्गा, विष्णु के अवतारों और शिव की विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियाँ प्रमुख हैं।
  • चित्रकला के अवशेष भी मिलते हैं, परंतु अधिकतर अब लुप्त हो चुके हैं।

4. स्थापत्य का महत्व

  • कल्याणी चालुक्य शैली ने आगे चलकर होयसला स्थापत्य को जन्म दिया।
  • इसकी विशिष्टताओं में ताराकृति योजना, अलंकृत मंडप, और शिल्प की सूक्ष्मता प्रमुख रही।
  • इस शैली ने मध्यकालीन दक्षिण भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाया।

कल्याणी चालुक्यों की कला और स्थापत्य द्रविड़ एवं नागर शैलियों का अद्भुत संगम था, जिसने मंदिर स्थापत्य को नई ऊँचाई दी। लक्कुंडी, गडग और इतगी के मंदिर इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। यह शैली भारतीय स्थापत्य कला के विकास में एक महत्वपूर्ण कड़ी रही और आगे चलकर होयसला व विजयनगर कला का मार्ग प्रशस्त किया।

चालुक्य वंश (Chalukya Dynasty) – FAQ Section

Q1. चालुक्य वंश की स्थापना कब और किसने की थी?

चालुक्य वंश की स्थापना 6वीं शताब्दी ईस्वी में पुलकेशिन प्रथम ने की थी।

Q2. चालुक्य वंश के सबसे महान शासक कौन माने जाते हैं?

पुलकेशिन द्वितीय को चालुक्य वंश का सबसे महान शासक माना जाता है, जिन्होंने दक्षिण भारत में विशाल साम्राज्य का विस्तार किया।

Q3. चालुक्य वंश के प्रमुख राजधानी नगर कौन-कौन से थे?

चालुक्य वंश की प्रमुख राजधानियाँ बादामी, वटापी, ऐहोल और पत्तदकल थीं।

Q4. चालुक्य वंश का प्रमुख योगदान किस क्षेत्र में था?

चालुक्य वंश का प्रमुख योगदान कला, स्थापत्य और मंदिर वास्तुकला में था। ऐहोल और पत्तदकल के मंदिर विश्व धरोहर स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं।

Q5. चालुक्य वंश का पतन कैसे हुआ?

चालुक्य वंश का पतन 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूटों के उदय के कारण हुआ।

Q6. चालुक्य वंश को किन उप-वंशों में बाँटा जाता है?

चालुक्य वंश को तीन प्रमुख शाखाओं में बाँटा जाता है –
बादामी चालुक्य (6वीं–8वीं शताब्दी)
कल्याणी चालुक्य (10वीं–12वीं शताब्दी)
वेंगी चालुक्य (पूर्वी चालुक्य)

Q7. चालुक्य शासकों का धार्मिक दृष्टिकोण कैसा था?

चालुक्य शासक मुख्यतः हिंदू धर्म को मानते थे, लेकिन उन्होंने जैन और बौद्ध धर्म का भी संरक्षण किया।

Q8. चालुक्य वंश और हर्षवर्धन के बीच किस शासक ने युद्ध किया था?

पुलकेशिन द्वितीय ने हर्षवर्धन से युद्ध किया था और उन्हें नर्मदा नदी के पास पराजित किया था।

Q9. चालुक्य काल के प्रसिद्ध शिलालेख कौन से हैं?

ऐहोल शिलालेख (634 ईस्वी) जो पुलकेशिन द्वितीय के शासनकाल से संबंधित है, अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Q10. चालुक्य वंश की कला और स्थापत्य की विशेषता क्या थी?

चालुक्य कला की विशेषता पत्थर की नक्काशीदार गुफाएँ, मंदिर निर्माण, शिखर शैली और ड्रविड़ तथा नागर शैली का मिश्रण थी।