मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)
भारतीय संविधान की संरचना को सुरक्षित रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने “मूल संरचना सिद्धांत” (Basic Structure Doctrine) का प्रतिपादन किया। यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया के दौरान उसकी मूल आत्मा और मूलभूत विशेषताएँ अक्षुण्ण रहें।
1. मूल संरचना सिद्धांत की अवधारणा
(a) परिभाषा
- मूल संरचना सिद्धांत के अनुसार, भारतीय संविधान के “मूलभूत तत्त्वों” या “मूल संरचना” में संसद द्वारा संशोधन नहीं किया जा सकता।
- यह सिद्धांत संविधान की स्थिरता और लचीलापन के बीच संतुलन स्थापित करता है।
(b) आवश्यकता
- संसद को संविधान संशोधन का अधिकार अनुच्छेद 368 के तहत प्राप्त है।
- हालाँकि, संसद के इस अधिकार पर कोई सीमा न होने से संविधान के मूलभूत आदर्शों के बदलने का खतरा था।
- सुप्रीम कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत के माध्यम से संविधान के मूलभूत तत्त्वों की रक्षा सुनिश्चित की।
2. मूल संरचना सिद्धांत का विकास
(a) शंकर प्रसाद बनाम भारत संघ (1951)
- पहला मामला जिसमें संविधान संशोधन की न्यायिक समीक्षा का प्रश्न उठा।
- सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि संसद को संविधान के किसी भी भाग को संशोधित करने का पूर्ण अधिकार है।
(b) सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965)
- न्यायालय ने पुनः यही माना कि संसद के पास संविधान संशोधन का असीमित अधिकार है।
(c) गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संशोधन के अधिकार पर एक महत्वपूर्ण सीमा लगाई।
- निर्णय: संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
- यह फैसला संसद और न्यायपालिका के बीच विवाद का आधार बना।
(d) केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
- इस मामले में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
- निर्णय:
- संसद को संविधान संशोधन का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार संविधान की मूल संरचना को बदलने तक सीमित है।
- पहली बार “मूल संरचना सिद्धांत” को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया।
3. संविधान की मूल संरचना के तत्त्व
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की “मूल संरचना” के अंतर्गत कई तत्त्वों को सम्मिलित किया है। इनमें शामिल हैं:
- संविधान की सर्वोच्चता।
- भारत का संघीय ढाँचा।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता।
- मौलिक अधिकार।
- संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित आदर्श (संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, गणराज्य)।
- कानून का शासन।
- संसदीय प्रणाली।
- मुक्त और निष्पक्ष चुनाव।
- न्याय, स्वतंत्रता, समानता, और बंधुता के सिद्धांत।
- अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन।
4. प्रमुख न्यायालय के फैसले
(a) इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975)
- चुनाव विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत को और अधिक विस्तार दिया।
- निर्णय: लोकतांत्रिक प्रक्रिया संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
(b) मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)
- 42वें संविधान संशोधन को चुनौती दी गई।
- निर्णय:
- अनुच्छेद 368 के तहत संसद के संशोधन अधिकार पर न्यायिक समीक्षा को हटाना असंवैधानिक है।
- “मूल अधिकार” और “डीपीएसपी” के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
(c) एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
- संघीय ढाँचे और धर्मनिरपेक्षता पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला।
- निर्णय:
- “धर्मनिरपेक्षता” और “संघीयता” संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं।
(d) कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007)
- निर्णय:
- नौवीं अनुसूची में डाले गए कानून भी न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
- “मूल संरचना” के विरुद्ध जाने वाले कानून असंवैधानिक होंगे।
5. महत्व और प्रभाव
(a) लोकतंत्र की सुरक्षा:
- यह सिद्धांत संविधान के मूलभूत आदर्शों को किसी भी अतिरेक शक्ति से बचाता है।
(b) न्यायपालिका की भूमिका:
- मूल संरचना सिद्धांत ने न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक और अंतिम व्याख्याता बनाया है।
(c) संघीयता और अधिकारों की रक्षा:
- इस सिद्धांत ने संघीय ढाँचे और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की।
(d) संविधान की स्थिरता:
- यह संविधान को बदलती परिस्थितियों के अनुसार लचीला बनाए रखने के साथ-साथ उसकी आत्मा की रक्षा करता है।
6. आलोचना
(a) स्पष्ट परिभाषा का अभाव:
- “मूल संरचना” को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।
(b) न्यायिक अतिरेक का आरोप:
- कुछ विशेषज्ञ इसे न्यायपालिका द्वारा संसद की शक्तियों में हस्तक्षेप मानते हैं।
(c) संशोधन प्रक्रिया की जटिलता:
- यह सिद्धांत संसद की शक्ति को सीमित कर देता है, जिससे संशोधन प्रक्रिया कठिन हो जाती है।
मूल संरचना सिद्धांत भारतीय संविधान की स्थिरता और लचीलापन बनाए रखने का आधार स्तंभ है। यह सिद्धांत लोकतंत्र, मौलिक अधिकारों, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। हालाँकि इसे न्यायिक अतिरेक के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसने संविधान को अनुचित और असीमित संशोधनों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
“मूल संरचना” का यह सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने और संविधान की आत्मा को जीवित रखने का एक अनमोल उपकरण है।