मंदिर स्थापत्य का तुलनात्मक अध्ययन – Comparison of Architecture of temple

(पल्लव, चोल और होयसाल शैली के संदर्भ में)

भारतीय मंदिर स्थापत्य शास्त्र में दक्षिण भारत का विशेष स्थान है। विशेषकर पल्लव, चोल और होयसाल वंशों ने मंदिर निर्माण में अलग–अलग शैली विकसित की, जिसने आगे चलकर भारतीय मंदिर वास्तुकला की धारा को प्रभावित किया। नीचे इन तीनों शैलियों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत है –


1. पल्लव शैली (6वीं–9वीं शताब्दी ई.)

  • काल – प्रारंभिक द्रविड़ शैली का विकास।
  • मुख्य केंद्र – कांचीपुरम्, महाबलीपुरम्।
  • विशेषताएँ
    1. पल्लवों ने शैल मंदिर (Rock-cut temples) और मोनोलिथिक रथ (एकाश्मक मंदिर) का निर्माण किया।
    2. मंदिर छोटे आकार के, सीमित आयाम वाले, परन्तु अत्यंत कलात्मक।
    3. गर्भगृह और अर्धमंडप के साथ सरल संरचना।
    4. गोपुरम (मुखद्वार टॉवर) का आरंभिक स्वरूप।
    5. स्तंभों पर सिंह-मुख और याली अलंकरण।
  • प्रमुख उदाहरण
    • महाबलीपुरम् के पंच रथ (धर्मराज रथ, अर्जुन रथ, भीम रथ आदि)।
    • कैलासनाथ मंदिर (कांचीपुरम्)।
    • शोर मंदिर (महाबलीपुरम्)।

2. चोल शैली (9वीं–13वीं शताब्दी ई.)

  • काल – द्रविड़ शैली का उत्कर्ष और विशालता।
  • मुख्य केंद्र – तंजावुर, गंगैकोंडा चोलपुरम्।
  • विशेषताएँ
    1. मंदिर बहुत ऊँचे, विशाल और भव्य।
    2. विमान (शिखर) पिरामिडीय आकार में कई मंज़िलों तक ऊँचा।
    3. गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा-पथ और विस्तृत प्रकोष्ठ।
    4. गोपुरम का अधिक विकास (हालाँकि पराकाष्ठा नायकों के समय हुआ)।
    5. मंदिर परिसर विशाल प्रांगण और प्राचीर से घिरा।
    6. मूर्तिकला में उत्कृष्टता – विशेषकर नटराज (कांस्य प्रतिमाएँ)।
  • प्रमुख उदाहरण
    • बृहदीश्वर मंदिर (राजराज चोल द्वारा, तंजावुर)।
    • गंगैकोंड चोलेश्वर मंदिर
    • एयरावतेश्वर मंदिर (दारासुरम)।

3. होयसाल शैली (12वीं–13वीं शताब्दी ई.)

  • काल – कर्नाटक में विकसित अनूठी शैली।
  • मुख्य केंद्र – बेलूर, हलेबीडु, सोमनाथपुर।
  • विशेषताएँ
    1. नक्षत्राकार (ताराकार) और बहुभुजीय आधार वाले मंदिर।
    2. मंदिर अपेक्षाकृत नीचले (low-rise), परन्तु अत्यधिक अलंकृत।
    3. सोपान–स्तंभ (Lathe-turned pillars) – चिकने और बेलनाकार स्तंभ।
    4. दीवारों पर अत्यधिक सूक्ष्म मूर्तिकला – पौराणिक कथाएँ, नृत्य मुद्राएँ, पशु-पक्षी।
    5. मंडप और जगती (उच्च वेदी) पर मंदिर निर्मित।
    6. गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा, परन्तु बाहरी भाग अत्यधिक सजावटी।
  • प्रमुख उदाहरण
    • चेनकेशव मंदिर (बेलूर)।
    • हॉयसलश्वर मंदिर (हलेबीडु)।
    • केशव मंदिर (सोमनाथपुर)।

तुलनात्मक सारणी

विशेषतापल्लव शैलीचोल शैलीहोयसाल शैली
काल6वीं–9वीं शताब्दी9वीं–13वीं शताब्दी12वीं–13वीं शताब्दी
केंद्रकांचीपुरम्, महाबलीपुरम्तंजावुर, गंगैकोंडाबेलूर, हलेबीडु
संरचनाशैल-मंदिर, छोटे और सरलविशाल, ऊँचे विमानों वालेनक्षत्राकार, नीचले
विमान/शिखरआरंभिक रूप, अपेक्षाकृत छोटाअत्यधिक ऊँचा, पिरामिडीयनीचा, लेकिन अलंकृत
गोपुरमप्रारंभिक रूपविकसित, परंतु नायकों में उत्कर्षगौण महत्व
मंडपसाधारणविस्तृत और विशालबहुभुजीय, स्तंभित
मूर्तिकलासरल, प्रारंभिक याली–सिंह अलंकरणनटराज कांस्य प्रतिमाएँ, शास्त्रीय मूर्तिकलासूक्ष्म, जटिल और विस्तृत
उदाहरणशोर मंदिर, कैलासनाथबृहदीश्वर, गंगैकोंड चोलेश्वरबेलूर, हलेबीडु, सोमनाथपुर

  • पल्लव शैली – दक्षिण भारत में द्रविड़ स्थापत्य की नींव रखी।
  • चोल शैली – इसे विशालता, भव्यता और ऊँचाई प्रदान की।
  • होयसाल शैली – सूक्ष्म अलंकरण और कलात्मक जटिलता का उत्कर्ष दिखाया।

इस प्रकार, तीनों शैलियाँ भारतीय मंदिर स्थापत्य के विकास की क्रमिक कड़ियाँ हैं – पल्लवों की नींव, चोलों की ऊँचाई और होयसालों की अलंकरणीय सुंदरता