उत्तर-मौर्य काल (Post-Mauryan Period) – Complete Notes for Students & Competitive Exams

Post-Mauryan Empire Notes for Students & Exams

परिचय – उत्तर-मौर्य अवधिक (c. 185 ई.पू.–320 ई.)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक नया युग आरंभ हुआ, जिसे उत्तर-मौर्य काल (Post-Mauryan Period) कहा जाता है। यह काल लगभग 185 ई.पू. से लेकर 320 ई. (गुप्त वंश के उदय) तक माना जाता है। इस काल में भारत में राजनीतिक विखंडन के साथ-साथ बाहरी जातियों (यवन, शक, पार्थी, कुषाण) के प्रवेश और भारतीय संस्कृति के साथ उनके समन्वय की प्रक्रिया आरंभ हुई।

मौर्य साम्राज्य का अंत

मौर्य वंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी थी, जिससे मौर्य साम्राज्य का अवसान हुआ। इसके बाद भारत एक बार फिर छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। यही विखंडन उत्तर-पश्चिमी सीमाओं से बाहरी आक्रमणों को आमंत्रित करने का कारण बना।


उत्तर मौर्य काल की विशेषताएँ

1. राजनीतिक विखंडन और अनेक छोटे राज्यों का उदय

उत्तर-मौर्य काल में भारत के विभिन्न भागों में अनेक स्वतंत्र और अर्ध-स्वतंत्र शासक उभरे। प्रमुख शक्तियाँ थीं:

  • भारत-यूनानी (Indo-Greeks)
  • शक (Shakas)
  • पार्थियन (Parthians)
  • कुषाण (Kushans)
  • पश्चिमी क्षत्रप (Western Kshatrapas)

इन विदेशी जातियों ने उत्तर-पश्चिम भारत में अपने-अपने राज्यों की स्थापना की।

2. बाहरी संपर्क और भारत का अंतर्राष्ट्रीयकरण

उत्तर-मौर्य काल में भारत का संपर्क यूनान, मध्य एशिया, चीन और रोम जैसे दूरस्थ देशों से हुआ। इस काल में रेशम मार्ग (Silk Route) का प्रयोग व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए होने लगा।

3. धार्मिक परिवर्तन और बौद्ध धर्म का विस्तार

इस काल में विशेष रूप से बौद्ध धर्म, विशेषतः महायान शाखा का बड़ा विस्तार हुआ। अनेक विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया (विशेषकर कनिष्क) और बौद्ध विचारधारा को मध्य एशिया और चीन तक पहुँचाया।

4. कला, स्थापत्य एवं संस्कृति का मिश्रण

उत्तर-मौर्य काल में भारतीय कला में ग्रीक, ईरानी और मध्य एशियाई प्रभाव दिखाई देते हैं। इससे गांधार कला और मथुरा शैली का विकास हुआ, जो इस काल की विशेषता रही।

5. नगरों और व्यापार केंद्रों का पुनरुत्थान

Taxila, Mathura, Ujjain, Pataliputra, और Peshawar जैसे नगर व्यापार, संस्कृति और शासन के प्रमुख केंद्र बने। शहरों की अर्थव्यवस्था, टंकण प्रणाली और सड़क नेटवर्क काफी सुदृढ़ था।


काल विभाजन (Chronological Segmentation)

शासक / समूहअवधि (अनुमानित)प्रमुख क्षेत्रविशेषताएँ
भारत-यूनानी185 ई.पू.–90 ई.पू.उत्तर-पश्चिम भारतयूनानी प्रशासन, बौद्ध धर्म का समर्थन
शक वंश90 ई.पू.–250 ई.पश्चिमी भारत, मालवाटंका प्रणाली, क्षत्रप शासन
कुषाण50 ई.–250 ई.गांधार, मथुरा, काबुलकनिष्क का शासन, महायान बौद्ध धर्म
पश्चिमी क्षत्रप35 ई.–405 ई.गुजरात, मालवाशक-हिन्दू संस्कृति का समन्वय

स्रोत (Sources)

इस काल का इतिहास मुख्यतः निम्न स्रोतों से ज्ञात होता है:

  1. पुरातात्विक स्रोत – सिक्के, मूर्तियाँ, स्तूप, स्थापत्य
  2. साहित्यिक स्रोत – बौद्ध साहित्य (ललितविस्तर, दिव्यावदान), मिलिंदपन्हो
  3. यात्रा वृत्तांत – विदेशी यात्रियों जैसे फाह्यान, प्लिनी आदि के वर्णन
  4. शिलालेख – रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख

उत्तर-मौर्य काल भारतीय इतिहास का एक संक्रमणकालीन चरण था जहाँ एक ओर मौर्य शासन के केंद्रीकरण का अंत हुआ, वहीं दूसरी ओर भारत की सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विविधता ने आकार लिया। यह काल एक ‘मेलजोल का युग’ (Age of Cultural Synthesis) था, जिसमें भारत की परंपरा ने बाहरी प्रभावों को आत्मसात कर उन्हें भारतीय रंग में रंग दिया।



भारत-यूनानी संपर्क – यवन आक्रमण, सैनी डच, राजनयिक सम्बन्ध

मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात् भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमाएँ असुरक्षित हो गई थीं, जिससे विदेशी आक्रमणों के लिए रास्ता खुल गया। इस काल में यवन (Indo-Greek) शासकों ने उत्तर-पश्चिम भारत में प्रवेश कर कई छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना की। यूनानी और भारतीय सभ्यताओं के इस संपर्क से न केवल राजनीतिक बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्रों में भी प्रभाव पड़ा।


1. यवन आक्रमण – पृष्ठभूमि एवं प्रक्रिया

सिकंदर का भारत आगमन (326 ई.पू.)

  • मैसेडोनिया का राजा सिकंदर (Alexander the Great) भारत आया था।
  • उसने पंजाब के कई हिस्सों पर अधिकार कर लिया।
  • उसकी मृत्यु (323 ई.पू.) के बाद उसके सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने भारत के पश्चिमोत्तर भागों पर नियंत्रण रखा।

चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस संधि

  • चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस से युद्ध कर संधि की और कई क्षेत्र (कंधार, हेरात, बल्ख) प्राप्त किए।
  • बदले में सेल्यूकस को 500 हाथी दिए गए।
  • यह प्रथम भारत-यूनानी राजनयिक संपर्क माना जाता है।

2. भारत-यूनानी साम्राज्य (Indo-Greek Kingdom)

उदय

  • लगभग 185 ई.पू. में मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद, यूनानी सेनापतियों ने भारत में प्रवेश किया।
  • प्रमुख यूनानी शासक: डेमेट्रियस, मेनांडर (मिलिंद), एपोलोडोटस, एगथोक्लेस

क्षेत्रीय विस्तार

  • इन शासकों का शासन गांधार, पंजाब, सिंध, और उत्तर पश्चिमी भारत में फैला था।

प्रमुख शासक – मेनांडर (Milinda / Menander)

  • बौद्ध ग्रंथ ‘मिलिंदपन्हो’ में इनका वर्णन है।
  • नागसेन बौद्ध भिक्षु से उनकी धार्मिक चर्चा का वर्णन मिलता है।
  • मेनांडर ने बौद्ध धर्म अपनाया और उसे संरक्षण दिया।

3. सैनी डच (Sainik Duchies) – यूनानी शासकों की उप-शाखाएँ

शासकीय संरचना

  • यवन शासकों ने अपने अधीनस्थ सेनापतियों को उपराज्य सौंपे जिन्हें सैनी डच (Military Duchies) कहा जा सकता है।
  • ये छोटे–छोटे स्वतंत्र राज्य जैसे तक्षशिला, पुष्कलावती, और स्वात घाटी में विकसित हुए।

स्थानीय प्रभाव

  • कई यूनानी अधिकारियों ने स्थानीय महिलाओं से विवाह किया और भारतीय संस्कृति को आत्मसात किया।
  • उनकी शासन प्रणाली में यूनानी प्रशासनिक शैली और भारतीय सामाजिक जीवन का समन्वय देखने को मिलता है।

4. राजनयिक संबंध

मौर्य और यूनानी संबंध

  • मौर्यकाल में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज को चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा गया था।
  • उसने अपने ग्रंथ इंडिका में पाटलिपुत्र, प्रशासन, समाज और संस्कृति का वर्णन किया।

उपरांत संबंध

  • भारत-यूनानी शासकों ने भी भारतीय शासकों से संपर्क बनाए रखा।
  • विशेषतः बौद्ध धर्म के माध्यम से सांस्कृतिक संपर्क गहरे होते गए।

5. भारत पर प्रभाव

1. सिक्कों की प्रणाली

  • पहली बार यूनानी शैली के सिक्के भारत में प्रचलित हुए जिन पर शासक की आकृति और यूनानी लेखन होता था।
  • बाद में भारतीय प्रतीकों के साथ मिश्रित रूप में सिक्के जारी किए गए।

2. कला एवं स्थापत्य

  • गांधार कला की शुरुआत यूनानी प्रभाव से हुई – मूर्तियों में यथार्थवाद, शरीर की मांसपेशियाँ, पंखों वाले देवता, हेरक्यूलिस की आकृति इत्यादि।

3. धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय

  • यवन शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया जिससे बौद्ध विचारधारा का प्रसार हुआ।
  • यूनानी देवताओं के साथ भारतीय देवी-देवताओं का समन्वय हुआ।

भारत-यूनानी संपर्क ने उत्तर-मौर्य काल को एक वैश्विक दृष्टिकोण दिया। यवनों ने केवल आक्रमण नहीं किए, बल्कि वे भारत की संस्कृति में घुल-मिल भी गए। उनके प्रभाव से भारत की मुद्रा प्रणाली, कला, धर्म और शासन पद्धति में विविध परिवर्तन आए। यह एक ऐसा काल था जब भारत ने पहली बार यूरोपीय संस्कृति से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित किया।



नियंत्रण और राज्यों का क्रमिक उदय

– शकों का आक्रमण, पश्चिमी क्षत्रप का उदय


उत्तर-पश्चिम भारत, मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद लगातार विदेशी आक्रमणों की चपेट में रहा। यवनों (Indo-Greeks) के पश्चात् जो सबसे महत्त्वपूर्ण आक्रांता भारत आए वे थे शक (Shakas) – जिन्हें ग्रीक लेखों में साइथियंस (Scythians) कहा गया है। शकों ने न केवल भारत पर आक्रमण किया, बल्कि स्थायी रूप से भारतीय भू-भागों पर शासन स्थापित किया और पश्चिमी क्षत्रप (Western Kshatrapas) के रूप में एक संगठित प्रशासन विकसित किया।


1. शक आक्रमण की पृष्ठभूमि

मध्य एशिया की हलचल

  • हूनों, यूची (Yuezhi) और अन्य जनजातियों के दबाव के कारण शक जनजातियाँ मध्य एशिया से विस्थापित हुईं।
  • यह प्रवास लगभग 150 ई.पू. के आसपास प्रारंभ हुआ।
  • शक पहले बैक्ट्रिया और फिर गांधार होते हुए सिंध और सौराष्ट्र तक पहुंचे।

भारत में शक आक्रमण

  • शकों ने भारत में प्रवेश कर यवनों को पराजित किया और धीरे-धीरे पंजाब, सिंध, सौराष्ट्र, मालवा तथा पश्चिमी भारत के अन्य क्षेत्रों में अपने राज्य स्थापित किए।

2. शक शासकों की प्रमुख शाखाएँ

उत्तर-पश्चिम भारत की शाखा

  • सबसे पहले मौएस (Maues/Moga) नामक शक राजा ने भारत में सत्ता स्थापित की (c. 85 ई.पू.)।

मध्य भारत और पश्चिमी भारत की शाखा

  • गुजरात, मालवा और महाराष्ट्र क्षेत्र में एक अन्य शक शाखा स्थापित हुई जिसने पश्चिमी क्षत्रपों को जन्म दिया।

3. प्रमुख शक शासक

मौएस (Maues / Moga)

  • प्रथम शक शासक जिसने भारत में स्थायी सत्ता स्थापित की।
  • उसने यवनों को पराजित कर गांधार और मथुरा क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

अज़ेस प्रथम और द्वितीय (Azes I & II)

  • शक शक्तियों का विस्तार किया।
  • अज़ेस I द्वारा शक संवत् (Shaka Era) की शुरुआत की गई — जो बाद में भारतीय कालगणना में प्रमुख बनी।

4. पश्चिमी क्षत्रप (Western Kshatrapas) का उदय

‘क्षत्रप’ और ‘महा-क्षत्रप’

  • शक शासक दो उपाधियों का प्रयोग करते थे:
    • क्षत्रप (Kshatrapa) – क्षेत्रीय गवर्नर या क्षत्रिय।
    • महा-क्षत्रप (Mahakshatrapa) – उच्च राजा या सम्राट।

उदगम

  • पश्चिमी क्षत्रपों का शासन लगभग 35 ई. से 405 ई. तक रहा।
  • प्रमुख क्षेत्रों में — सौराष्ट्र, गुजरात, मालवा और उत्तर महाराष्ट्र

5. प्रमुख पश्चिमी क्षत्रप शासक

नहपान (Nahapana)

  • सबसे प्रसिद्ध पश्चिमी क्षत्रप शासक (c. 78–125 ई.).
  • उसने सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि से संघर्ष किया।
  • उसकी राजधानी जुनागढ़ थी।
  • उसने विशाल व्यापार मार्गों को नियंत्रित किया और कई चांदी के सिक्के जारी किए।

रुद्रदामन प्रथम (Rudradaman I)

  • 150 ई. के आसपास शासन किया।
  • जुनागढ़ शिलालेख (Junagadh Inscription) में उसका उल्लेख मिलता है।
  • वह संस्कृत में शिलालेख लिखवाने वाला पहला ज्ञात शासक था।
  • उसने सुधार कार्य, जल व्यवस्था और नगर निर्माण में योगदान दिया।

6. प्रशासनिक विशेषताएँ

  • शक और क्षत्रप शासकों ने स्थानीय शासकों को अधीनस्थ बनाकर शासन चलाया।
  • उन्होंने स्थानीय राजन्य वर्ग, ब्राह्मणों और व्यापारियों को संरक्षण दिया जिससे शासन को वैधता प्राप्त हुई।
  • उन्होंने अपने सिक्कों पर द्विभाषिक लेखन (ग्रीक और खरोष्ठी/संस्कृत) का प्रयोग किया।

7. शकों का भारतीयकरण

  • शक धीरे-धीरे भारतीय समाज और संस्कृति में समाहित हो गए।
  • इन्होंने हिंदू देवी-देवताओं, बौद्ध धर्म, और संस्कृत भाषा को अपनाया।
  • उनके द्वारा प्रचलित संवत् प्रणाली (शक संवत्) को भारत सरकार ने भी राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्यता दी है।

8. शकों का पतन

  • शकों की शक्ति को सबसे बड़ा झटका सातवाहन राजा गौतमीपुत्र शातकर्णि द्वारा दिया गया।
  • धीरे-धीरे ये शक्तियाँ कमजोर हुईं और गुप्त साम्राज्य के उदय के साथ ही समाप्त हो गईं।

शकों और पश्चिमी क्षत्रपों का भारत में आगमन विदेशी संपर्क की एक नई कड़ी था। उन्होंने न केवल उत्तर-पश्चिम भारत पर अधिकार किया, बल्कि भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति में भी खुद को समाहित किया। उनके शासनकाल में व्यापार, जल प्रबंधन, प्रशासनिक ढांचे और सिक्का प्रणाली में उल्लेखनीय विकास हुआ। शक शासन ने गुप्त काल के उत्कर्ष के लिए एक मंच तैयार किया।



कुषाण साम्राज्य का गठन – कदफिसेस, कनिष्क, हीरक काल


मौर्य साम्राज्य के पतन और यवन-शक आक्रमणों के पश्चात भारत में एक नया शक्तिशाली विदेशी साम्राज्य उदय हुआ — कुषाण साम्राज्य। इनकी जड़ें मध्य एशिया में थीं, और उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत को न केवल राजनीतिक रूप से संगठित किया, बल्कि धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से भी एक सुनहरा युग आरंभ किया। कनिष्क के नेतृत्व में यह साम्राज्य भारत, मध्य एशिया, ईरान और चीन तक फैला और महायान बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण वाहक बना।


1. कुषाणों की उत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास

यूची जनजाति (Yuezhi Tribe)

  • कुषाण मूलतः मध्य एशिया की यूची (Yuezhi) जनजाति से थे, जिन्हें हूणों के आक्रमण के कारण बैक्ट्रिया (Bactria) में विस्थापित होना पड़ा।
  • यूची पाँच शाखाओं में विभाजित थे, जिनमें से ‘कुषाण’ शाखा सबसे शक्तिशाली सिद्ध हुई।

2. कदफिसेस वंश (Kujula Kadphises और Vima Kadphises)

कुजुला कदफिसेस (Kujula Kadphises) — प्रथम कुषाण शासक

  • लगभग 50 ई. में सत्ता में आया।
  • इसने यवनों और शकों को पराजित कर काबुल, पेशावर और गंधार पर अधिकार कर लिया।
  • उसने सिक्कों पर “सिल्लूकस” (Seleucus) और “कुषाण” जैसे पदों का प्रयोग किया।

विम कदफिसेस (Vima Kadphises)

  • कुजुला का उत्तराधिकारी।
  • इसने भारत के भीतरी भागों तक साम्राज्य को फैलाया — विशेषकर मथुरा और बनारस तक।
  • सोने के सिक्कों की शुरुआत की, जिसमें शिव और नंदी की छवियाँ होती थीं — यह हिन्दू प्रभाव को दर्शाता है।
  • व्यापार और धन का जबरदस्त विकास हुआ।

3. कनिष्क – महानतम कुषाण सम्राट

शासनकाल: लगभग 78 ई. से 144 ई. तक

  • उसका साम्राज्य वर्तमान अफगानिस्तान, पाकिस्तान, उत्तर भारत, और मध्य एशिया तक फैला हुआ था।
  • कनिष्क का नाम तक्षशिला, मथुरा, सारनाथ, आदि शिलालेखों में पाया गया है।

कनिष्क की राजधानी

  • पुरुषपुर (Peshawar) और कभी-कभी मथुरा भी।

कनिष्क के शासनकाल की विशेषताएँ:

धार्मिक संरक्षण

  • कनिष्क महायान बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था।
  • उसने चीन, मध्य एशिया तक बौद्ध धर्म का प्रचार कराया।
  • चतुर्थ बौद्ध संगीति (Fourth Buddhist Council) का आयोजन पुरुषपुर में करवाया (वर्ष 78 ई. में), जिसमें वसुमित्र अध्यक्ष और अश्वघोष उपाध्यक्ष थे।
  • यह संगीति संस्कृत में आयोजित हुई — महायान परंपरा का शास्त्रीय रूप।

महायान बौद्ध धर्म का विकास

  • बोधिसत्व पूजा, बुद्ध को ईश्वर के रूप में पूजना, पुनर्जन्म और करुणा की महत्ता – महायान के सिद्धांतों को कनिष्क के संरक्षण में व्यापक स्वीकार्यता मिली।
  • बौद्ध धर्म अब एक दार्शनिक-आध्यात्मिक पंथ के साथ-साथ लोक धर्म बन गया।

साहित्य और संस्कृति का विकास

  • कनिष्क के दरबार में अश्वघोष, नागरजुन, चरक, और वसुमित्र जैसे विद्वान थे।
  • अश्वघोष द्वारा रचित बुद्धचरितम्, एक महत्वपूर्ण संस्कृत काव्य है।

सिक्का प्रणाली और आर्थिक उन्नति

  • कनिष्क के समय स्वर्ण, रजत, कांस्य के सुंदर सिक्के प्रचलित हुए।
  • सिक्कों पर ईरानी, यूनानी, बौद्ध, हिन्दू देवताओं की छवियाँ अंकित थीं — जैसे बुद्ध, शिव, सूर्य, हेलियोस, मित्रा, नाना आदि।
  • यह दर्शाता है कि कनिष्क एक धार्मिक समन्वयवादी था।

व्यापारिक संबंध

  • सिल्क रूट (Silk Route) पर अधिकार प्राप्त कर चीन और रोमन साम्राज्य से व्यापार किया।
  • उसकी मुद्रा और वस्त्र चीन तक लोकप्रिय हुए।

4. कनिष्क के उत्तराधिकारी और साम्राज्य का पतन

  • कनिष्क के बाद उसका पुत्र हुविष्क और फिर वसुदेव गद्दी पर बैठे।
  • बाद के कुषाण शासक शक्तिशाली नहीं रहे और साम्राज्य खंडित होने लगा।
  • उत्तर भारत में नागों, सातवाहनों और गुप्तों की शक्ति बढ़ने लगी।
  • मध्य एशिया में भी सासनियों (Sassanians) का प्रभाव बढ़ा।

5. कुषाण साम्राज्य का योगदान

धार्मिक

  • महायान बौद्ध धर्म का विस्तार।
  • बौद्ध धर्म का चीन, मध्य एशिया, और कोरिया तक प्रसार।

कला और स्थापत्य

  • गांधार और मथुरा कला शैली का अभूतपूर्व विकास।
  • पहली बार बुद्ध को मूर्तिरूप में दर्शाया गया।
  • नारी मूर्तियों, बोधिसत्वों, ध्यानमग्न बुद्ध की सुंदर छवियाँ मिलीं।

चिकित्सा और विज्ञान

  • चरक जैसे वैद्य ने चिकित्सा शास्त्र को समृद्ध किया।
  • चरक संहिता की रचना इसी काल की देन है।

कुषाण साम्राज्य ने भारतीय इतिहास में सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण की भूमिका निभाई। कनिष्क का काल भारत और मध्य एशिया के बीच बौद्ध सभ्यता की सेतु की तरह था। उसकी समन्वयवादी नीति, सांस्कृतिक संरक्षण और व्यापारिक कौशल ने उसे न केवल एक महान सम्राट बनाया, बल्कि भारत को एक वैश्विक सांस्कृतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।



नगर–केंद्रों का विकास – तक्षशिला, मथुरा, पुरुषपुर (पेशावर)
(Post-Mauryan Urban Centres: Taxila, Mathura, Peshawar)


उत्तर मौर्य काल (c. 185 BCE – 300 CE) में भारतीय उपमहाद्वीप में शहरीकरण की गति में पुनः उभार देखा गया। यह काल विदेशी संपर्क, वाणिज्यिक गतिविधियों और राजनैतिक स्थायित्व का युग था, जिसने कई महत्वपूर्ण नगरों के विकास को प्रेरित किया। तक्षशिला, मथुरा, और पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) न केवल राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र थे, बल्कि बौद्ध, जैन, और ब्राह्मणिक परंपराओं के संगम भी बने।


1. तक्षशिला (Taxila):

स्थान और ऐतिहासिक महत्त्व:

  • आधुनिक पाकिस्तान के रावलपिंडी ज़िले में स्थित यह नगर प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण शिक्षण एवं व्यापारिक केंद्र रहा।
  • इसे तीन मुख्य खंडों में विभाजित किया गया: भिर माउंड, सिरकप, और सिरसुख।

शैक्षणिक केंद्र:

  • तक्षशिला को विश्व की पहली विश्वविद्यालयीय परंपरा का प्रारंभिक रूप माना जाता है।
  • यहाँ पर चिकित्सा, खगोल, आयुर्वेद, राजनीति और सैन्य शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी।
  • चाणक्य, चरक और पाणिनि जैसे विद्वानों से इसका संबंध बताया जाता है।

यूनानी प्रभाव:

  • सिकंदर के अभियान के बाद यह नगर यवन संस्कृति के संपर्क में आया।
  • सिरकप की योजना और स्थापत्य में यूनानी-रोमन शैली के चिन्ह स्पष्ट हैं।

धार्मिक और स्थापत्य पहलू:

  • यहाँ अनेक बौद्ध स्तूप, विहार, यूनानी मंदिर, और जैन संरचनाएँ पाई गईं हैं।
  • धम्मराजिका स्तूप इस नगर की धार्मिक समृद्धि का प्रमुख उदाहरण है।

2. मथुरा (Mathura):

भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक महत्त्व:

  • यमुना नदी के किनारे स्थित मथुरा उत्तर भारत का धार्मिक, व्यापारिक और कलात्मक केंद्र था।
  • यह बौद्ध, जैन और ब्राह्मणिक परंपराओं का संगम था।

धार्मिक सह-अस्तित्व:

  • मथुरा में बौद्ध स्तूपों के साथ-साथ जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ और कृष्ण भक्ति से जुड़े मंदिर भी पाए गए।
  • यह धर्मनिरपेक्ष सह-अस्तित्व का प्रतीक बन गया।

मथुरा मूर्तिकला शैली:

  • मथुरा कला शैली में गंगा-यमुना की देशज संवेदनशीलता को मूर्त रूप दिया गया।
  • यहाँ के मूर्तिशिल्प अधिकतः बलिष्ठ, स्वाभाविक और स्थानीय लाल बलुआ पत्थर से बने होते थे।

वाणिज्यिक महत्त्व:

  • यह नगर उत्तरी भारत में रेशम, सूती वस्त्र, मिट्टी के बर्तन, और आभूषणों का प्रमुख केंद्र था।

3. पुरुषपुर (Peshawar):

भौगोलिक स्थिति:

  • आज का पेशावर, उत्तर-पश्चिम भारत का प्रमुख नगर था, जो गंधार क्षेत्र का हिस्सा था।
  • यह नगर कुषाण सम्राट कनिष्क की राजधानी बना।

राजनैतिक और धार्मिक महत्त्व:

  • कनिष्क ने पुरुषपुर को अपने शासन का सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र बनाया।
  • यहाँ महायान बौद्ध धर्म का तेज़ी से विकास हुआ और बौद्धिक गतिविधियाँ चरम पर रहीं।

स्थापत्य धरोहर:

  • कनिष्क स्तूप इस नगर की सबसे प्रसिद्ध संरचना थी, जो लगभग 400 फीट ऊँचा बताया गया है।
  • फाह्यान और ह्वेनसांग जैसे चीनी यात्रियों ने इस स्तूप का उल्लेख किया है।

धार्मिक संगोष्ठियाँ:

  • महायान बौद्ध धर्म के प्रमुख सम्मेलन यहीं आयोजित किए गए, जिसमें अश्वघोष, नागार्जुन जैसे आचार्यों ने भाग लिया।

उत्तर मौर्य काल में तक्षशिला, मथुरा और पुरुषपुर जैसे नगरों ने न केवल शहरीकरण की नई परिभाषा दी, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता, कलात्मक उत्कर्ष, और व्यापारिक समृद्धि के केंद्र भी बने। इन नगरों की विरासत आज भी भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में अमूल्य है।



अर्थव्यवस्था एवं मुद्रा प्रणाली – पंचमार्क सिक्के, यूनानी मुद्रा, कुषाण सोने के द्वंद्व सिक्के
(Economy and Monetary System in the Post-Mauryan Period)


उत्तर-मौर्य काल (185 ई.पू. – 300 ई.) में भारतीय उपमहाद्वीप की अर्थव्यवस्था ने अनेक प्रकार के आंतरिक व बाह्य परिवर्तनों का अनुभव किया। इस काल में न केवल व्यापारिक गतिविधियाँ तीव्र हुईं, बल्कि मुद्रा प्रणाली में भी विविधताएँ आईं। पंचमार्क सिक्कों से लेकर यूनानी प्रभावी मुद्राएँ और अंततः कुषाणों द्वारा जारी स्वर्ण द्वंद्व सिक्कों तक, इस काल की आर्थिक विविधता एक समृद्ध और बहुआयामी वाणिज्यिक जीवन को दर्शाती है।


1. आर्थिक परिवेश की पृष्ठभूमि:

  • मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद स्थानीय और विदेशी राजाओं ने स्वतंत्र रूप से शासन किया।
  • इस विकेन्द्रीकृत शासन प्रणाली ने क्षेत्रीय व्यापारिक केंद्रों और बंदरगाहों को प्रोत्साहित किया।
  • सत्ताएं जैसे शुंग, सातवाहन, शक, कुषाण, और पश्चिमी क्षत्रपों ने अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु मुद्राओं का निर्गमन किया।

2. पंचमार्क सिक्के (Punch-marked Coins):

विशेषताएँ:

  • ये सिक्के मुख्यतः चाँदी के होते थे और इनमें पंच-चिह्न (हथौड़े से बनाए गए चिन्ह) उकेरे जाते थे।
  • प्रत्येक सिक्के पर आमतौर पर पाँच प्रतीक होते थे – सूर्य, पर्वत, पेड़, मछली, आदि।

प्रचलन:

  • पहले मौर्यकाल में इनका निर्माण राज्य द्वारा होता था, लेकिन मौर्य-पतन के बाद निजी व्यापारियों और स्थानीय शासकों द्वारा भी इन्हें जारी किया गया।
  • उत्तरी और मध्य भारत के कई स्थलों (जैसे – कौशांबी, मथुरा, वैशाली) में इनके व्यापक प्रमाण मिले हैं।

महत्त्व:

  • यह भारत में मुद्रा आधारित वाणिज्य की प्राचीन परंपरा का प्रमाण है।
  • बाजार में विनिमय की सुविधा और कर-संग्रह की प्रणाली में सहायक थे।

3. यूनानी मुद्रा प्रणाली (Indo-Greek Coins):

यूनानी प्रभाव का उद्भव:

  • सिकंदर के भारत अभियान के बाद यूनानी सेनापतियों (जैसे – मेनांडर, एंटियोकस) ने भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों में शासन किया।

मुद्राओं की विशेषताएँ:

  • द्विभाषी (Bilingual): यूनानी और खरोष्ठी लिपि में लिखित।
  • चित्रांकन: सिक्कों पर शासकों के सजीव मुख और यूनानी देवी-देवताओं की आकृतियाँ होती थीं।
  • धातु: चाँदी और तांबे का प्रयोग।

महत्त्व:

  • भारतीय मुद्रा प्रणाली में कलात्मकता और व्यक्तिवाद की परंपरा की शुरुआत इन्हीं सिक्कों से मानी जाती है।
  • वाणिज्यिक आदान-प्रदान में भरोसे का प्रतीक थे।

4. कुषाणों की मुद्रा प्रणाली:

साम्राज्यिक व्यवस्था और मुद्रा:

  • कुषाण सम्राटों (विशेषतः कनिष्क) ने संगठित और सुसंगत मुद्रा व्यवस्था स्थापित की।
  • इन्होंने बड़ी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएँ चलाईं, जो द्वंद्व सिक्के (Double-die coins) कहलाते हैं।

कुषाण स्वर्ण मुद्राएँ:

  • मुख्यतः गोल्ड डिनार कहे जाने वाले सिक्के।
  • वजन लगभग 7.8 ग्राम – रोमन दीनार से प्रभावित।
  • एक ओर कनिष्क या अन्य सम्राट की छवि, दूसरी ओर देवता (बौद्ध, ब्राह्मणिक, ईरानी)।

धार्मिक विविधता:

  • कुषाण सिक्कों में यूनानी देवता (Helios, Selene), ईरानी यजाता (Mithra), शिव, स्कंद, बुद्ध – सबको चित्रित किया गया।
  • यह सम्राट की धार्मिक सहिष्णुता और साम्राज्य की बहु-सांस्कृतिक प्रकृति दर्शाता है।

मुद्रा और व्यापार:

  • कुषाण मुद्राओं ने रेशम मार्ग पर भारतीय व्यापार को विश्व से जोड़ा।
  • रोमन साम्राज्य से भारत में सोने की आमद भी इनकी मुद्रा व्यवस्था से प्रमाणित होती है।

5. मुद्रा प्रणाली के व्यापक प्रभाव:

बिंदुपंचमार्क सिक्केयूनानी मुद्राकुषाण स्वर्ण सिक्के
कालपूर्व-मौर्य से मौर्योत्तर2री – 1ली सदी ई.पू.1ली – 3री सदी ई.
धातुचाँदी, कभी-कभी तांबाचाँदी, तांबासोना, चाँदी, तांबा
लिपिनहीं या अस्पष्टयूनानी + खरोष्ठीबाख़्त्री, खरोष्ठी
चित्रांकनप्रतीकात्मक चिन्हराजा + देवतासम्राट + देवता
प्रभाव क्षेत्रगंगा क्षेत्रपंजाब, सिंधसमूचा उत्तर भारत, गांधार

उत्तर-मौर्य काल की अर्थव्यवस्था एक गहराई से व्यापारिक और बहु-सांस्कृतिक थी, जिसमें मुद्रा प्रणाली का अहम योगदान रहा। पंचमार्क सिक्कों की परंपरा से लेकर यूनानी कलात्मकता और कुषाणों की स्वर्णीय समृद्धि तक, यह काल भारतीय मुद्रा इतिहास का स्वर्णिम अध्याय सिद्ध हुआ। यह व्यवस्था न केवल स्थानीय व्यापार को गति देती थी, बल्कि भारत को रोमन, मध्य एशिया और चीन जैसे क्षेत्रों से जोड़ती थी।



व्यापार एवं संपर्क – रेशम मार्ग, रोम, चीन तक तोड़फोड़
(Trade and Connectivity – Silk Route, Rome, China, and Disruptions)


उत्तर-मौर्य काल (185 ई.पू. – 300 ई.) में भारत वैश्विक व्यापार और सांस्कृतिक संपर्कों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इस युग में भारत ने न केवल पूर्व के चीन, बल्कि पश्चिम के रोमन साम्राज्य से भी गहरे व्यापारिक संबंध स्थापित किए। इन संपर्कों का माध्यम बना प्रसिद्ध रेशम मार्ग (Silk Route), जिसने भारत को मध्य एशिया और उससे आगे यूरोप से जोड़ दिया। इन अंतरराष्ट्रीय संपर्कों से भारतीय वस्त्र, मसाले, रत्न, और बौद्ध विचारों का प्रसार हुआ।


1. रेशम मार्ग (Silk Route) का विकास:

  • रेशम मार्ग कोई एकल सड़क नहीं, बल्कि एक व्यापक व्यापारिक नेटवर्क था जो चीन, भारत, मध्य एशिया और भूमध्यसागरीय क्षेत्र को जोड़ता था।
  • यह मार्ग गांधार, मथुरा, तक्षशिला, पाटलिपुत्र जैसे भारत के नगरों से होकर गुजरता था।

प्रमुख व्यापारिक मार्ग:

  • भूमि मार्ग: चीन → तुर्किस्तान → तक्षशिला → मथुरा → पाटलिपुत्र।
  • समुद्री मार्ग: पश्चिमी तट (भृगुकच्छ, सोपारा) → अरब सागर → मिस्र → रोम।

व्यापारिक वस्तुएँ:

  • भारत से निर्यात: मसाले, रेशम, सूती वस्त्र, हाथी दाँत, आभूषण, दवाएँ।
  • आयात: चीनी रेशम, घोड़े, बर्तनों, रोम से सोने की मुद्राएँ।

कुषाणों की भूमिका:

  • कनिष्क जैसे सम्राटों ने इस मार्ग को संरक्षित किया और गांधार को एक बौद्ध एवं व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया।

2. भारत-रोम व्यापार संबंध:

रोमन सोने का प्रवाह:

  • भारत से होने वाले निर्यात की तुलना में रोम से आयात बहुत कम था, जिससे भारत में सोने का अत्यधिक आगमन हुआ।
  • प्लिनी द एल्डर (रोमन लेखक) ने शिकायत की थी कि “भारत रोम का सारा सोना सोख रहा है।”

साक्ष्य:

  • तमिलनाडु, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में रोमन सिक्कों का भारी भंडार मिला है।
  • अरिकमेडु (तमिलनाडु) एक महत्वपूर्ण रोमन व्यापार केंद्र बन चुका था।

वाणिज्यिक वस्तुएँ:

  • भारत से: सूती वस्त्र, रत्न, मसाले (काली मिर्च अत्यधिक लोकप्रिय)।
  • रोम से: शराब, सीसा, कांच के बर्तन, सोना।

3. भारत-चीन संबंध:

बौद्ध धर्म का प्रसार:

  • भारत से बौद्ध भिक्षु चीन गए और वहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार किया।
  • चीनी यात्रियों जैसे फ़ाह्यान और ह्वेनसांग ने भारत यात्रा की और व्यापारिक रास्तों का विवरण दिया।

व्यापारिक वस्तुएँ:

  • भारत से चीन को काष्ठ कला, औषधियाँ, रत्न भेजे जाते थे।
  • चीन से भारत में रेशम और चाय का आगमन हुआ।

राजनयिक संबंध:

  • कुषाण और हान वंश (Han Dynasty) के बीच दूतों का आदान-प्रदान हुआ।

4. व्यापारिक नगर और बंदरगाह:

नगर / बंदरगाहविशेषता
तक्षशिलारेशम मार्ग का प्रमुख स्थल, शिक्षण और व्यापार केंद्र
मथुराबौद्ध धर्म, मूर्तिकला और व्यापार का संगम
पाटलिपुत्रपूर्वी भारत का वाणिज्यिक व सांस्कृतिक केंद्र
भृगुकच्छ (भरुच)समुद्री व्यापार का प्रमुख बंदरगाह
अरिकमेडुभारत-रोम व्यापार का प्रमाण स्थल

5. व्यापारिक संपर्कों में तोड़फोड़ (Disruptions in Trade):

कारण:

  1. हूणों और कुषाणों के आक्रमण – मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में अस्थिरता।
  2. रोमन साम्राज्य का पतन – यूरोपीय व्यापार ठप।
  3. स्थानीय युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता – भारत में सातवाहन, शक, पश्चिमी क्षत्रपों के बीच संघर्ष।

प्रभाव:

  • व्यापार मार्गों की सुरक्षा खतरे में पड़ी।
  • समुद्री मार्गों का अधिक प्रयोग होने लगा।
  • लेकिन स्थानीय व्यापारिक केंद्र (जैसे – उज्जयिनी, विदिशा, कार्ली) मजबूत हुए।

6. व्यापार और संस्कृति का आदान-प्रदान:

  • भारत से बौद्ध धर्म और भारतीय स्थापत्य कला का प्रसार मध्य एशिया और चीन में हुआ।
  • पश्चिम से मूर्तिकला की यूनानी शैली (गांधार कला) भारत आई।
  • भारतीय वैज्ञानिक ज्ञान जैसे गणित, चिकित्सा, खगोलशास्त्र भी इन मार्गों से फैले।

7. व्यापारिक संगठनों और व्यापारी समुदाय की भूमिका:

  • श्रेष्ठी, गण, और निगम जैसे संगठन व्यापारियों द्वारा गठित किए जाते थे।
  • ये संगठन न केवल व्यापार का संचालन करते थे, बल्कि मंदिरों, धर्मशालाओं और बौद्ध विहारों को भी दान देते थे।

उत्तर-मौर्य काल की व्यापारिक गतिविधियाँ भारत को न केवल एक वैश्विक वाणिज्यिक केंद्र बनाती हैं, बल्कि इसे सांस्कृतिक विनिमय का सेतु भी बनाती हैं। रेशम मार्ग, रोम और चीन से संबंधों ने भारत के आंतरिक व्यापार, नगरों के विकास और धर्म-संस्कृति को नई दिशा दी। यद्यपि कुछ समय बाद राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी आक्रमणों ने इन व्यापारिक संबंधों में व्यवधान उत्पन्न किया, फिर भी भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति अक्षुण्ण बनी रही।



धर्मों का विकास – बौद्ध (महायान), जैन, वैदिक, ज़ारथुस्त्र धर्म
(Religious Developments – Mahayana Buddhism, Jainism, Vedic Religion, Zoroastrianism)


उत्तर-मौर्य काल (185 ई.पू. – 300 ई.) भारत के धार्मिक इतिहास में महान परिवर्तन और पुनर्निर्माण का युग रहा। इस काल में बौद्ध धर्म का महायान रूप, जैन धर्म का संगठनात्मक विकास, वैदिक धर्म में यज्ञ परंपरा से हटकर भक्ति मार्ग की ओर रुझान, और विदेशी प्रभाव से ज़ारथुस्त्र धर्म का भारत में प्रवेश देखने को मिलता है। इस समय धार्मिक विचार अधिक लोकप्रिय, संगठित और वैश्विक हुए।


1. बौद्ध धर्म – महायान शाखा का उदय:

पारंपरिक थेरवाद बौद्ध धर्म:

  • बुद्ध को एक महान गुरु और मार्गदर्शक माना जाता था।
  • निर्वाण ही जीवन का परम लक्ष्य था।
  • संघ और विनय पर बल।

महायान बौद्ध धर्म का विकास:

  • आरंभ: प्रथम शती ई.पू. के उत्तरार्ध में।
  • बुद्ध को अब ईश्वर-सदृश पूज्य, “बोधिसत्व” की पूजा शुरू।
  • मूर्तिपूजा का आरंभ – बुद्ध की प्रतिमाओं का निर्माण (विशेषकर गांधार और मथुरा शैलियों में)।
  • संस्कृत भाषा में बौद्ध ग्रंथों की रचना (पूर्व में पालि)।
  • लोककल्याण पर बल – बोधिसत्व दूसरों के मोक्ष के लिए स्वयं निर्वाण को टालते हैं।
  • कनिष्क के शासनकाल में महायान का अत्यधिक प्रचार, कुंदलवन परिषद (कश्मीर)।

प्रमुख बोधिसत्व:

  • अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, मैत्रेय

2. जैन धर्म का पुनर्गठन:

मूल जैन परंपरा:

  • महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित।
  • अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य पर बल।

उत्तर-मौर्य काल में विकास:

  • जैन धर्म ने भी मूर्तिपूजा की ओर रुझान दिखाया।
  • द्वैतीय शती ई. में श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों का विभाजन स्पष्ट हुआ।
विशेषताश्वेतांबरदिगंबर
वस्त्रसफेद वस्त्रनग्नता (दिगंबर – आकाश वस्त्र)
स्त्री मोक्षसंभवअसंभव
महावीर के विवाहमान्यता हैमान्यता नहीं
  • दक्षिण भारत में दिगंबर परंपरा का फैलाव हुआ (विशेषकर कर्नाटक)।
  • पाटलिपुत्र, उज्जयिनी, नासिक, श्रवणबेलगोला में जैन तीर्थस्थल उभरे।

3. वैदिक धर्म का रूपांतरण:

पूर्व वैदिक परंपरा:

  • देवताओं की पूजा, यज्ञों का महत्त्व, पुरोहितों का वर्चस्व।

उत्तर-मौर्य काल में परिवर्तन:

  • श्रुति परंपरा से स्मृति परंपरा की ओर झुकाव।
  • महाभारत, रामायण, धर्मशास्त्रों, स्मृतियों की रचना।
  • यज्ञों की जगह भक्ति, ध्यान, और तप की ओर रुचि।
  • वैष्णव और शैव सम्प्रदायों की वृद्धि।
  • पौराणिक धर्म का जन्म – अवतारवाद की कल्पना (विशेषकर विष्णु के दशावतार)।

प्रभाव:

  • वैदिक धर्म लोकप्रिय जनमानस में प्रवेश करता गया।
  • तीर्थ, व्रत, मंदिर निर्माण की परंपरा आरंभ।

4. ज़ारथुस्त्र धर्म (Zoroastrianism) का संपर्क:

  • मूल रूप से ईरान (पारस) का धर्म।
  • प्रवर्तक: ज़रथुस्त्र (Zarathustra)।
  • प्रमुख ग्रंथ: अवेस्ता (Avesta)
  • ईश्वर का नाम: अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda)

भारत में प्रवेश:

  • शकों, पार्थियनों और कुशाणों के माध्यम से ज़रथुस्त्र धर्म का प्रभाव भारत में आया।
  • उन्होंने अपने सिक्कों पर अग्नि वेदी (fire altar) के चित्र अंकित किए – यह ज़रथुस्त्र धर्म की पहचान थी।

प्रभाव:

  • धार्मिक सहिष्णुता में वृद्धि।
  • ईरानी प्रतीकों का भारतीय कला में समावेश।
  • बौद्ध धर्म में स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य की धारणा का विकास – संभवतः ईरानी प्रभाव।

5. धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय:

  • भारत में सभी धर्मों को सह-अस्तित्व का अवसर मिला।
  • कुषाण सम्राट कनिष्क ने बौद्ध धर्म को प्रोत्साहन दिया, पर अन्य धर्मों का भी सम्मान किया।
  • दक्षिण भारत में सातवाहनों ने ब्राह्मण धर्म को समर्थन दिया, लेकिन बौद्धों और जैनों को भी भूमि दान दी।

उत्तर-मौर्य काल में भारत के धार्मिक परिदृश्य में गंभीर परिवर्तन और विविधता देखने को मिलती है। बौद्ध धर्म महायान के रूप में वैश्विक बना, जैन धर्म ने संगठनात्मक रूप लिया, वैदिक धर्म पौराणिकता और भक्ति में ढला, और ज़ारथुस्त्र धर्म का सांस्कृतिक संपर्क भारत की सहिष्णुता का प्रतीक बना। इन सभी विकासों ने भारत को एक धार्मिक सहअस्तित्व और आध्यात्मिक विविधता का अद्वितीय राष्ट्र बनाया।



सामाजिक दशाएँ – वर्ण–जाति संरचना, स्त्री एवं श्रम
(Social Conditions – Varna-Jati Structure, Women and Labour)


उत्तर-मौर्य काल (200 ई.पू. – 300 ई.) सामाजिक दृष्टि से एक गंभीर रूपांतरण का काल था। इस युग में समाज ने पुराने वैदिक आदर्शों से हटकर कर्म आधारित जातीय संरचना, स्त्री की स्थिति में विविधता, और श्रमिक वर्गों की सशक्त भूमिका को देखा। इस काल के साहित्य, अभिलेख, यात्रा-वृत्तांतों, और सिक्कों से सामाजिक व्यवस्था की गहन जानकारी मिलती है।


1. वर्ण–जाति संरचना (Varna and Jati System):

वर्ण व्यवस्था:

  • पारंपरिक चार वर्ण: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
  • ब्राह्मण: धार्मिक कर्मकांड, शिक्षा व धर्माचार्य की भूमिका में।
  • क्षत्रिय: शासन, युद्ध और सुरक्षा का उत्तरदायित्व।
  • वैश्य: व्यापार, कृषि और पशुपालन से संबंधित।
  • शूद्र: सेवा व श्रम से संबंधित कार्यों में लगे।

परिवर्तन:

  • वर्ण व्यवस्था अब जन्म आधारित जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो रही थी।
  • जन्मना जाति की अवधारणा को धर्मशास्त्रों व स्मृतियों में बल मिला (मनुस्मृति)।
  • नई जातियों का जन्म – जैसे: निषाद, शबरी, चांडाल, कुलिक, तांत्रिक वर्ग आदि
  • शिल्पियों, व्यापारियों, दस्तकारों की पृथक जातियाँ उभरने लगीं।

जातीय पेशों का वर्गीकरण:

जातिकार्य
चांडालशवदाह और नगर की सफाई
स्वर्णकारआभूषण निर्माण
ताम्रकारधातु शिल्प
तेलीतेल निकालना
बुनकरवस्त्र निर्माण

2. स्त्री की स्थिति (Status of Women):

सकारात्मक पक्ष:

  • शाक्य, लिच्छवि, मथुरा, अमरावती क्षेत्रों में स्त्रियों की स्वतंत्रता अधिक दिखाई देती है।
  • कनिष्क काल में महायान बौद्ध धर्म ने महिलाओं को बोधिसत्व के रूप में स्वीकारा।
  • जैन धर्म में स्त्री साध्वियों की परंपरा ने शिक्षा और संयम को बढ़ावा दिया।

नकारात्मक पक्ष:

  • मनुस्मृति और धर्मशास्त्रों में स्त्री को पति और पुत्र के अधीन बताया गया।
  • बाल विवाह, पति के मृत्युपरांत सामाजिक उपेक्षा, और पुनर्विवाह निषेध जैसे प्रथाओं का प्रचार।
  • विधवाओं की सामाजिक स्थिति अत्यंत शोचनीय।
  • स्त्रियों की शिक्षा सीमित थी, परंतु धनी और कुलीन वर्ग की महिलाएँ कुछ क्षेत्रों में शिक्षित थीं।

प्रमुख उदाहरण:

  • याज्ञवल्क्य स्मृति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, और मनुस्मृति से स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का विवरण मिलता है।
  • कुछ सिक्कों व मूर्तियों में स्त्रियाँ वाद्य यंत्र बजाती, नृत्य करती, या व्यवसाय में लगी दिखती हैं – यह सामाजिक विविधता को दर्शाता है।

3. श्रम वर्ग (Labour and Working Classes):

श्रमिक वर्ग की भूमिका:

  • उत्तर-मौर्य काल की अर्थव्यवस्था, शिल्प और नगर निर्माण में श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
  • शिल्प, निर्माण, मूर्तिकला, व्यापार, जल-व्यवस्था आदि क्षेत्रों में विविध श्रमिक समूह कार्यरत थे।

प्रमुख श्रमिक वर्ग:

वर्गकार्य
कारिगरहस्तशिल्प, मूर्तिकला, धातु कार्य
कुम्हारमिट्टी के बर्तन बनाना
नाविकनदी व्यापार व यातायात
व्यापारीदेशी व विदेशी व्यापार का संचालन
कृषककृषि कार्य

श्रमिकों की सामाजिक स्थिति:

  • यद्यपि सामाजिक रूप से निम्न माने जाते थे, परंतु आर्थिक दृष्टि से अनिवार्य थे।
  • श्रमिकों के लिए स्वतंत्र गिल्ड (श्रेणियाँ) का प्रचलन – जैसे: लोहारों की श्रेणी, सुनारों की श्रेणी आदि।
  • श्रेणियों के अपने नियम, नेतृत्व और कोष होते थे।

उत्तर-मौर्य काल में सामाजिक ढांचा अधिक जटिल, पेशा-आधारित और संगठित हुआ। वर्ण व्यवस्था से जाति व्यवस्था की ओर संक्रमण हुआ, स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार के संकेत मिले पर संकुचितता भी रही, और श्रम वर्ग ने आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। यह काल सामाजिक गतिशीलता और संघर्षों का दर्पण भी था, जिसने भारत की सामाजिक संरचना की नींव को और गहराई प्रदान की।



कला, स्थापत्य एवं मूर्तिकला – गांधार, मथुरा, अमरावती शैलियाँ
(Art, Architecture, and Sculpture – Gandhara, Mathura, and Amaravati Styles)


उत्तर-मौर्य काल (200 ई.पू. – 300 ई.) में भारत की कला और स्थापत्य ने एक नवीन और मिश्रित रूप धारण किया। इस काल में स्थानीय शैलियों में विदेशी प्रभाव (विशेषतः यूनानी और मध्य एशियाई) मिलकर नवीन कलात्मक परंपराओं को जन्म देते हैं, विशेषकर गांधार, मथुरा और अमरावती जैसी शैलियों में। मूर्तिकला, स्थापत्य और चित्रकला सभी क्षेत्रों में यह काल अभूतपूर्व सौंदर्यबोध और धार्मिक अभिव्यक्ति का युग था।


1. गांधार कला शैली (Gandhara School of Art):

प्रमुख विशेषताएँ:

  • यह शैली मुख्यतः यूनानी-रोमन (ग्रीको-रोमन) और भारतीय तत्वों का मिलाजुला रूप है।
  • मूर्तियाँ गांधार (आधुनिक पाकिस्तान का पेशावर क्षेत्र) से प्राप्त होती हैं।
  • केंद्र: तक्षशिला, जलालाबाद, पेशावर, मथुरा के कुछ भाग

मूर्तिकला की विशेषताएँ:

  • मूर्तियों में यथार्थवाद, गहराई और भाव-प्रकाशन पर ज़ोर।
  • बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी देवता अपोलो के समान – घुंघराले बाल, रोमन चोग़ा, सीधे नाक-नक्श
  • बुद्ध को पहली बार मानव रूप में प्रदर्शित किया गया (पूर्व में प्रतीकात्मक रूप जैसे – चक्र, वृक्ष आदि)।
  • प्रमुख विषय: बुद्ध चरित, जातक कथाएँ, धार्मिक घटनाएँ।

उदाहरण:

  • फैसलाबाद (प्राचीन भुटकारा) में बुद्ध की प्रमुख मूर्ति।
  • बुद्ध की ध्यान मुद्रा, अभय मुद्रा, और धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा की मूर्तियाँ।

2. मथुरा कला शैली (Mathura School of Art):

उत्पत्ति और विकास:

  • मथुरा शैली पूरी तरह से भारतीय मूल की है।
  • इसका केंद्र था मथुरा, जो उस समय एक प्रमुख धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था।

विशेषताएँ:

  • लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग।
  • मूर्तियों में गाढ़ा शरीर, विशाल छाती, मोटी भुजाएँ, और सौम्य मुस्कान।
  • गौतम बुद्ध, जैन तीर्थंकरों, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ।
  • यक्ष, यक्षिणियाँ, नाग, नागिन, गंधर्व जैसी लोक-देव प्रतिमाओं की अधिकता।

धार्मिक दृष्टि से:

  • बुद्ध की मूर्तियों में मथुरा शैली में उन्हें अधिक गृहस्थ व योद्धा रूप में दर्शाया गया है।
  • जैन धर्म की मूर्तिकला विशेष रूप से मथुरा में विकसित हुई।

उदाहरण:

  • कनिष्क काल की बुद्ध प्रतिमा (1st CE) – मथुरा संग्रहालय में।
  • रिशभदेव और पार्श्वनाथ की जैन मूर्तियाँ।

3. अमरावती कला शैली (Amaravati School of Art):

भौगोलिक क्षेत्र:

  • दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश का क्षेत्र, विशेष रूप से अमरावती और नागार्जुनकोंडा

प्रमुख विशेषताएँ:

  • श्वेत संगमरमर या चमकदार चूना पत्थर का उपयोग।
  • मूर्तियाँ हल्की, पतली, लयबद्ध व गतिशील।
  • सजावटी बेल-बूटों, जानवरों और प्राकृतिक दृश्यों की भरमार।
  • बुद्ध के जीवन की घटनाओं को जटिल कथा-चित्रों के रूप में प्रदर्शित किया गया।

प्रतीकवाद:

  • प्रारंभिक चरण में बुद्ध को प्रतीकों के माध्यम से दिखाया गया (धर्मचक्र, पदचिन्ह, वृक्ष आदि)।
  • बाद में, प्रभावशाली मानव रूप में मूर्तियाँ बनीं।

उदाहरण:

  • अमरावती स्तूप की रेलिंगों और तोरणों पर विस्तृत मूर्तिकला।
  • नागार्जुनकोंडा के बुद्ध चरित दृश्य।

4. स्थापत्य (Architecture):

स्तूप निर्माण:

  • मौर्य काल से चली आ रही स्तूप परंपरा को गांधार, अमरावती और सांची में पुनः बल मिला।
  • स्तूप अब अधिक विस्तृत, सजावटी और कलात्मक हो गए।

प्रमुख स्तूप:

स्थलविशेषता
अमरावतीविशाल शिल्प व कथा-चित्रण
नागार्जुनकोंडाबौद्ध विहारों और स्तूपों का केंद्र
तक़्सशिलागांधार शैली में निर्मित
मथुराजैन स्तूपों और बौद्ध मूर्तियों का संगम

विहार और चैत्य:

  • बौद्ध भिक्षुओं के लिए गुफाओं में विहार (रहने के कक्ष) और चैत्यगृह (प्रार्थना स्थल) बनाए गए।
  • सजावटी दरवाज़े, स्तंभों पर बेल-बूटे, और गुफा की दीवारों पर कथानक चित्र।

उत्तर मौर्य कालीन कला ने भारत के धार्मिक जीवन, सामाजिक सोच और सांस्कृतिक विकास को मूर्त रूप प्रदान किया। गांधार शैली विदेशी प्रभाव का अद्भुत समावेश है, मथुरा भारतीय परंपरा की जीवंतता है, और अमरावती शैली दक्षिण की सुंदर लयात्मकता का प्रतीक। यह कलाएं न केवल धार्मिक साधना की अभिव्यक्ति हैं, बल्कि भारत की विविधता में एकता की कलात्मक मिसाल भी हैं।



संस्कृति और साहित्य – ग्रंथ, लेखन, सिद्धांत
(Culture and Literature – Texts, Writing, Philosophical Doctrines)


उत्तर मौर्य काल (200 ई.पू.–300 ई.) और विशेषतः शुंग, सातवाहन, शक तथा कुषाण काल के दौरान भारत में सांस्कृतिक चेतना और साहित्यिक अभिव्यक्ति का गहरा विकास हुआ। यह काल धार्मिक, दार्शनिक, चिकित्सा, खगोल, गणित और व्याकरणिक ग्रंथों की रचना का स्वर्णयुग था। संस्कृत, प्राकृत और पालि में रचित इन ग्रंथों ने भारत की बौद्धिक परंपरा को समृद्ध किया।


1. लेखन प्रणाली का विकास (Development of Writing Systems):

प्रमुख लिपियाँ:

लिपिक्षेत्रविशेषता
ब्राह्मीउत्तर भारतसबसे प्राचीन, अशोक के शिलालेखों की लिपि
खरोष्ठीगांधार, पश्चिमोत्तरदायें से बाएं लिखी जाती थी; यूनानी प्रभाव
गुप्त लिपिउत्तर भारतब्राह्मी से विकसित, गुप्तकालीन लेखनों में प्रयोग

लेखन सामग्री:

  • ताड़पत्र, भोजपत्र, कपड़ा, चमड़ा, दीवारें, पत्थर, तांबे की प्लेटें, स्तंभ।

2. धार्मिक ग्रंथों और साहित्य की रचना:

बौद्ध साहित्य:

  • महायान बौद्ध साहित्य की रचना इसी काल में – संस्कृत में।
  • प्रमुख ग्रंथ:
    • ललितविस्तर – बुद्धचरित का वर्णन।
    • महावस्तु – जातक कथाओं का संग्रह।
    • सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र, विमलकीर्तिनिर्देश सूत्र – महायान दर्शन का मूल।
  • अश्वघोष – प्रसिद्ध बौद्ध लेखक, ग्रंथ: बुद्धचरित, सौंदरानंद

जैन साहित्य:

  • अरहंतों और तीर्थंकरों के उपदेश प्राकृत भाषा में।
  • ग्रंथों की श्रेणी – आगम और अंग
  • मथुरा और गुजरात रहे जैन साहित्य के प्रमुख केंद्र।

वैदिक और ब्राह्मण साहित्य:

  • ब्रह्मसूत्र, धर्मसूत्र, श्रौतसूत्र – कर्मकांड और आचार-विचार पर आधारित।
  • मनुस्मृति – सामाजिक विधियों और वर्णव्यवस्था पर गहन ग्रंथ।

3. लौकिक साहित्य (Secular Literature):

संस्कृत साहित्य:

  • काव्य, नाटक, और शिलालेखीय गद्य में प्रचुर रचनाएँ।
  • भास – प्रसिद्ध नाटककार: स्वप्नवासवदत्ता, प्रतीज्ञायौगंधरायण
  • गाथासप्तशती (प्राकृत): सातवाहन राजा हाला द्वारा रचित, 700 श्रृंगारपरक कविताओं का संग्रह।

व्याकरण और दर्शन:

  • पतंजलिमहाभाष्य, व्याकरण और भाषा-दर्शन का अद्वितीय ग्रंथ।
  • न्यायसूत्र, सांख्यसूत्र, वैशेषिक सूत्र – दर्शनशास्त्र के आधार-स्तंभ।

4. विज्ञान और चिकित्सा संबंधी ग्रंथ:

आयुर्वेद:

  • चरक संहिता (चरक): शरीर-विज्ञान, औषधि और चिकित्सा सिद्धांतों का समावेश।
  • सुश्रुत संहिता (सुश्रुत): शल्य चिकित्सा और शारीरिक अंगों का विश्लेषण।

खगोल और गणित:

  • यद्यपि यह क्षेत्र गुप्त काल में चरम पर पहुँचा, परंतु बीज रचना इस काल में ही हुई।
  • यवनजतक, पौलिस सूत्र – यूनानी खगोल ज्ञान का भारतीय संस्करण।

5. राजकीय व सांस्कृतिक अभिलेख:

ताम्रपत्र एवं शिलालेख:

  • शकों, कुषाणों और सातवाहनों द्वारा जारी अभिलेखों में दान, धर्म और प्रशासन का उल्लेख।
  • रुद्रदामन का जूनागढ़ शिलालेख (150 ई.) – शुद्ध संस्कृत में रचित, ऐतिहासिक अभिलेख।

स्तंभ और मंदिर लेख:

  • पाटलिपुत्र, मथुरा, सांची, नासिक से महत्वपूर्ण लेखन सामग्री प्राप्त।

उत्तर-मौर्य कालीन संस्कृति और साहित्य ने भारतीय सभ्यता की बौद्धिक नींव को मज़बूत किया। लेखन प्रणाली का विकास, धार्मिक और लौकिक ग्रंथों की रचना, चिकित्सा और खगोल के क्षेत्र में अनुसंधान तथा भाषायी विविधता इस काल की उत्कृष्ट सांस्कृतिक पहचान हैं। यह युग बुद्धि और साधना का संगम था, जिसने भारत को ज्ञान के पथ पर अग्रसर किया।



विज्ञान और तकनीकी – चिकित्सा, खगोल, धातु विज्ञान, स्थापत्य, गणित
(Science and Technology – Medicine, Astronomy, Metallurgy, Architecture, Mathematics)


उत्तर मौर्य काल और विशेषतः शक–कुषाण युग भारत के प्राचीन वैज्ञानिक विकास का महत्वपूर्ण युग था। इस काल में यूनानी, रोमन और पारसी प्रभावों के संपर्क में आने के कारण भारत में चिकित्सा, खगोल, धातुकर्म, गणित तथा स्थापत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। यह वह समय था जब भारतीय विज्ञान ने अनुभव और विश्लेषण दोनों को अपनाया।


1. चिकित्सा विज्ञान (Medicine):

प्रमुख ग्रंथ:

ग्रंथलेखकविशेषता
चरक संहिताचरकशरीर, रोग, निदान, औषधि और आहार का वर्णन
सुश्रुत संहितासुश्रुतशल्य चिकित्सा, हड्डी जोड़ने, आँखों और त्वचा के रोग

चिकित्सा पद्धतियाँ:

  • रोग को तीन दोषों (वात, पित्त, कफ) के असंतुलन से जोड़ना।
  • 500+ औषधीय वनस्पतियाँ और खनिज।
  • वैद्य शिक्षण संस्थान: तक्षशिला, काशी, मथुरा आदि में चिकित्सा शिक्षण।

यूनानी-भारतीय चिकित्सा मिलन:

  • यूनानी चिकित्सक भारत आए और यहां के आयुर्वेदाचार्यों से विचार-विमर्श किया।
  • कुषाण दरबार में कई वैद्य यूनानी और भारतीय चिकित्सा को मिलाकर उपचार करते थे।

2. खगोलशास्त्र (Astronomy):

प्रमुख उपलब्धियाँ:

  • ग्रहों की गति, नक्षत्रों की स्थिति और चंद्र-सौर गणनाएँ।
  • ग्रहणों का वैज्ञानिक विश्लेषण – यह ब्रह्मांडीय घटना है न कि कोई दैविक प्रकोप।

ग्रंथ और स्रोत:

  • यवनजतक: यूनानी खगोलविद यवनाचार्य द्वारा रचित, संस्कृत में अनुवाद।
  • पौलिस सूत्र (Paulisa Siddhanta): यूनानी खगोल सिद्धांतों पर आधारित।

खगोलविदों की भूमिका:

  • मंदिरों और राजदरबारों में पंचांग बनाना, मौसम अनुमान, कृषि और यात्रा निर्धारण।

3. धातुकर्म (Metallurgy):

प्रमुख उपलब्धियाँ:

  • आयरन-स्मेल्टिंग और फोर्जिंग तकनीक का उच्च स्तर।
  • ताम्र, सीसा, सोना, चांदी और मिश्रधातु से उपकरण और आभूषण निर्माण।

विशिष्ट उदाहरण:

  • दिल्ली लौह स्तंभ (गुप्तकालीन, लेकिन तकनीक की शुरुआत कुषाण युग में):
    • 98% शुद्ध लौह, आज भी जंग रहित।
  • कुषाण काल में स्वर्ण सिक्कों का निर्माण – उन्नत धातुकर्म का संकेत।

4. स्थापत्य और वास्तुकला (Architecture):

प्रमुख स्थापत्य रूप:

स्थानसंरचनाविशेषता
सांची, भरहुतस्तूपमहायान प्रभाव, टोरणा, हरमिका
गांधार, मथुरामठ, चैत्ययूनानी-भारतीय शैली का मेल
नासिक, कार्ले, कान्हेरीगुफाएँशैलकृत विहार और चैत्य

स्थापत्य विशेषताएँ:

  • गुफा-कला का उत्कर्ष: नक्काशी, मूर्तिकला और जल निकासी व्यवस्था।
  • नागार्जुन कोंडा, आंध्र में विष्णुकुंडिनों की स्थापत्य कला।

5. गणित (Mathematics):

प्रमुख विषयवस्तु:

  • अंकगणितीय गणना, ज्यामिति, बीजगणित के बीज।
  • शून्य (0) की अवधारणा इस काल में स्पष्ट होती जा रही थी।
  • चंद्रगणना और सौर गणनाओं से त्रिकोणमिति की ओर संकेत।

प्रमुख रचनाएँ:

  • गुप्त काल में आर्यभट और ब्रह्मगुप्त के सिद्धांतों की पृष्ठभूमि इस काल में तैयार हुई।
  • गणितीय पंचांग: खगोलविदों द्वारा तैयार पंचांग में तिथियाँ, नक्षत्र, गणनाएँ दी गईं।

उत्तर-मौर्य एवं कुषाण–शक युग भारत के वैज्ञानिक विकास की आधारशिला रखने वाला काल रहा। चिकित्सा, खगोल, धातुकर्म, स्थापत्य और गणित के क्षेत्रों में जो परंपराएँ प्रारंभ हुईं, उन्होंने बाद के गुप्त युग में स्वर्णिम वैज्ञानिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया। यह स्पष्ट है कि भारत केवल अध्यात्म का केंद्र नहीं था, बल्कि अनुभव-सिद्ध वैज्ञानिक संस्कृति का भी पोषक रहा।



अंत्योत्तर प्रभाव – गुप्त, सासानियन, भारत-ख्रिस्तीय संपर्क
(Later Influences – Gupta, Sasanian, Indo-Christian Contact)


उत्तर-मौर्य काल के पश्चात, भारत में विदेशी शक्तियों जैसे शक, कुषाण और भारत-यूनानियों की उपस्थिति न केवल राजनीति में बल्कि संस्कृति, कला, धर्म, मुद्रा, वास्तुकला और व्यापार में गहरे प्रभाव छोड़ चुकी थी। यह प्रभाव गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष काल में भी जारी रहा और साथ ही सासानियन साम्राज्य (ईरान) और ख्रिस्तीय दुनिया से संपर्क ने भारतीय उपमहाद्वीप को एक वैश्विक सांस्कृतिक मिलन बिंदु में परिवर्तित कर दिया।


1. गुप्त साम्राज्य पर उत्तर-मौर्य प्रभाव:

राजनीतिक प्रभाव:

  • गुप्तों ने कुषाणों की राजकीय उपाधियाँ अपनाईं, जैसे – “महाराजाधिराज”।
  • उनके दरबार में विद्वान, ज्योतिषी और विदेशी दूतों का स्थान पूर्ववत बना रहा।

सांस्कृतिक प्रभाव:

  • मथुरा एवं गांधार कला शैली की विशेषताएँ गुप्त कालीन मूर्तिकला में स्पष्ट दिखती हैं।
  • गुप्त स्थापत्य में स्तूप और मंदिर निर्माण पर कुषाण शैली का प्रभाव।

मुद्रा प्रणाली:

  • गुप्त स्वर्णमुद्राएँ कुषाण सिक्कों के नमूनों पर आधारित थीं।
  • गुप्त मुद्रा की भाषा और शैली में कुषाणों का मिश्र प्रभाव।

2. सासानियन (ईरानी) प्रभाव:

संपर्क का मार्ग:

  • पश्चिमी एशिया से भारत का व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क सिंध और बलूचिस्तान के ज़रिये।
  • सासानियन साम्राज्य (224–651 ई.) ने मध्य एशिया में कुषाणों के अवशेषों पर अधिकार किया।

प्रभाव के क्षेत्र:

  • मुद्रा प्रणाली: गुप्त मुद्रा की छवियाँ और शैली, सासानियन सिक्कों से प्रभावित।
  • धातुकर्म और आभूषण कला: सासानियन डिज़ाइन भारत में प्रचलित हुए – विशेषतः परिधान और मुकुट।
  • धार्मिक संपर्क: पारसी (ज़ारथुस्त्र) धर्म के कुछ सिद्धांत भारतीय समाज में पहुंचे, जैसे अग्नि पूजा और पवित्रता का विचार।

3. भारत–ख्रिस्तीय संपर्क (Indo-Christian Contact):

प्रारंभिक संपर्क:

  • 1वीं से 4वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट (केरल, तमिलनाडु) में रोमन और सीरियन ईसाई यात्रियों का आगमन।
  • संत थॉमस (St. Thomas) को माना जाता है कि उन्होंने ईसा के बाद भारत आकर दक्षिण भारत में ईसाई धर्म का प्रचार किया।

सांस्कृतिक प्रभाव:

  • सिरिएक भाषा और बाइबिल की शिक्षाएँ दक्षिण भारत में प्रचलित हुईं।
  • सिरियन ईसाई समुदाय की स्थापना – जिन्होंने भारतीय रीति–रिवाज़ों के साथ ईसाई धर्म को आत्मसात किया।

व्यापारिक संपर्क:

  • रोम से भारत आने वाले व्यापारी ख्रिस्तीय थे, जो केरल और मालाबार में मसालों, रत्नों और कपड़ों का व्यापार करते थे।
  • भारत के कुछ पोर्ट शहरों जैसे मूज़िरीस, नेल्लोर, अरिकमेडु में ईसाई व्यापारियों की बस्तियाँ पाई गईं।

4. मिश्रित विरासत और सांस्कृतिक समावेशन:

प्रभावविवरण
भाषासंस्कृत में पर्सियन, यूनानी और सिरिएक शब्दों का प्रवेश
कलागांधार कला की यूनानी शैली, भारतीय रूपों के साथ मिश्रित
धर्ममहायान बौद्ध, पारसी और प्रारंभिक ईसाई विचारों का सह-अस्तित्व
व्यापारसिल्क रूट, समुद्री मार्गों द्वारा रोम, चीन, सीरिया और फारस से निरंतर संपर्क

उत्तर मौर्य काल का अंत एक नए युग की शुरुआत था – एक ऐसे भारत की जो अब वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रहा था। गुप्त साम्राज्य ने उत्तर-मौर्य काल की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया, सासानियन साम्राज्य के साथ संपर्क ने भारत को मध्य एशिया से जोड़ा और ख्रिस्तीय संपर्क ने भारतीय धार्मिक बहुलता को और गहराई दी। यह काल इस बात का प्रमाण है कि भारत ने बाहरी प्रभावों को आत्मसात कर अपनी सांस्कृतिक पहचान को और भी अधिक शक्तिशाली और व्यापक बनाया



संक्षेप – उत्तर-मौर्य काल की ऐतिहासिक विरासत
(Summary: Historical Legacy of the Post-Mauryan Period)


मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में राजनीतिक विखंडन और संस्कृतिक पुनर्गठन का काल आया, जिसे हम उत्तर-मौर्य काल के नाम से जानते हैं। यह समय केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक संगम का प्रतीक था, जिसमें भारत-यूनानी, शक, कुषाण, और पश्चिमी क्षत्रप जैसे विदेशी शासकों का भारत में प्रभावशाली प्रवेश हुआ। उन्होंने शासन व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों, धर्म, कला और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों को गहरे रूप में प्रभावित किया।


1. राजनीतिक विविधता और विदेशी राजवंशों की भूमिका:

  • भारत-यूनानियों ने यवन संस्कृति को भारतीय जनमानस से जोड़ा।
  • शकों और कुषाणों ने सुदृढ़ प्रशासन, नगर विकास, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया।
  • पश्चिमी क्षत्रपों ने पश्चिमी भारत में लंबी राजनीतिक स्थिरता दी।

2. अंतरराष्ट्रीय संपर्क और व्यापार:

  • रेशम मार्ग और समुद्री मार्गों के माध्यम से चीन, रोम, मिस्र और मध्य एशिया से व्यापारिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ।
  • भारत से मसाले, वस्त्र, रत्न, और धातुएँ निर्यात होती थीं; बदले में सोना, चाँदी, और सांस्कृतिक विचार आयात होते थे।

3. धर्म और दर्शन का उत्कर्ष:

  • इस युग में महायान बौद्ध धर्म का विकास हुआ, जिसने बौद्ध धर्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
  • जैन धर्म और वैदिक परंपराएँ समानांतर रूप से फलती-फूलती रहीं।
  • पारसी (ज़ारथुस्त्र धर्म) और प्रारंभिक ईसाई संपर्कों ने भारत में धार्मिक बहुलता को और समृद्ध किया।

4. सामाजिक संरचना और जीवन:

  • जाति और वर्ण व्यवस्था में कठोरता आई, किन्तु श्रमिक वर्ग और व्यापारिक वर्ग की सामाजिक भूमिका भी बढ़ी।
  • महिलाओं की स्थिति में मिश्रित परिवर्तन देखने को मिले – कहीं घुटन, कहीं धार्मिक सक्रियता।

5. कला, स्थापत्य और साहित्य:

  • गांधार और मथुरा कला ने बौद्ध मूर्तिकला को नई ऊँचाइयाँ दीं।
  • स्थापत्य में स्तूप, चैत्य, विहार तथा मंदिरों का निर्माण हुआ।
  • सिक्कों, शिलालेखों और हस्तलिखित ग्रंथों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई।

6. विज्ञान और तकनीकी विकास:

  • खगोलशास्त्र, गणित, चिकित्सा, धातु विज्ञान और स्थापत्य कला में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
  • कुषाण काल में विशेष रूप से स्वर्ण मुद्रा निर्माण और धातुकला का उत्कर्ष हुआ।

7. गुप्त काल एवं बाद की विरासत:

  • उत्तर-मौर्य काल की सांस्कृतिक और प्रशासनिक परंपराएँ गुप्त साम्राज्य में परिष्कृत रूप में उभरती हैं।
  • सासानियन संपर्क और भारत-ख्रिस्तीय सम्पर्क से भारत की वैश्विक पहचान और भी व्यापक बनी।

उत्तर-मौर्य काल एक संक्रमण नहीं, एक पुनरुत्थान था – जहाँ भारत ने अपनी सीमाओं को खोलकर विदेशी शक्तियों को अपनाया, उनकी श्रेष्ठताओं को आत्मसात किया और अपनी संस्कृति को और भी अधिक व्यापक, समावेशी और समृद्ध बनाया। यह काल भारतीय इतिहास की एक ऐसी कड़ी है जिसने गुप्त स्वर्णयुग और आगे की सभ्यताओं के लिए नींव रखी।



चार्ट: उत्तर-मौर्य काल की ऐतिहासिक विशेषताएँ


क्षेत्रयोगदान / विशेषता
शासनभारत-यूनानी, शक, कुषाण, पश्चिमी क्षत्रप
व्यापाररोम, चीन, मध्य एशिया से संपर्क, रेशम मार्ग
धर्मबौद्ध (महायान), जैन, वैदिक, पारसी, प्रारंभिक ईसाई
कलागांधार, मथुरा शैली, स्तूप, विहार
समाजवर्ण-जाति, व्यापारिक वर्ग का उदय, श्रमिकों की भूमिका
विज्ञानधातुकर्म, खगोल, चिकित्सा, स्थापत्य
विरासतगुप्त शासन, वैश्विक पहचान, मिश्रित संस्कृति

उत्तर-मौर्य काल का कालानुक्रम (Timeline: 185 BCE – 300 CE)

वर्ष (ई.पू./ई.)प्रमुख घटनाएँ / विकासक्षेत्र / वंश
185 BCEपुष्यमित्र शुंग द्वारा अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्याशुंग वंश का उदय
180 BCEभारत-यूनानी (यवन) आक्रमण, डेमिट्रियस का पश्चिमोत्तर भारत पर अधिकारभारत-यूनानी
165 BCEमेनांडर (मिलिंद) का शासन और बौद्ध धर्म की ओर झुकावभारत-यूनानी
150 BCE“मिलिंदपन्हा” संवाद की रचना (मेनांडर और नागसेन)बौद्ध ग्रंथ
150–100 BCEशुंग काल में बौद्ध विरोधी रवैया, वैदिक पुनरुत्थानशुंग वंश
100 BCEपतंजलि का “महाभाष्य”, संस्कृत व्याकरण का विकासशुंग–वैदिक परंपरा
75 BCEकण्व वंश का उदय – शुंगों का पतनकण्व वंश
58 BCEविक्रम संवत की शुरुआत (सम्राट विक्रमादित्य से जोड़ा जाता है)मिथकीय इतिहास
50 BCEशकों का प्रवेश भारत में – पर्शिया व मध्य एशिया से आगमनशक वंश
30 BCEगोंधार कला शैली का आरंभ (ग्रीको-बौद्ध प्रभाव)गांधार क्षेत्र
10 BCE – 10 CEपश्चिमी क्षत्रपों का पश्चिम भारत में शासन प्रारंभक्षत्रप वंश
30 CEप्रथम कुषाण शासक कुजुल कडफिसेस का शासन प्रारंभकुषाण वंश
50–75 CEकुषाणों का पश्चिमोत्तर भारत में विस्तारकुजुल कडफिसेस
78 CEशक संवत की शुरुआत (कनिष्क द्वारा)कुषाण साम्राज्य
100 CEकनिष्क का शासन, बौद्ध महायान धर्म का उत्कर्षकुषाण साम्राज्य
125–150 CEअमरावती और मथुरा कला का उत्कर्षदक्षिण/उत्तर भारत
150 CEरोम, चीन, मध्य एशिया से व्यापार चरम परअंतरराष्ट्रीय संपर्क
175 CEप्रारंभिक हिंदू देवताओं की पूजा – विष्णु, शिव की छवियाँ मिलनाधर्मिक बदलाव
200 CEनासिक, कार्ले, अमरावती स्तूपों का निर्माणस्थापत्य और धर्म
220 CEसासानियन साम्राज्य का उदय – पश्चिम से भारत पर सांस्कृतिक प्रभावईरानी संपर्क
250 CEभारत-ख्रिस्तीय संपर्क, रोम से धार्मिक प्रभावकेरल तट
275 CEगुप्त साम्राज्य की नींव – उत्तर-मौर्य प्रभाव समाप्तप्रारंभिक गुप्त काल
300 CEउत्तर-मौर्य विरासत का समापन, गुप्त स्वर्णयुग की शुरुआतसांस्कृतिक संक्रमण

इस कालखंड की प्रमुख विशेषताएँ:

  • राजनैतिक विखंडन लेकिन सांस्कृतिक समृद्धि
  • धर्मों का पुनर्गठन: बौद्ध धर्म (महायान), जैन, वैदिक पुनरुत्थान
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार: रोम, चीन, सासानिया से संपर्क
  • विज्ञान व कला: गांधार, मथुरा, अमरावती शैली, सोने के सिक्के
  • गुप्त युग की नींव: धार्मिक सहिष्णुता, प्रशासनिक व्यवस्था, सांस्कृतिक आदान-प्रदान