पर्यावरणीय नीति और कानून (Environmental Policy and Laws)
- भारत में पर्यावरणीय नीति: राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006
- पर्यावरणीय कानून: जल (प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1974; वायु (प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1981
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA)
- अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय समझौते: पेरिस समझौता, क्योटो प्रोटोकॉल, रियो सम्मेलन
1. भारत में पर्यावरणीय नीति (Environmental Policy in India)
(i) राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 (National Environment Policy, 2006)
भारत सरकार ने 2006 में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (NEP-2006) लागू की, जिसका उद्देश्य सतत विकास (Sustainable Development) और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है।
नीति के प्रमुख लक्ष्य:
- पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग।
- जैव विविधता का संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखना।
- जल, वायु और भूमि प्रदूषण को नियंत्रित करना।
- हरित ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को सख्ती से लागू करना।
2. भारत में प्रमुख पर्यावरणीय कानून (Major Environmental Laws in India)
भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए कई कानून लागू किए हैं, जिनमें जल, वायु और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानून प्रमुख हैं।
(i) जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974)
उद्देश्य:
- जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाना।
- जल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB और SPCB) की स्थापना।
- औद्योगिक अपशिष्ट निपटान के लिए सख्त नियम।
(ii) वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981)
उद्देश्य:
- वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना।
- औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषकों की सीमा तय करना।
- वाहनों से निकलने वाले धुएँ और कारखानों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना।
(iii) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment (Protection) Act, 1986)
उद्देश्य:
- समग्र पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना।
- प्रदूषण नियंत्रण उपायों को लागू करना।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को अनिवार्य बनाना।
(iv) जैव विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002)
उद्देश्य:
- भारत की जैव विविधता का संरक्षण।
- पारंपरिक ज्ञान और जैविक संसाधनों की रक्षा करना।
- विदेशी कंपनियों द्वारा जैव संसाधनों के अनुचित उपयोग को रोकना।
(v) वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972)
उद्देश्य:
- राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभ्यारण्यों की सुरक्षा।
- लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा।
- अवैध शिकार और वन्यजीव तस्करी को रोकना।
3. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA)
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) किसी भी विकास परियोजना के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्वानुमान लगाने और उसे कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
EIA के प्रमुख चरण:
- स्क्रीनिंग (Screening): परियोजना को EIA की आवश्यकता है या नहीं, इसका निर्धारण।
- स्कोपिंग (Scoping): परियोजना के संभावित प्रभावों की पहचान करना।
- प्रभाव आकलन (Impact Assessment): पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण।
- पर्यावरण प्रबंधन योजना (Environmental Management Plan – EMP): परियोजना से होने वाले प्रभावों को कम करने के उपाय।
- सार्वजनिक परामर्श (Public Consultation): स्थानीय समुदायों और हितधारकों की राय लेना।
- निर्णय (Decision-making): सरकार द्वारा परियोजना को मंजूरी देना या अस्वीकार करना।
EIA की आवश्यकता:
- औद्योगिक परियोजनाएँ।
- सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाएँ।
- खनन और बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ।
4. प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय समझौते (Major International Environmental Agreements)
(i) पेरिस समझौता, 2015 (Paris Agreement, 2015)
- यह समझौता संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (UNFCCC) के अंतर्गत हुआ।
- लक्ष्य: वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे रखना।
- भारत ने इसमें अपनी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (INDCs) प्रस्तुत की।
(ii) क्योटो प्रोटोकॉल, 1997 (Kyoto Protocol, 1997)
- विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए बाध्य करने वाला पहला समझौता।
- इसमें कार्बन क्रेडिट तंत्र (Carbon Credit Mechanism) को अपनाया गया।
(iii) रियो सम्मेलन, 1992 (Rio Summit, 1992)
- इसे “पृथ्वी सम्मेलन” (Earth Summit) भी कहा जाता है।
- इसमें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) और संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता समझौता (UNCBD) को अपनाया गया।
- इसमें “टिकाऊ विकास (Sustainable Development)” की अवधारणा को बल दिया गया।
भारत और वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए कई नीतियाँ और कानून लागू किए गए हैं। हालांकि, इन कानूनों को प्रभावी रूप से लागू करना और जनसहभागिता बढ़ाना आवश्यक है। पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए जागरूकता, कड़े नियमों और सतत विकास की नीतियों को अपनाने की आवश्यकता है।